छेड़-छाड़

आदमी चाहे कितना भी बड़ा हो जाये, चाहे वह कुछ भी बन जाए कितना भी बड़ा लक्ष्मीपति, कितना भी बड़ा समाज सेवी और कितना भी बड़ा राजनेता हो जाये, वह चाहे कितने ही ऊँचे से ऊँचे पद पर पहुँच जाये पर सब में एक बहुत बड़ी बीमारी होती है किसी न किसी वस्तु या व्यक्ति को छेड़ने की। वह अपनी आदत के अनुसार कुछ न कुछ छेड़ता ही रहता है। उस की अंगुलियाँ और दिमाग कभी चुप बैठते ही नहीं हैं, और यहाँ तक कि जब उसे कोई वस्तु या व्यक्ति छेड़ने को नहीं मिलता तो वह स्वयम को ही छेड़ना शुरू कर देता है।

परन्तु वह कोशिश करता है कि वह किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति को छेड़े। इस का एक बहुत अच्छा उदाहरण गणतन्त्र दिवस पर भारत के सबसे बड़े समारोह में सबसे शक्तिशाली देश के नेता का देखने मिला। जिस शख्सियत के इशारे पर ही दुनिया हिल जाती है और जिस के पलक झपकने मात्र से कितने ही लोग हाजिर हो जाते हैं उस ने भी मंच पर आते ही माइको को छेड़ना शुरू कर दिया। अब उन्हें यह तो पता ही होगा कि मेजबान देश ने उन के लिए बहुत अच्छी तरह से माइक सेट किये होंगे परन्तु फिर भी वह अपनी मनुष्यगत स्वाभाविक बीमारी से बाज नहीं आये और मंच पर आते ही माइको से छेड़ छाड़ शुरू कर दी। यह आप सब ने ही देखा होगा।

इतना ही नहीं इस शास्वत मनुश्यगत बीमारी के कारण जब उन्होंने भाषण देना शुरू किया तो कई बड़े-बड़े देशों को छेड़ना शुरू कर दिया। जिस की खूब प्रतिक्रिया भी हुई। परन्तु व्यक्ति को इस से क्या, प्रतिक्रिया हो तो हो, इस में वह क्या करे क्या वह दूसरों की प्रतिक्रिया के डर से अपना छेड़ने का मनुष्यगत अधिकार भला कैसे छोड़ दे। बताओ यह कैसे सम्भव हो सकता है?

आप से मैं इस लिए पूछ रहा हूँ कि आप को हाँ भरनी ही पड़ेगी क्योंकि आप कौन से कम हैं? आप में भी तो यह छेड़ने की बीमारी वंशानुगत रूप से बचपन से ही है। अब इस लिए उसे चुपचाप माँन लो अगर नहीं मानोगे तो मैं आप को मनवा कर ही छोड़ूंगा और आप को मानना ही पड़ेगा। जब आप बचपन में सरकना ही शुरू करते हैं तो हमारे अंदर छुपी हुई छेड़छाड़ की बीमारी भी सरकने के साथ-साथ बढ़ने लगती है। इसीलिए हम सरकते-सरकते घर की प्रत्येक न छेड़ने वाली चीजों को छेड़ना शुरू कर देते हैं।

घर की हर वस्तु को घरवाले सम्भालना शुरू कर देते है ताकि आप उन्हें न छेड़ो। इतना ही नहीं जो दादा जी आप को प्यार से गोद में उठाते हैं आप उन्ही दादा जी की ऐनक खिंच लेते हो उन के जेब से कुछ भी खींचना शुरू कर देते हो दादी जी के कान के कुंडल खींच कर बड़े खुश होते हो। कई बार तो एकदम गर्म वस्तु को ही छेड़ देते हो और फिर गला फाड़ कर चिल्लाते हो अब इन से पूछो कि भाई आप को एक जगह चुपचाप बैठाया था, वहीं बैठो, गर्म खोलते पानी को क्यों छेड़ने गए थे? क्योंकि यह बीमारी तो आप के अंदर जन्मजात है क्योंकि तुम्हारे बाप ने भी ऐसा ही किया था बस फर्क इतना था कि उसने अपने बाप की हुक्के की चिलम तोड़ी थी और तुम अपने डैडी जी का मोबाइल फोन उठा कर नीचे फैंक देते हो। पर छेड़ने से बाज नहीं आते हो क्योंकि यह छेड़ना तो पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है।

बचपन के बाद जब बड़े हो जाते हो, बड़े यानि जब अपने आप को कुछ समझने लगते हो तो तुम्हारी छेड़छाड़ कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है क्योंकि पहले बचपन में तो घर के जूते चप्पलों को छेड़ते थे पर अब तो बड़े होने पर जूते चप्पल सर पर खाने के लिए छेड़ते हो अब बताओ यह जूते चप्पल खाने की आदत आखिर कब तक रहेगी यह बुरी बात है। बचपन में तो चप्पल उठा कर सीधे मुंह में जाती थी पर अब सीधी सर पर जाती है। पर जैसे तैसे थोड़ा बहुत सुधार होता है तो घर वाले छेड़ने के लिए पत्नी का इंतजाम करते हैं पर उस समय भी बाज नहीं आते हो पत्नी के मायके में उसे छेड़ने के बजाय उसकी बहनों को छेड़ने की कोशिश करते हो। पर अब उल्टा हो जाता है अब आप पत्नी को नहीं छेड़ते हो बल्कि पत्नी ही आप को छेड़ती है। वह आप के दफ्तर से आते ही आप की माँ की कथा सुना-सुना कर आप को छेड़ती है। वह आप की माँ ही क्या घर के दुसरे लोगों को भी नहीं छोड़ती है क्योंकि वे कौन से कम हैं वे भी उसे उस के मायके से आते ही छेड़ना शुरू कर देते हैं और उसे ही नहीं उसकी माँ – बाप को भी छेड़ते हैं कि तेरी माँ ने क्या सिखाया था तुझे इतना भी नहीं आता आदि – आदि।

परन्तु तुम भी तो इस की माँ जैसी ही हो माँ बनो न इस की। उस माँ ने नहीं सिखाया तो तुम सिखा लो क्योंकि अब तो जीवन भर इसे यहीं रहना है। पर नहीं ऐसा कौन सोचता है अपितु बात बात पर उस के पीहर वालों तक को छेड़ने से बाज नहीं आते हो तो आखिर सहन करने की भी एक हद होती है और जब उस के साथ छेड़ने की हद ज्यादा बढ़ जाती है तो वह भी छेड़ने लगती हैं और ऐसा छेड़ती है कि कई बार तो जेल की हवा खिलवा देती है पर छेड़ने की आदत किसी की नहीं जाती है। कई बार तो आदमी को खुद भी पता नहीं होता कि वह किसी को छेड़ रहा होता है।

वह न चाहते हुए भी छेड़ता रहता है। जब वह किसी पेड़ के नीचे से जाता है तो बिना बात उस के पत्ते ही छेड़ने लगता है। अब उसे पूछो कि भाई बिना बात पत्ते क्यों तोड़ रहे हो और बिना पत्तों के पेड़ की छया कैसे होगी और यह इतना बड़ा पेड़ तुलसी का पैदा भी नहीं है कि बहाना बना दो कि चाय में डालने के लिए पत्ते तोड़ रहा था और न ही यह पान का पेड़ है क्योंकि पान की बेल होती है पेड़ नहीं कि आप कहें कि मुंह को रंगने के लिए पत्ता तोड़ रहा था। इन में से किसी भी काम ये पत्ते नहीं आने वाले हैं और ऐसा भी नहीं तुम कुछ देर इन्हे हाथ में रख कर प्रेमिका के बालों में फूलों की तरह इस पत्ते को वापिस लगा दोगे । पर नहीं तुम्हे तो बस चलते चलते हरेक चीज को छेड़ना ही है पर यदि ऐसा ही कोई पेड़ के पत्तो की भांति तुम्हारे बाल खींचे तो कैसा लगेगा। इसी तरह पेड़ को भी लगता है।

इसी तरह पार्क में टहलते – टहलते जब तुम तक हार कर हरी हरी मखमली सुंदर सी घास पर आराम करने बैठ जाते हो, बैठते ही उसे छेड़ना शुरू कर देते हो। बिना बात उसे उखाड़ना शुरू कर देते हो। पर आप से कोई पूछे कि भाई आप ऐसा क्यों कर रहे हो तो भला आप क्या उत्तर देंगे। क्या आप इसे खाने के लिए तोड़ रहे हो पर आप तो गाय, भैंस या बकरी तो हैं नहीं जो घास खाओगे और इसे खा कर दूध दोगे। पर नहीं फिर भी आप इसे कहने की कोशिश करते हो और बिना बात मुंह में भी चबाने लगते हो क्योंकि आप को हरेक चीज को छेड़ने की बीमारी है।

और जब आप पार्क से घास खा कर घर जाते हो तो घर में आप को भी छेड़ने वाले पहले से ही तैयार होते हैं और वे आप के घर में घुसते ही आप को छेड़ना शुरू कर देते हैं कि कर आये दो घंटे बर्बाद वहां क्या तेरी माँ नाच रही थी घर का कोई काम तो दिखाई देता ही नहीं है घर में भला मन कहाँ लगता है यदि आप अभी पढ़ाई करते हैं तो कहेंगे कि बस पढ़ने के लिए ही समय नहीं है बाकी काम के लिए समय ही समय है और यदि आप शादीशुदा हैं तो आप को और भी अच्छी तरह पता होगा कि आप को क्या सुनना पड़ता होगा। और जब ऐसे स्थिति में तुम किसी को नहीं छेड़ सकते तो स्वयं को ही छेड़ने लगते हो। कभी बाल खुजलाते हो कभी बालों को उमेंठते हो कभी कान खुजलाते हो और कभी कहीं खुजलाते हो।

इतना ही नहीं आदमी पता नहीं क्या क्या छेड़ता रहता है। वह छेड़े बिना न तो कुदरत को छोड़ता है और न ही भगवान जी को। वह भगवान विष्णु जी की घरवाली को खूब बहकाने की कोशिश करता है वह उसे बढ़िया – बढ़िया मिठाई व फल आदि अर्पित करता है और उन के पति जी को पूछता ही नहीं है। अब उसे पूछो कि यदि कोई तुम्हारी घरवाली को कोई बार – बार बुलाये और तुम्हें न बुलाये तो कैसा लगेगा तुम तो लठ्ठ लेकर आ जाओगे उसे मरने के लिए। तो ऐसे ही भगवान जी को भी गुस्सा आ सकता है। पर यदि बिना छेड़े थोड़ा अक्ल से काम लो, भगवान जी की सेवा करो उन्हें बार बार बुलाओ तो वे स्वयं तो आएंगे ही लक्ष्मी को भी ले आएंगे।

परन्तु मुझे लगता है आदमी जिंदगी भर छेड़ने की आदत से बाज नहीं आएगा। इसलिए छेड़ना ही है तो कुछ ऐसा छेड़ो कि जिस से समाज का भी भला हो, देश का भी भला हो और आप का भी भला हो जाये। इस लिए छेड़ना ही है तो सफाई अभियान छेड़ो, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, अभियान छेड़ो ,भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान छेड़ो ऐसे ही और भी कितने ही काम हैं जिन्हे आप भलाई के लिए छेड़ सकते हैं उससे छेड़ने वाले का भी भला होगा और यदि कुछ भी नहीं छेड़ सकते तो जिन्होंने पहले से ऐसे काम छेड़े हुए हैं उनका ही छेड़ने में सहयोग करने लगो जिससे देश व दुनिया का भला हो जाये।

 डॉ. वेद व्यथित

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