राष्ट्रीय रायता

राष्ट्रीय चीज़ों का अपना ही महत्त्व होता है। राष्ट्रीय होने पर उसके कुछ ख़ास होने का अंदाजा अपने आप लग जाता है। जब हमें राष्ट्रीय चीजों का चस्का लग जाता है तो स्थानीय या प्रांतीय चीज़ें फीकी लगने लगती हैं। मजा तो राष्ट्रीय आइटम का ही हैभले ही वो संगठन होएनजीओ होया कोई ट्रस्ट। अगर वह राष्ट्रीय न हुआ, तो क्या हुआ? शादी में कोई राष्ट्रीय मामाराष्ट्रीय ताऊ या राष्ट्रीय साली न हो, तो सारी रौनक बेअसर हो जाती है। शादी-वादी तो कतई नहीं लगती। अब आप पूछेंगे ताऊसाली मामा राष्ट्रीय कैसे हुए। देश के किसी भी प्रान्त में शादी हो अगर वहाँ दिल्ली से कोई रिश्तेदार आता है, तो वह राष्ट्रीय कहलाता है। सबकी निगाहें उसी पर रहती हैं। जीजा सीना ठोक कर बारातियों को बताता है- वो देखो मेरी राष्ट्रीय साली – दिल्ली वाली! भतीजा अपने दोस्तों पर रौब झाड़ता है- वो देखो ग्रीन सर्ट वाले मेरे राष्ट्रीय ताऊ! डायरेक्ट दिल्ली से पधारे हैं।… शादी-ब्याह हो या कोई और भी फंक्शन, दिल्ली वालों का अलग ही रुतबा और मिजाज़ रहता है। उनका चलना-फिरना, उठना-बैठनाउनका बोलना – बिल्कुल राष्ट्रीय!… और-तो-और, उनका छींकना भी राष्ट्रीय चिन्ता का विषय बन जाता है। खैर, हम यहाँ किसी और विषय पर चिंतन कर अपना और आपका समय नहीं बर्बाद करेंगे।

आइए, रायते पर एकाग्र होते हैं। भारत के किसी भी प्रान्त में कोई खाद्य पदार्थ बने तो वो प्रान्तीय ही कहलायेगा। लेकिन अगर वही डिश दिल्ली में बने, तो वह ‘राष्ट्रीय’ कहलाएगी। हालांकि ऐसा संविधान में नहीं लिखा है, फिर भी मन पापी यही मानता और कहता है। ‘मन की बात’ को कोई कैसे टाल सकता है? आजकल एक पार्टी के रायते के बड़े चर्चे हैं। राष्ट्रीय समाज में तो है ही, अन्तर्राष्ट्रीय समाज में भी है।… दिल्ली में पिछले दो-ढाई साल से एक पार्टी जमकर रायता बना रही है और सर्व कर रही है। उसी का ही रायता ट्रेंड में है – कश्मीर से कन्याकुमारी तक। बिना खर्चे के चर्चे – क़सम से लाजवाब! रायते में रोज़ाना नये-नये ट्विस्ट आते रहते हैं। आजकल रायते में तीखेपन पर बड़ी चर्चा है। रायता के एक्सपर्ट सर जी पर आरोप पर आरोप लग रहे हैं। शायद इसी से झल्लाकर उन्होंने रायते को तीखा कर दिया है। कुछ लोग तो ये भी कह रहे हैं कि अब रायता फैलने लगा है। अब रायते की डबल डोज़ दिल्ली सहित पूरे देश को मिल रही है। गुरु के संग चेला भी रायता बना रहा है। रायता बनाने का खेल लगभग तीन सालों से चल रहा है। कभी गुरु ने जंतर-मंतर पर बूँदी तलीदही मथीमसाला तैयार किया और चुनाव आते आते रायता तैयार हो गया। चुनाव के बाद सरकार बनी। सरकार बनते ही रायता फैलना शुरू हो गया। ऐसा रायता फैला कि दोबारा चुनाव हुए। दुबारा चुनाव में गजब की रायता सामाग्री हाथ लगी। सर जी गोलम गप्पा हो गए। सर जी की छल्ले-बल्ले हो गई। हाथ और मुंह रायते से लथपथ हो गए। आज सर जी के चेले जी अब रायता फैला रहे है।… और ऐसा फैला रहे हैं जिसके छीटों से सर जी पूरी तरह दागदार हो गए हैं। चेला तो गुरु से दो अंगुल आगे ऊँचा निकला। सर जी ने जो ‘रायता-रायता’ खेलना चालू किया था, अब वही खेल चेले जी खेल रहे हैं!…. खेल क्या रहे हैं, नख-शिख रायतामय हैं। उनके बदन से अब पसीने की जगह रायता ही टपक रहा है।…देशवासी रायते के आनन्द में डूबने को विवश हैं!

 ललित शौर्य

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