इण्डिया के सितारे

वे वैज्ञानिक थे और उनकी पत्नी थीं कवयित्री। हालाँकि वे खाते-पीते खानदानी थे, लेकिन दुर्भाग्य से भारत में पैदा हुए थे, जबकि उनके चचेरे और ममेरे भाई-बहन वाशिंगटन या लन्दन में। परास्नातक की पढ़ाई वे जैसे-तैसे पूरी कर चुके थे और अब ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में तहेदिल से लगे थे। इस आन्दोलन के कारणों की कमी न थी— यहाँ प्रतिभा का सम्मान नहीं होता; अच्छा वेतन नहीं मिलता; जहाँ देखो, भाई-भतीजावाद है; भ्रष्टाचार है; मनमाने नौकरशाह और मूर्ख राजनीतिज्ञ हैं !… एकदम दमघोंटू वातावरण। भला बताइए, इण्डिया कोई रहने लायक़ देश है?

चाचा, मामा, ताऊ आदि की कृपा से उन्हें लन्दन में सेटेल होने में शीघ्र ही सफलता मिली। परन्तु दुर्भाग्य की मनमानी देखिए कि तब तक उनका विवाह हो चुका था। विवाह क्या था, गले का ढोल था – बजाने की मजबूरी थी। वासना के सीवर को प्रेम के ढक्कन से ढकना ज़रूरी हो गया था।….

आज, आठ-दस वर्षों के बाद वे भारत, यानी अपने प्यारे देश, लौटे थे। पुराने मित्रों-रिश्तेदारों से मिलने-जुलने में एक सप्ताह बीत गया। उनके पुराने साथी-बाराती यहाँ रहकर कैसे आगे बढ़े थे – यह उनके लिए शोध का विषय था। एक विधान परिषद् का सदस्य था, तो दूसरा कुलपति हो गया था। तीसरा जिला जज था और हाई कोर्ट के जज बनने की जोड़-तोड़ में था। चौथा नामी डॉक्टर था, तो पाँचवा व्यापार मण्डल का अध्यक्ष।….. उनकी धर्मपत्नी की सहेलियाँ भी बड़े घरों-वाली हो चुकी थीं— एक मुख्यमन्त्री के निजी सचिव की पत्नी थी, तो दूसरी कन्या महाविद्यालय की प्रिंसिपल थी। तीसरी दूरदर्शन में समाचार वाचिका थी, तो चौथी फैशन डिज़ाइनर।…

उनकी पत्नी चूँकि कवयित्री थीं, इसलिए प्रवासी भारतीयों के सम्मान में एक साहित्यिक समारोह हुआ, जिसमें कई स्थानीय कवि-पत्रकार, व्यवसायी और वे सरकारी अधिकारी उपस्थित हुए, जो अधिकारी तो थे ही, कवि या चित्रकार अथवा, दोनों थे। समारोह की अध्यक्षता का भार एक रिटायर्ड आई. ए. एस. अधिकारी को सौंपा गया था, जो प्रवासी भारतीय के मोहल्ले की शान कहे जाते थे। ‘मुख्य अतिथि’ का दायित्व उनके ही अनुज, जो बुद्धिजीवी, किन्तु वरिष्ठ पी. सी. एस. अधिकारी थे और अपने बौद्धिक अहम के कारण प्रमोटेड आई. ए. एस. होते-होते रह गये थे।

मंच पर पाँच ही लोगों के बैठने की जगह थी, जिस पर क्रमशः कवयित्री, उनके पति महोदय, अध्यक्ष महोदय, मुख्य अतिथि और संचालक विराजमान हो गये थे। लेकिन तभी एक पूर्व अधिकारी भी कार्यक्रम में पधारे थे, जिन्होंने ऐन उस वक़्त नौकरी को लात मारी, जब वे नौकरी से डिसमिस किये जाने वाले थे। सुना जाता है कि अपना इस्तीफ़ा मंजूर करवाने के लिए उन्होंने बाज़ार से एक सुन्दरी लाकर डिसिप्लिनरी अथॉरिटी के पहलू में यह कहकर पहुँचा दी थी कि वह उसकी पत्नी है ! लेकिन डंके की मार के साथ जो सच निकला, वह यह है कि साहब ने इसलिए नौकरी छोड़ी, क्योंकि वे मूलतः कवि थे और कवि को परतन्त्रता कैसे रास आती ! बहरहाल, अब वे सफल व्यापारी थे और वक़्त निकाल कर कविता लिखते थे। उनकी कविताओं के बारे में भी यह प्रचलित था कि वे इतनी उच्च कोटि की हैं कि वे आम पाठकों या श्रोताओं के बस की नहीं हैं…। संयोग से वे प्रवासी भारतीय के सहपाठियों में से थे, अतः संचालक को मंच पर से उठाकर उन्हें ‘विशिष्ट अतिथि’ के नवसृजित आसन पर बैठाया गया।

कार्यक्रम संचालक के लिए चूँकि मंच पर स्थान नहीं था, अतः उसके लिए मंच के पास एक अलग से एक आसन की व्यवस्था की गयी थी, जैसे विवाह के अवसर पर द्वारचार में ब्राह्मण के लिए की जाती है।… आमन्त्रित कविगण और कवयित्रियाँ तथा सम्मानित श्रोतागण दर्शक दीर्घा में पदस्थ थे। उनमें से कुछ लोगों को संचालक के फेर-बदल वाली व्यवस्था अच्छी न लगी, लेकिन संचालक के उत्साह में कोई कमी न थी। मंच पर से उठाये जाने के वाबजूद वह अपने सञ्चालन-कौशल के प्रदर्शन को आतुर था।

कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। सभी स्थानीय कवि-गवैये अपनी-अपनी रचना ऐसे प्रस्तुत कर रहे थे, जैसे उनके लिए यह परीक्षा की घड़ी हो। अगर पास हो गये, तो काव्यपाठ के लिए सीधे लन्दन बुला लिये जायेंगे। कुछ कवियों ने वाक़ई अच्छा पढ़ा। कवयित्रियाँ तो हमेशा ही जमती है, यहाँ भी जमीं, क्योंकि वे क्या पढ़ रही हैं, श्रोताओं से इससे कुछ सरोकार नहीं होता। वे कैसे पढ़ रही है और कैसी दिख रही हैं, यही उनकी सफलता का पैमाना है ! संचालक ने कार्यक्रम जमाने के लिए अपने, अपने वरिष्ठों सहित मीरोग़ालिब के अशआर के ख़ूब छींटे मारे और बात-बेबात तालियाँ भी बजायीं-बजवायीं, लेकिन वह बात नहीं आ सकी, जिसकी कल्पना आयोजकों ने की होगी।

कविता-पाठ का कार्यक्रम आख़िर मंच तक पहुँचा। प्रवासी कवयित्री ने मंच से श्रीगणेश किया। उन्होंने कुछ प्रकृति के सौन्दर्य को समेटते कुछ छन्द पढ़े। आवाज़ सुरीली थी, हाव-भाव भी कवयित्रियों वाले। जल्द ही जम गयीं। लेकिन जितनी जल्दी जमीं, उतनी-ही जल्दी उखड़ भी गयीं। कारण— उन्होंने स्त्री-विमर्श के नाम पर फ्री वर्स की कई रद्दी कविताएँ पढ़ीं। जानकार श्रोताओं, जिनमें कवि ही अधिक थे, ने तो यहाँ तक कह दिया कि छन्द चोरी के होंगे ! कवयित्री को मन मसोस कर बैठना पड़ा। फिर विशिष्ट अतिथि ने रंग जमाने की कोशिश की, पर असफल रहा। शायद मंच का श्रीगणेश ही गड़बड़ा गया था ! मुख्य अतिथि ने भी मोर्चा सँभालने की खूब कोशिश की, लेकिन बात न बनी। श्रोताओं ने उनकी तथाकथित प्रगतिशील गद्य कविता को गले न लगा सके। माननीय अध्यक्ष कुछ कारनामा दिखाते, उससे पहले प्रवासी महोदय को ‘दो शब्द’ कहने थे।

काव्य-रचनाओं के रस अथवा उनकी नीरसता से स्वयं को पूरी तरह बचाते हुए प्रवासी भारतीय ने अपने भाषण में बताया कि वे अभी भी अपने देश से उतना ही प्यार करते हैं, जितना कि पहले, जब वे यहाँ रहते थे। बल्कि कोई माने या न माने, सच तो यह है कि अब वे पहले से भी अधिक प्यार करते हैं। उन्होंने घोषणात्मक लहजे में सूचना दी कि उनका शरीर भले ही भारत में नहीं रहता हो, लेकिन उनकी आत्मा (जो शायद अभी भी बची हुई थी) यहीं वास करती है, क्योंकि, ‘भारतभूमि स्वर्गादपि गरीयसी !’…. उन्होंने इसके समर्थन में अपनी अन्तिम इच्छा भी प्रकट की कि उनका पञ्चतत्त्व भारत में ही विलीन हो। उनकी इस बात पर सभी ने ज़ोरदार तालियाँ बजायीं। उन्होंने सगर्व सूचित किया कि उनके बच्चे भी भारत से बहुत प्यार करते हैं और वे हर साल जाड़े की छुट्टियों में भारत आने के लिए ज़िद करते हैं, पर आर्थिक कारणों से ऐसा संभव नहीं हो पाता !

कुल मिलाकर, ऐसा लग रहा था कि भारत की महानता उनसे समेटी नहीं जा रही थी—यहाँ का मौसम, यहाँ की गंगा-जमुनी संस्कृति, यहाँ की नदियाँ, यहाँ के पहाड़, यहाँ के गुलाबों की ख़ुशबू…. वाह! कितना अद्वितीय है ! उन्होंने बताया कि वहाँ के गुलाबों में सिर्फ़ रंग होता है, ख़ुशबू नहीं होती। ख़ुशबू और रंग यहीं के गुलाबों में पाये जाते हैं। यह हमारी भारत माता की देन है !… उन्होंने लगभग शिक्षित करने के लहजे में बताया कि यहाँ के मन्दिर आत्मिक शान्ति प्रदान करने वाले हैं…. और शायद आपको मालूम हो कि भारत में टूरिज़्म की सफलता का राज़ यहाँ के मन्दिर ही हैं। जितना ‘फ़ॉरेक्स’ इंडिया को विदेशी पर्यटकों से मिलता है, उतना शायद किसी भी विकासशील देश को नहीं मिलता ! उन्होंने बड़ी लाचारी व्यक्त करते हुए कहा कि अपना देश छोड़कर जाने का उनका मन तो नहीं होता, लेकिन इश्वर ने जहाँ उनकी कर्मभूमि बनायी है, वहाँ जाना ही पड़ेगा; कर्म तो करना ही पड़ेगा !….

एक बार फिर तालियाँ बज उठीं। श्रोताओं में से किसी ने चुटकी ली, “जब इतना देशप्रेम उमड़ रहा है, तो वहाँ क्या घुइयाँ छीलने जा रहे हो ?”

वे सुनकर भी नहीं सुनने का अभिनय कर रहे थे। आयोजक तिलमिलाकर रह गये थे। संचालक ने अध्यक्षीय वक्तव्य एवं काव्य-पाठ के लिए समारोह के अध्यक्ष को आहूत किया। इसके लिए उससे जितनी चापलूसी हो सकती थी, उसने पूरी ताक़त से की। अध्यक्ष ने अपने वक्तव्य में बताया कि सम्मानित अतिथियों के लन्दन में बस जाने से भारत का गौरव बढ़ा है, क्योंकि लन्दन हो या वाशिंगटन, भारत की प्रतिभाओं के बिना वे पंगु हैं। उन्होंने पुलकित होते हुए बताया कि दुनिया के विकसित देशों में जितने वैज्ञानिक, डॉक्टर और इंजीनियर हैं, उनमें से चालीस प्रतिशत भारतीय मूल के हैं। और तो और, ‘नासा’ के आधे वैज्ञानिक भारत के ही हैं। इस प्रकार, वे भारत को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति दिलवा रहे हैं।…. हमें उनका आभारी होना चाहिए।…. हम उनके आभारी हैं !

संचालक ने तालियाँ बजाकर संकेत किया कि तालियाँ बजनी चाहिए। बजी भीं। कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हो चुका था। अचानक श्रोताओं में से कहीं से आवाज़ आयी, “भैया, दो सौ साल पुरानी ग़ुलामी है, पचास में कैसे चली जाए ?”

चाय-पानी के शोरगुल में यह बात वैसे ही गुम हो गयी थी जैसे विदेशी चमक-दमक में सम्मानित अतिथियों की भारतीयता !

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