पुराना खत | संघर्ष

कविता – पुराना खत
लम्हा लम्हा जब – जब
पुराना खत खोलती हूँ
आज भी एक भीनी सी खुशबू उठती है
खत के बीच पड़ा गुलाब सूख चुका है
गर्मी की खुश्क हवा में
ताजगी का अहसास दिलाता है
आज सब कुछ तो बदल गया जिन्दगी में
चुटकी भर बस यादें रह गई है
जब भी सामने आती है जम के बरसती है
और भिगो जाती है तन – मन को
महसूस कराती है बीते दिनों की बीती बातों को
वक्त बढ़ गया , पर यादें तो वहीं टिकी है
मन के किसी कौने में
जितना इन्हें भुलाने की कोशिश करो
पीछा नही छोडती सामने आ ही जाती हैं
ये खत भी अब उस बुलंद इमारत की तरह हो गया
जो जीर्ण – शीर्ण होने पर भी
अपना अस्तित्व बनाये हुए है
इसके जरिये फिर से यादों के झरोखे में जा बैठती हूँ
ये खत मुझे फिर उन्ही पलो में ले जाता है
जहाँ भविश्य के सपनो से जीवन सजाया था!

 

लघुकथा – संघर्ष
यह उस लड़की की कहानी है जिसे अपने भाग्य और मजबूरी के आगे घुटने नहीं टेके, और इन दोनों से पूरी टक्कर ले कर अपनी मंजिल हासिल कर ली। हाँ, नंदिता ही तो था उसका नाम, खूबसूरत छरहरी युवती। गरीब घर से से थी लेकिन पढने में भी अव्वल 12वीं कक्षा में 15 अंक उसने लेकर अपने माता – पिता का सर ऊंचा कर दिया था। गार्गी कालेज से इंग्लिश ओनर्स कर रही थी। पड़ोस का एक लड़का उससे दोस्ती बढाने को उत्सुक था, लेकिन वह उसे भाव नहीं देती थी। उसका ध्येय था पढ़ – लिख कर लेक्चरार बनना, एक दिन उस लड़के ने गुस्से में आकर तेजाब फेकने की कोशिश की उसने भाग कर तो खुद को तो बचा लिया, लेकिन भागते वक्त एक मोटर साईकिल से टकरा कर गिर पड़ी, उसकी कमर की हड्डी में फ्रेक्चर हो गया। अब वह हमेशा के लिए बिस्तर पर थी। चलना तो दूर बैठ भी नहीं सकती थी। घर बहुत आर्थिक तंगी थी साथ में इतनी बड़ी परेशानी, डाक्टर कहते थे ओपरेशन से कुछ फायदा हो सकता है लेकिन परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे

लेकिन नंदिता हार कब मानने वाली थी। उसने माँ को कहा कि मैं लोंगो के लिए ही स्वेटर बुनूँगी उस वक्त रेडिमेट स्वेटर नहीं मिला करते थे। महिलाएँ फुर्सत में परिवार के लिए स्वेटर बुनती थी। उसे आस पड़ोस से काम मिलने लगा, वह बिस्तर पर लेटे – लेटे दो – दो दिन में एक स्वेटर बना लेती, और वक्त निकल कर अपनी पढाई भी पूरी करने लगी। कुछ ही महीनों के भीतर उसने अपने ओपरेशन के पैसे जमा कर लिए।

भगवान की कृपा से उसका ओपरेशन सफल हुआ उसने प्राइवेट इम्तिहान दे कर इंग्लिश ओनर्स में पहले  फिर मास्टर्स की डिग्री हासिल की। अब वह बैसाखी के सहारे चलने लगी थी। आज वह इंग्लिश की लेक्चरार है।नंदिता ने अपनी मेहनत लगन और हिम्मत के बल पर जहाँ चाह, वहां राह वाली कहावत को चरितार्थ कर जीत हासिल कर ली।

 सरोज उप्रेती

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