व्यंगम शरणम मधुरम

आज अलख सवेरे मेरे मित्र सुखसागर (गुरु से गुरु मंत्र लेने से पहले सूखेराम थे) आ धमके। दनादन बेल बजाकर ,
‘अरे प्यारे जल्दी दर्बज्जो खोलो मैं जहाँ हॉफ़ रहो हूँ और तुम आराम फरमा रहे हो।’
मेरे मित्र की भाषा में कुछ ब्रज भाषा का पुट है या यों कहें जब से गुरु दीक्षा ली है तब से बोलन लगे हैं
मैंने सोचा आज सूखा मुसीबत में है इसीलिए मित्र धर्म निभाते मैं भी तेजी से लपकता हुआ पहुँचा और द्वार खोलते हुए जिज्ञासा वश पूछा-
‘कौन सी मुसीबत आ पड़ी सुख सागर जो इतनी जोर से हांफ रहे हो’
तैश में आते हुए ‘ काहे को सुखसागर, दुखों की खान कहो मौसू । जहाँ तो कलेजो निकर हाथ पर आए रह्यो हो।’
‘अरे क्या हुआ ? कुछ बताओगे भी या ऐसे ही पहेलियां बुझाते रहोगे?’
प्रश्नवाचक मुद्रा में , मैं पहेली नाय बुझाय रह्यो हूँ आजकल घरन पे छापे पड़ि रहे हैं’
‘वो किसलिये मेरे भाई?’
‘कुछ मत पूछो मेरे पड़ौस में दो तश्वीरें बरामद भई हैं ,सोई उखाड़ लई और अरेस्ट कर लियो है।
‘तस्वीरों से अरेस्ट ‘मैं कुछ समझा नहीं सुख’—-
बीच मे टोकते हुए ‘अरे वे तश्वीरें वाही बाबा की हतीं। मैं जे ही बताने आयों हूँ। तुम्हारे घर में हों तो जल्दी निकार दो नाहीं तो वेज्जती है जावेगी। ‘
धीरे कान की तरफ आते हुए
‘ मैं तो निकार के बेड के नीचे सरकाए आयो हूँ जैसे ही मामलो कछु शांत होयगो विसर्जित कर देबेगें।’
मैंने समझाने की मुद्रा में कहा-
कितना जमाना खराब आ गया है कि हम अपने बाबन की तश्वीर भी अपने घर में नहीं टांग सकते।
मैंनें उन्हें अन्दर खींचते हुए
‘कोई सुन लेगा थोड़ा धीरे बोलो क्या मेरी भी छीछालेदर कराओगे।’
‘क्यों प्यारे तुम्हारे घर में भी?’
‘हाँ है तो पर वा बाबा की नहीं है । फिर भी हटा दूं । कहीं हमें भी उसी का चेला न समझ लें।’
‘लेकिन तुम्हारे घर में तो उसी बाबा की सुखसागर।’
मुँह पर उंगली रखते हुए’ चुप’. कोई सुन लेगा।
अरे छोड़ो यार पहले चाय सटक लो, चित्त शांत कर लो फिर देखेंगे।
अच्छा ये बताओ’ तुम्हें यहां आते किसी ने देख तो नहीं लिया?’
‘ना ना तबहिं तो इतने भुरारें आयों हूँ । ये ही बताइबे कि तुम भी तश्वीरें हटा लो नहीं तो सामाजिक बहिष्कार है जावैगो।’
‘हां वो तो है यार। ‘
अब हमने सोच राखी है अब कोई ऐसी तश्वीर नहीं रक्खूँगा जिसमें दाड़ी लटक रही हो।
आजकल तो अच्छे बाबान से हू विस्वास उठ रहो है।
‘अब ये समझ में नहीं आता है कि अच्छा कौन और बुरा कौन? आजकल चकचोंध ने सारे पैमाने बदल दिए है। जिसकी चमक दमक ज्यादा वो ही बड़ो।’
लेकिन प्यारे जो ज्यादा बड़ौ है वाही के कारनामें बड़े हैं। सब गुरु घन्टाल है रहे हैं।
‘हाँ सुख सागर अब कहाबत बदलने की जरूरत है।’
कौन सी ?
“गुरु करे जान के और पानी पियो छान के।”
अब कौन सी बदलोगे
“गुरु करो छान के और पानी पियो जान के।”
मतलब प्यारे?
मतलब तुम लगाओ सुखसागर मैं तब तक फोटो उतार दूं
प्यारे सिर खुजलाने लगे और चाय सटकने लगे।

 डॉ० राजीव पाण्डेय

शेयर करें

1 Comment

सम्पर्क में रहें

प्रसिद्ध रचनाएँ

पाठकों के पत्र

rajendra sharma