मुर्गी पड़ी रंग में

मुर्गी पड़ी रंग में 


एक बार एक बुड्ढे मुर्गे ने एक जवान मुर्गी से ब्याह कर लिया |  इससे पहली बूढी मुर्गी बहुत नाराज हुई और वह रूठकर नीम के पेड़ की एक डाल पर जा बैठी | इतने में पानी बरसने लगा | जिस डाल पर मुर्गी बैठी थी, उसके ऊपर एक कौए का घोसला था | घोसले में रंग बिरंगे चिथड़े थे | बारिश के कारन चीथड़ों का रंगीन पानी मुर्गी पर गिरता रहा |  इससे मुर्गी के पंख बढ़िया रंगो से रंग गए | 
फिर तो बूढी मुर्गी जवान दिखने लगी | इसलिए वह खुस होती हुई हल ही में ब्याही नई मुर्गी के पास पहुंची | नई मुर्गी ने बूढी मुर्गी से पूछा, "बहन! तुमने अपने पंख इतने सुन्दर कैसे बना लिए ? "
बूढी मुर्गी नाराज तो थी ही, इसलिए उसने कहा, "मैंने तो रंगरेज की रंग भरी कुण्डी में एक डुबकी लगाई, तो मेरे ये पंख इतने सुन्दर बन गए | अगर तुमको भी अपने पंख सुन्दर बनाने हो, तो तुम भी रंग की कुण्डी में डुबकी लगा आओ | " नई  मुर्गी उडी और रंगरेज की दूकान के पास रंग की जो कुण्डी भरी थी, उसमे कूदी और डूबकर मर गई | 
अपनी जवान मुर्गी के मर जाने से बुड्ढा मुर्गा बहुत दुखी हो गया और वह पीपल के पेड़ पर जाकर बैठ गया | 

पीपल ने पूछा,"मुर्गा भैया, मुर्गा भैया! आज तुम इतने दुखी होकर क्यों बैठे हो? "

मुर्गा बोला :
 
"मुर्गी पड़ी रंग में, मुर्गा डूबा शोक में | " 


पीपल ने कहा , "अरे यह तो बड़े ही दुःख की बात हुई इस दुःख से दुखी होकर मई अपने सब पत्ते झाड़े डालता हु |  "यह कहकर पीपल ने अपने सारे पत्ते झाड़ डाले | 

कुछ देर बाद उस पीपल के निचे एक भैस पहुंची | भैस ने कहा, "पीपल भैया, पीपल भैया! आज तुम्हे क्या हो गया ! कल तो तुम पर बहुत ही बढ़िया पत्ते लगे थे और आज एक भी पत्ते क्यू नहीं है?"

पीपल बोला, "बहन!बात कहानी की नहीं है |
 
भैस ने कहा, "भैया, कुछ कहो तो, आखिर बात क्या है ?"

पीपल बोलै:

"मुर्गी पड़ी रंग में, मुर्गा डूबा शोक में, और पत्ते पीपल के झड़े |" 

भैसे ने कहा,"अरे यह तो बड़े दुःख की बात हुई ! इस दुःख में मै भी अपने सींग तोड़ लुंगी| " 

ऐसा कहकर भैस ने अपने सींग तोड़ लिए 
बाद में भैस पानी पिने के लिए नदी पर पहुंची | 

नदी ने पूछा, "भैस बहन, भैस बहन! तुम्हारे सींग कहा गये ?"

भैस बोली, आरी बहन ! क्या कहु ! बात कहने की नहीं है|" 

नदी ने कहा, "बहन, कुछ कहो न! ऐसी क्या बात हो गई?"
भैस बोली 

"मुर्गी पड़ी रंग में, मुर्गा डूबा शोक में | 
पत्ते पीपल के झड़े, और भैस के उड़े सींग |" 

नदी ने कहा, "अरे! यह सुनकर मुझे बहुत दुःख हो रहा है, अब मै भी सुख जाती हु |"

यह कहकर नदी सुख गई | 

तभी एक कोयल नदी पर पानी पिने पहुंची | 
कोयल ने पूछा, "नदी बहन, नदी बहन, ! यह तुम्हे क्या हो गया ? कल तो तुम्हारे दोनों किनारो के बिच बढ़िया पानी बह रहा था, और आज तो पानी की एक बून्द भी नहीं है |"

नदी ने कहा, "बहन, क्या कहु? बात कहने की नहीं है | गजब हो गया है | "
कोयल बोली, "बहन, कुछ तो कहो | ऐसा कौन सा दुःख तुम पर टूट पड़ा है!"

नदी ने कहा :

"मुर्गी पड़ी रंग में, मुर्गा डूबा शोक मे | 
पत्ते पीपल के झड़े , सींग भैस के उड़े और नदी हो गई बेपानी |"

कोयल बोली, "तब तो अब मुझे भी शोक मानना चाहिए | मेरा मन करता है की मै रो-रोकर अपनी आँख फोड़ लूं |"
यह कहकर कोयल वहां से उड़ी और एक बनिए की दुकान पर जा बैठी | 
बनिया बोलै, "अरी ओ  कोयल ! आज तेरी एक आँख का क्या हुआ?"

कोयल ने कहा, "सेठजी, क्या कहु ? बात कहने की नहीं है | बहुत ही बुरा हुआ है | 
बनिये ने कहा, "तू कुछ कहेगी भी ! आखिर ऐसा हुआ क्या है? 

कोयल ने कहा :

"मुर्गी पड़ी रंग में, मुर्गा डूबा शोक में | 
पत्ते पीपल के झड़े, सींग भैस के उरे | 
नदी हो गई बेपानी और कोयल हो गई कानि |"


यह सुनकर बनिया इतना दुखी हुआ की दुःख ही दुःख में वह पागल हो गया | इसी बिच राजा की रानी की दासी का पति बनिए की दूकान पर कोई चीज खरीदने पंहुचा | 

बनिया पागल की सी हालत में बैठा था | उसे देखकर दासी के पति ने पूछा, "सेठजी ! आज आप पागल की तरह क्यू बैठे है? आपकी तबियत तो ठीक है न!" 
बनिया बोलै, "भैया, क्या कहु? एक बहुत ही बड़ा दुःख आ पड़ा है |"
दासी के पति  ने कहा, "कुछ कहिये तो,  ऐसा कौन सा दुःख आ पड़ा है |"

बनिया बोला : 

"मुर्गी पड़ी  रंग,  मुर्गा डूबा शोक में | 
पत्ते पीपल के झरे, सींग भैस के टूटे | 
नदी हो गयी बेपानी, कोयल हो गयी काणि | 
और सेठ हो गए पागल |" 

सुनकर दासी का पति गहरी सोच में डूब गया और अपनी कनपटी पर हाथ रख कर बैठ गया इतने में दासी वहां आई दासी ने पूछा, "भले आदमी आज तुम किस सोच में डूब गए हो ?"
दासी का पति बोला, बात कहने जैसी है नहीं गजब हो गया है!
दासी  ने कहा, "कुछ कहो तो सही बिना कहे पता कैसे चलेगा?"
दासी का पति बोला : 

मुर्गी पड़ी रंग में, मुर्गा डूबा शोक में | 
पत्ते पीपल के झरे, सींग भैस के उड़े | 
नदी हो गयी बेपानी, कोयल हो गयी कानि | 
सेठ हुए पागल और दासी का पति हो गया हैरान |"

अपने पति की ऐसी हालत देखकर दासी रोती -रोती रानी के पास पहुंची | दासी को रोते  देखकर रानी ने उससे पूछा, "अरे तू रोती -रोती क्यू आई है? क्या तेरे घर में कोई गड़बड़ हुई है?"
दासी बोली, "रानी जी !  बात कहने लायक नहीं है | बहुत ही बुरा काम हुआ है |"
रानी ने पूछा, "क्या हुआ ? तुम झटपट कहोगी तो कोई उपाय किया जा सकेगा |"

दासी ने कहा :

"मुर्गी पड़ी रंग में, मुर्गा डूबा शोक में | 
पत्ते पीपल के झड़े, सींग भैस की टूटी | 
नदी हो गयी बेपानी, कोयल हो गयी कानि | 
सेठ हो गया पागल, दासी का पति हो गया हैरान | 
और दासी रोने लगी|" 

रानी बोली, " गजब हो गया! अब इस सारे दुःख  भूलने के लिए मै नाचना सुरु करती हु | नाचने से सारा दुःख दूर हो जाएगा | "यह कहकर रानी नाचने लगी | 

इतने में वह राजकुमार पंहुचा उसने पूछा, "माँ, माँ ! आप यह क्या कर रही है ? आपको क्या हो गया है? 
रानी बोलि, "बेटे! बहुत भरी दुःख आ पड़ा है | उसे भूलने के लिए मैंने नाचना सुरु कर दिया है |"
राजकुमार ने पूछा, "माँ! कहो तो सही! आप पर क्या दुःख आ पड़ा है ?" 

रानी बोली  :


"मुर्गी पड़ी रंग में, मुर्गा डूबा शोक में | 
पत्ते पीपल के झड़े, सींग भैस के टूटे | 
नदी हो गयी बे पानी, कोयल हो गयी कानि | 
सेठ हो गया पागल,दासी का पति हो गया हैरान | 
दासी रोने लगी, और रानी नाचने लगी |" 

राजकुमार ने कहा, "सुनो, अब मै ढोलक बजता हु, जिससे नाच बेहतर हो |" ऐसा कहकर राजकुमार ढोलक बजाने लगा | 

इसी बिच राजा को पता चला, तो वह वहां  पहुंच गया, और सारी बात जानने के बाद वह खुद ताली बजने लगे : 


 "मुर्गी पड़ी रंग में, मुर्गा डूबा शोक में | 
पत्ते पीपल के झड़े, सींग भैस के टूटे | 
नदी हो गयी बे पानी, कोयल हो गयी कानि | 
सेठ हो गया पागल,दासी का पति हो गया हैरान | 
दासी रोने लगी, रानी नाचने लगी | 
राजकुमार ढोलक बजने लगा, और राजा ताली बजने लगा |"

क्रोध पर विजय

क्रोध पर विजय

क्रोध पर विजय  

एक व्यक्ति के बारे में यह विख्याता था की उसको कभी क्रोध नहीं आता है | कुछ लोग ऐसे भी होते है जिन्हे  सिर्फ बुरी बाते ही सूझती है | ऐसे ही व्यक्तियो में से एक ने निस्चय किया की उस अक्रोधी सज्जन को हरा दिया जाये और वह लग गया अपने काम में |
उसने इस प्रकार के लोगों की एक टोली बना ली और उस सज्जन के नौकर से कहा यदि तुम अपने स्वामी को उत्तेजित कर सको तो तुम्हें पुरस्कार दिया जाएगा | इस प्रकार के लोगों की एक टोली बना ली और उस सज्जन के नौकर से कहा यदि तुम अपने स्वामी को उत्तेजित कर सको तो तुम्हें पुरस्कार दिया जाएगा | 
प्रात:काल होने पर स्वामी ने नौकर से केवल इतना कहा कल बिस्तर ठीक नहीं था | 
नौकर ने बहाना बना दिया और कहा मैं ठीक करना भूल गया था | 
भूल तो नौकर ने की रही थी अतः सुधरती कैसे इसलिए दूसरे तीसरे और चौथे दिन भी बिस्तर ठीक नहीं बिछा | 
तब स्वामी ने नौकर से कहा लगता है कि तुम बिस्तर ठीक करने के काम से हो ऊब गए हो और चाहते हो कि मेरा यह स्वभाव छूट जाए कोई बात नहीं अब मुझे सिकुड़ी हुए बिस्तर पर सोने की आदत पड़ती जा रही है | 

अब तो नौकर ने ही नहीं बल्कि उन धूर्तो  ने भी हार मान ली | 












 

 

बंदर और लकड़ी का खूँटा

बंदर और लकड़ी का खूँटा 

बंदर और लकड़ी का खूँटा 

एक समय से कुछ ही दूर पर एक मंदिर का निर्माण किया जा रहा था मंदिर में लकड़ी का काम बहुत था इसलिए लकड़ी चीरने वाले बहुत सारे मजदूर काम पर लगे हुए थे यहां वहां लकड़ी के लटके पड़े हुए थे और लट्ठे और साथ में काम चल रहा था सारे मजदूरों को दोपहर का भोजन करने के लिए शहर जाना पड़ता था इसलिए दोपहर के समय 1 घंटे तक वहां कोई नहीं होता था 1 दिन खाने का समय हुआ तो सारे मजदूर काम छोड़ कर चल दिए | 

एक लट्ठा आधार चीरा  रह गया था आधे चीरे लट्ठे में मजदूर लकड़ी का किला फसकर कर चले गए ऐसा करने से दोबारा आरी लगाने में आसानी रहती है तभी वहां बंदरों का एक दल उछलता कूदता आया उनमें से एक शरारती बंदर भी था जो बिना मतलब चीजें छेड़छाड़ करता रहता था पंगे लेना उसकी आदत थी बंदरों के सरदार ने सबको वहां पड़ी चीजों से छेड़छाड़ ना करने का आदेश दिया | 

सारे बंदर पेड़ की ओर चल दिए पर वह शैतान बंदर सबकी नजर बचाकर पीछे रह गया और लगा आंगणे बाजी करने उसकी नजर आधे चरे हुए लट्ठे पर पड़ी बस वह उसी पर पिल पड़ा और बीच में लगाई गए किले को देखने लगा फिर उसने पास पड़ी आधी को देखा उसे उठाकर लकड़ी पर रगड़ने लगा उससे किर्रर्र-किर्रर्र की आवाज निकलने लगी तो उसने गुस्से से आरि पटक दी उन बंदरों की भाषा में किर्रर्र-किर्रर्र  का अर्थ निखट्टू था वह दोबारा लट्ठे के बीच फसाए किले को देखने लगा उसके दिमाग में कौतूहल होने लगा कि इस किले को लट्ठे के बीच में से निकाल दिया जाए तो क्या होगा अब वह किले को पकड़कर उसे  बाहर निकालने के लिए जोर आजमाइश करने लगा लट्ठे के बीच फसाया गया खिला दो पाटों के बीच बहुत मजबूती से जकड़ा गया होता है क्योंकि लट्ठे के दो बहुत मजबूत स्प्रिंग वाले क्लिप की तरह उसे दबाए रहते हैं| 

बंदर खूब जोर लगाकर उसे हिलाने की कोशिश करने लगा किला जोर लगाने पर हिलने बाद खिसकने लगा तो बंदर अपनी शक्ति पर खुश हो गया

और वह जोर-जोर से किला सरकार ने लगा इस मस्ती के बीच बंदर की पूंछ दो पाटों के बीच आ गई थी जिसका उसे पता ही नहीं लगा

उसने उत्साहित होकर एक जोरदार झटका मारा और जैसे ही किला बाहर खींचा लट्ठे के दो चीरे भाग फटाक से क्लिप की तरह जुड़ गए और बीच में फस गई बंदर की पूंछ बंदर चिल्ला उठा | 

सभी मजदूर वहां लौटे उन्हें देखते ही बंदर ने भागने के लिए जो लगाया तो उसकी पूछ टूट गई वह चीखता हुआ टूटी पूछ लेकर भागा | 


पैसो का घमण्ड 

पैसो का घमंड

पैसो का घमंड 

पैसो का घमंड 

एक गांव में दो अच्छे दोस्त रहते थे | एक का नाम सोनू और दूसरे का नाम मोनू था | सोनू के पिता किसान थे वे खेतीं  बारी कर के घर का गुजरा करते थे | वही मोनू के पिता एक व्यापारी थे वो अपने अपने बेटे के साथ उसी गांव में रहते थे | सोनू और मोनू अच्छे दोस्त होने के साथ - साथ वो साथ में स्कूल भी जाते थे | 



कुछ समय बाद जब दोनों ने पढाई पूरी ख़तम कर ली तब सोनू अपने पिता के साथ खेती करने लगा और मोनू के पिता आमिर थे तो मोनू ने सोचा मुझे तो काम करने की कोई जरुरत ही नहीं वो अपने पिता कि कमाई को लुटाने लगा मेहगे कपड़े, मेहगीं गाड़िया खरीदने लगा मोनू के पिता उसे समझाते थे की वो भी उनके कामो में उनकी मदत करे लेकिन वो नहीं मानता था वही सोनू अपने पिता की पूरी मदत करता था | 






एक दिन सोनू अपने खेतों में काम कर रहा था तब उसके दिमाग में ख्याल आया की ऐसा कब तक चलेगा हम खेती कब तक करेंगे कब तक अनाज को मंडी में बेचते रहेंगे क्यू न इन आनाजो को विदेशो में बेचा जाये उसने अपना सुझाव अपने पिताजी को बताया पिता ने कहा लेकिन ये सुब कैसे होगा हमरे पास पैसे नहीं है तो फिर सोनू ने खा वो सुब मै देख लूंगा | उधर मोनू अपने पिता की जमा की गई धन दौलत लुटा रहा था | सोनू अपने काम के सिलसिले से विदेश चला गया वहा उसके हाथ निराशा ही लगी वो वापिस अपने गांव आ गया लेकिन उसने हार नहीं मानी उसने अपनी एक वेबसाइट बनाई और उसपे अपने द्वारा उगाई गई फसलों की फोटो डालता गया |

 करीब एक महीने के बाद एक दिन उसके पास विदेश से फ़ोन आया  उसका पहला आर्डर उसने अपने पिता को बताया वो बहुत खुश हुए उन्होंने अपना पहला ऑर्डर सही समय पे पंहुचा दिया धीरे धीरे उनके पास बहुत सरे आर्डर आने लगे तो फिर सोनू ने सोचा क्यू न अपने आस पास के किसानो के साथ मिल के काम किया जाये सोनू किसानो से अनाज खरीद के विदेशो में बेचने लगा धीरे धीरे वो आमिर हो गया और वही मोनू अपने पिता की सारी धन दौलत लुटा दिया अब उनके पास कुछ नहीं था | 



इस कहानी की सिख = हमे कभी भी पैसो का घमंड नहीं करना चाहिए