रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा – पिता जी के साथ प्रवास

मेरे सिर मुंडन के कारण, मौजी बंधन समारम्भ के बाद मुझे एक बड़ी चिंता उत्पन हुई। गाय के दूध से तैयार होने वाले सन्देश, रसगुल्ला आदि पदार्थों के सम्बन्ध में यूरेशियन लडकों का कितना ही अच्छा मत हुआ तो भी ब्राह्मणों के सम्बन्ध में उनमें आदर बुद्धि का पूर्ण अभाव रहता है। हमसे छेड़खानी करने के उनके पास जो अनेक शस्त्रास्त्र होते हैं, उन पर विचार न भी किया जाय तो भी हमारा मुंडन किया हुआ सिर ही छेड़खानी के लिए काफी था। इसलिए मुझे चिन्ता थी कि शाला में जाते ही अपनी छेड़खानी बिना हुए न रहेगी। ऐसी चिन्ता के दिनों में एक दिन मेरे पिता ने मुझे ऊपर बुलाकर पूछा कि क्या तुझे मेरे साथ हिमालय चलना रुचिकर मालूम होता है? मैं विचारने लगा ‘बंगाल एकेडेमी’ से दूर जाना और वो भी हिमालय पर, इस बात से मुझे जितना आनन्द हुआ वह बतलाने के लिए यदि मुझमें आकाश को आनन्द स्वर से गुंजा देने की आज शक्ति होती तो कितना अच्छा होता?

हमारे जाने के दिन मेरे पिता ने सदा के रिवाज के अनुसार परमेश्वर की प्रार्थना करने के लिए घर के सब लोगों को प्रार्थना मन्दिर में एकत्रित किया। प्रार्थना समाप्त हो जाने पर अपने गुरुजनों का चरण स्पर्श करके पिताजी के साथ मैं गाड़ी में जा बैठा। मेरे लिए सम्पूर्ण पोशाक बनने का मेरे अब तक के जीवन में यह पहला ही अवसर था। मेरे पिताजी ने स्वतः कपड़े और रंग का चुनाव किया था। नवीन वस्त्रों में जरी के बेल-बूटों वाली मखमली टोपी भी थी। उस पर मेरे केश रहित मस्तक के सानिध्य से न मालूम क्या परिणाम हो, इस भय से मैंने वह टोपी हाथ में ही ले ली थी। परन्तु गाड़ी में बैठते ही टोपी लगाने की पिताजी की आज्ञा मिलने से मुझे टोपी लगानी ही पड़ी। पिताजी की नजर फिरते ही टोपी भी सिर से अलग हो जाती थी और ज्यों ही उनकी नजर इस ओर हुई कि वह भी अपने स्थान पर विराजमान हो जाती थी।

अपनी व्यवस्था ओर आज्ञा के सम्बन्ध में मेरे पिता बड़ी छानबीन करते थे। कोई भी बात संदिग्ध अथवा अनिश्चित रहने देना, उन्हें पसन्द नहीं था ओर न कुछ सबब बतलाकर टालमटूल करना ही उन्हें अच्छा लगता था। परस्पर के सम्बन्ध को नियमित करने के लिए उन्होंने नियम बना दिए थे। अपने देश बंधुओं के बहु-जन-समाज से इस बात में वे बिलकुल भिन्न थे।

हम लोग, यदि एक दूसरे के साथ व्यवहार करने में बेपरवाही कर जाते हैं तो कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। परन्तु उनके साथ व्यवहार करने में हमें परिश्रम करके भी बहुत कुछ व्यवस्थित रहना ही पड़ता था। काम थोड़ा हुआ या बहुत, इसके सम्बन्ध में वे कुछ नहीं बोलते थे, पर काम जिस प्रकार का होना चाहिए, यदि उस प्रकार का नहीं होता था तो वे बिगड़ उठते थे। वे जो काम करवाना चाहते थे, उसकी छोटी-से-छोटी बात निश्चित कर देने की उनकी आदत थी। घर में यदि कोई उत्सव होने वाला होता और वे उस समय यदि घर में नहीं रह सकते तो कौन-सी वस्तु कहाँ रखी जाय, कौन-सा अतिथि कहाँ ठहराया जाय आदि सब बातें स्वयं निश्चित कर देते थे। कोई भी बात उनकी नजर से नहीं छूटती थी। उत्सव हो जाने पर सब लोगों को बुलाते और अपने ठहराये हुए कामों का सब वर्णन सुनकर फिर अपने मन में निश्चित करते थे कि उत्सव किस प्रकार का हुआ होगा। इसी कारण प्रवास में उनके साथ रहते समय मुझे मनोविनोद करने में किसी प्रकार की रुकावट नहीं थी, पर दूसरी बातों में उन्होंने जो मार्ग निश्चित कर दिया था, उससे दूर,जाने का मुझे बिलकुल भी अवसर नहीं था।

हमारा पहला मुकाम बोलपुर में होने वाला था। थोड़़े दिनों पहिले सत्य भी अपने माता-पिता के साथ बोलपुर जाकर लौट आया था। उसने हमसे अपने प्रवास का जो वर्णन किया था, उस वर्णन को उन्नीसवीं शताब्दी के किसी भी स्वाभिमानी बालक ने रत्तीभर भी महत्व नहीं दिया होता। हमारी मनोभावना ही भिन्न प्रकार की थी। शक्यता और अशक्यता के अन्त को जान लेने की क्रिया सीखने का पहले हमें कभी अवसर भी नहीं मिला था। यद्यपि महाभारत और रामायण की पुस्तकें हमने बाँची थीं पर उन्होंने भी हमें इस विषय में कुछ नहीं सिखलाया था। लड़कों को अनुकरण करने का मार्ग सिखाने वाली बालकोपयोगी सचित्र पुस्तकें भी उस काल में प्रचलित नहीं थी। इसलिए जगत के नियमन करने वाले नकद नियमों का ज्ञान हमें ठोकरें लगने से ही हुआ।

सत्य ने हमसे कहा था कि जो मनुष्य बहुत अनुभवी न हो उसका रेलगाड़ी में चढ़ना बहुत धोखे का काम है। जरा चूके कि गए, मामला खत्म हुआ। उसने हमसे यह भी कहा था कि, रेलगाड़ी के चलते समय अपनी जगह को जितना हो सके, उतने बल से पकड़कर रखना चाहिए, नहीं तो गाड़ी के धक्के से मनुष्य कहाँ जा गिरेगा, यह नहीं कहा जा सकता। उसके इस कहने पर से जब मैं स्टेशन पर पहुँचा तो थर-थर काँपने लगा। हम लोगों के इतनी सहज रीति से डिब्बे में चढ़़ जाने पर भी मुझे यही विश्वास रहा कि कठिन प्रसंग तो अब आगे आने वाला है। अन्त में जब गाड़ी चलने लगी और संकट का कोई भी चिह्न दिखलाई नहीं पड़़ा, तब मुझे धीरज बंधा और बड़ी निराशा हुई।

गाड़ी वेगपूर्वक चलने लगी। दूर-दूर तक फैले हुए बड़े-बड़े खेत, उनकी मेड़ों पर जमुनी और हरे रंग के वृक्ष, उन वृक्षों की गहरी छाया में स्थिर गाँव, चित्र के समान एक के बाद एक आते और मृग-जल के पूर के समान हो जाते थे। हम जब बोलपुर पहूँचे, तब संध्या हो गई थी। म्याने मैं बैठते ही मेरे नेत्र झपकने लगे। जगने पर प्रात:काल के प्रकाश में मेरा देखा दुआ दृश्य ज्यों का त्यों दिखे, इसलिए उस आश्चर्यजनक दृश्य को संभालकर रखने की मेरी इच्छा थी। मुझे यह भय मालूम होने लगा कि संध्याकाल के धुँधले प्रकाश में यदि नेत्र खुले रख कर उस दृश्य के कुछ भाग का हम अवलोकन करेंगे तो प्रात:काल के आनन्ददायक समय में उस सौंदर्य का जो मधुर अनुभव हमको मिलेगा, उसकी नवीनता कम हो जायेगी।

सुबह जगकर जब मैं बाहर आया तो उस समय भी अन्त:करण थर – थर काँप रहा था। मेरे पहले जिन्होंने बोलपुर देखा था, उन्होंने कहा था कि जगत् में कहीं न मिलने वाली एक बात बोलपुर में है। वह एक रास्ता है जो कि मुख्य धवन से लेकर नौकरों के रहने के स्थान तक गया है। इस पर चलने वालों को न तो धूप लगनी है और न वर्षा के दिनों में पानी की बूंद उन पर गिरती है। जब में बोलपुर पहुँचा तो रास्ते को ढूँढने लगा, पर मेरा सारा परिश्रम व्यर्थ गया और यह सुनकर शायद पाठकों को आश्चर्य न होगा कि आज तक भी उस रास्ते का मुझे पता न लगा।

मेरा पालन-पोषण शहर में होने के कारण इस समय तक मैंने गेहूँ के खेत नहीं देखे थे। ग्वालों के बच्चों के सम्बन्ध में मैंने पुस्तक में पढ़ा था और अपनी कल्पना-शक्ति के चित्रपट पर उनकी एक सुन्दर प्रतिमा भी बनाई थी। सत्य ने मुझसे कहा था कि बोलपुर में घर के आस-पास पके हुए गेहूँ के खेत हैं, उनमें ग्वाल बालों के साथ रोज खेल खेला करते हैं। खेल में मुख्य काम बाल को तोड़ना, पूँजना और फिर मसलकर खाने का होता है। बोलपुर में जाकर जब मैंने बड़ी उत्सुकता से देखा तो वहाँ पड़ती जमीन पर गेहूँ के खेत का नाम भी नहीं, आसपास भले ही ग्वालों के लड़के होंगे पर दूसरे लड़कों के समूह में उन्हें कैसे पहचाना जाय, यह एक बड़़ा प्रश्न था।

मुझे जो बात नहीं दिखी, उसे मन में से निकाल लेने को बहुत समय नहीं लगा, क्योंकि मैंने जो कुछ देखा, मेरे लिए वही भरपूर था। इस स्थान पर नौकरों का शासन नहीं था और मेरे आसपास जो रेखा खिंची हुई थी, वह इस एकान्त स्थान को अधिष्ठात्री स्वामिनी (प्रकृति) द्वारा खींची हुई क्षितिज पर की रेखा थी। इस रेखा के भीतर अपनी इच्छानुसार इधर-उधर भटकने को मैं स्वतन्त्र था।

इस समय में छोटा बालक ही था तो भी मुझे भटकने में पिताजी की कोई रोक-टोक नहीं थी। रेतीली जमीन में बरसाती पानी के कारण जगह-जगह गड्ढे हो गये थे और स्थान-स्थान पर छोटी-छोटी टेकरियाँ बन गई थी, जिन पर बहुत से भिन्न – भिन्न आकार के पत्थर पड़े हुए थे। इन टेकरियों पर छोटे-छोटे झरने बहते थे, जिन सबों से मानो गुलीवर के वृत्तान्त को बड़ी शोभा प्राप्त हो गई थी।

मैं इस स्थान से भिन्न-भिन्न आकार और रंग के छोटे-छोटे पत्थर इकट्ठे करके अपने कोट में भरकर पिताजी के पास ले आता था। पिताजी ने इस परिश्रम की कभी अवहेलना नहीं की, प्रत्युत उत्साहपूर्ण शब्दों में वे सदा यही कहते थे -वाह! क्या अच्छे हैं। अरे! तुझे ये कहाँ मिले?

मैं तुरन्त ही उत्तर देता था कि अभी तो और भी वहाँ मिलेंगे, हजारों लाखों मिल सकते हैं, कुछ कमी थोड़़े ही है? मैं रोज इतने ही ले आया करूँगा। इसके उत्तर में वे कहते थे बहुत अच्छी बात है। हमारी उस छोटी-सी टेकरी को इन पत्थरों से तू क्यों नहीं सिंगारता है ?

हमारे बाग में एक हौज बनवाने का प्रयत्न हुआ था, परन्तु जमीन मे पानी बहुत गहरा होने के कारण खोदने का काम बीच में ही बंद कर दिया गया। खोदने से निकली हुई मिट्टी का एक स्थान पर ढ़ेर कर दिया था। इस ढ़ेर की एक टेकरी-सी बन गई थी, जिसकी शिखर पर बैठकर पिताजी उपासना किया करते थे। उनकी उपासना के समय ही, उनके सम्मुख पूर्व दिशा में क्षितिज से धिरे हुए और आन्दोलित होने वाले भू-पृष्ठ पर सूर्योदय हुआ करता था। मुझे जिस टेकरी को सिंगारने के लिए कहा गया था, यह वही टेकरी थी। जब हम बोलपुर छोड़कर जाने लगे, तब मेरे इकट्ठे किए हुए सब पत्थर मुझे वहीं छोड़ने पड़़े। इससे मुझे बड़ा दुख हुआ। वस्तुओं को संग्रह करने के एक मात्र कारण से उन वस्तुओं से निकट सम्बन्ध रखने का हमें कोई अधिकार नहीं है। इस बात का ज्ञान होना आज भी मुझे कठिन प्रतीत होता है। इतने भारी आग्रह से की हुई मेरी विनती मेरे देव ने यदि स्वीकार की होती और उन पत्थरों का बोझ वह सदा मेरे पास रहने देता तो आज देव को मैं जितना निष्ठुर मानता हूँ उतना निष्ठुर मानने का शायद प्रसंग ही नहीं आया होता।

एक बार एक दर्रे में मुझे एक झिरा दिखा। उसमें से छोटी नदी के समान पानी बह रहा था। छोटी-छोटी मछलियाँ भी थी और प्रवाह के विरुद्ध चलने का प्रयत्न कर रही थी।

मैंने अपने पिताजी से कहा कि मुझे एक सुन्दर झिर मिली है। क्या वहाँ से आपके स्नान और पीने के लिए पानी नहीं लाया जा सकता?

मेरे विचार उन्हें मान्य हुए ओर वे कहने लगे कि मैं भी तुझसे यही कहना चाहता था। फिर उस झिरे से पानी लाने के लिए उन्होंने नौकर को आज्ञा दे दी।

पहले जिन बातों का ज्ञान नहीं हुआ था उन अज्ञात बातों पर प्रकाश डालने की इच्छा से उन छोटी-छोटो टेकरियों और पहाड़ियों पर मैं निरन्तर भटकता रहता था। इस भटकने से मैं कभी नहीं ऊबा। उस दिन सोंधी हुई भूमि मैं फिरते समय मुझे सब वस्तुएँ दूरबीन की उलटी बाजू से देखने के समान छोटी-छोटी दिखलाई पड़ती थी। देखने वाला भी छोटा था और टेकरियों के नीचे पदार्थ भी छोटे दिखलाई पड़ते थे। नारियल, बेर, जामुन आदि के वृक्ष, पर्वत-श्रेणी, धब-घबे, नदियाँ, नाले और उनमें मछलियाँ सब छोटी – छोटी दिखती थी। मानो आपस में ये सब छोटी अवस्था के सम्बन्ध में चढ़ा-ऊपरी कर रही हों।

मेरे पास थोड़़े पैसे और थोड़़े रुपये देकर उनका हिसाब रखने की पिताजी ने आज्ञा दी थी। उनके इस कार्य का उद्देश्य यह था कि मैं यह सीख जाऊँ कि परवाह के साथ काम किस प्रकार करना चाहिए। इसके सिवा अपनी ऊँची कीमत की घड़ियों को चाबी देने का काम भी उन्होंने मेरे सुपुर्द कर रखा था। मेरे में जवाबदारी की कल्पना उत्पन्न करने की इच्छा से उन्होंने हानि की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। हम दोनों साथ-साथ घूमने को जाते थे। उस समय रास्ते में जो भिखारी मिलता, उसे कुछ देने के लिए वे मुझे आज्ञा देते थे। वे घर आकर मुझसे हिसाब पूछते थे। मेरा बतलाया हुआ हिसाब कभी बराबर नहीं मिलता था। एक दिन मैंने खर्च का हिसाब दिया, पर खर्च की रकम घटाकर रोकड़ में जितना बचना चाहिए, उससे रोकड़ में अधिक पैसे थे। इस पर पिताजी ने कहा कि तुझे ही मेरा खजांची बनना चाहिए, क्योंकि तेरे हाथ के स्पर्श  से पैसे की बढ़ोतरी होती है।

उनकी घड़ियों में मैं इतनी जोर से चाबी लगाता था कि तुरन्त ही उन्हें धड़ीसाज के पास कलकत्ता भेजना पड़ता था।

मुझे स्मरण है कि जब मैं बड़ा हो गया, तब एक बार जमींदारी के काम की देखरेख करने के लिए मेरी नियुक्ति हुई। उस समय पिताजी की दृष्टि क्षीण हो गई थी, अत: प्रत्येक मास की दूसरी या तीसरी तारीख को मुझे जमा खर्च का आँकड़ा पिताजी को सुनाना पड़ता था। पहले तो मैं प्रत्येक खाते की जोड़ की रकम सुनाता था, फिर जिस कलम पर उन्हें शंका होती, उसकी तफ़सील पढ़ने की वे मुझे आज्ञा देते थे। उस समय मैं उन्हें वही खर्च बतलाया करता था जो उन्हें पसन्द थे। उनकी नापसंद के खर्चे टालकर मैं झट से दूसरी कलम पढ़ने लगता था, पर यह बात उनके ध्यान में आये बिना नहीं रहती थी। इस कारण प्रत्येक महीने के प्रारम्भ के दिन मुझे बड़ी चिन्ता में व्यतीत करने पड़ते थे। मैं ऊपर कह चुका हूँ कि पिताजी को छोटी से छोटी बात भी पूछने और उसे अपने ध्यान में रखने की आदत थी। फिर वह हिसाब का आँकड़ा हो, जमा खर्च की रकम हो, उत्सव की व्यवस्था हो, जायदाद बढ़ाने की बात हो या उसमें रद्दोबदल करना हो, कुछ भी हो, बिना पूछे वे नहीं मानते थे।

बोलपुर में नया बनवाया हुआ उपासना मन्दिर उन्होंने कभी नहीं देखा था, तो भी बोलपुर से आने वाले लोगों से पूछ-पूछ कर उन्होंने वहाँ का सब परिचय प्राप्त कर लिया था। उनकी स्मरण शक्ति बड़ी ही विलक्षण थी। कोई बात समझ लेने पर फिर उनकी स्मरण शक्ति से उसका निकल जाना शक्य नहीं था।

अपनी भगवद्गीता की पुस्तक से उन्होंने अपने प्रिय श्लोकों का भाषांतर करने और उनकी नक़ल करने के लिए मुझसे कहा था। घर पे मुझे कोई पूछता भी नहीं था पर प्रवास में जब ऐसे महत्व के काम मेरे सुपुर्द किए जाते थे तब मुझे वह प्रसंग अपने लिए बड़ी धन्यता का प्रतीत होता था।

इस समय मेरे पासवाली नीले रंग की बही पूरी हो गई थी और जिल्द बंधी ड़ायरी की एक प्रति मुझे प्राप्त हुई थी।

मुझे अपनी कल्पना शक्ति के आगे कवि के रूप में खड़़ा होना था। अत: बोलपुर में रहते समय जब मुझे कविता बनानी होती तो नारियल के वृक्ष के नीचे इधर-उधर हाथ-पाँव फैलाकर कविता बनाना मुझे बहुत अच्छा लगता था।

मुझे यही मालूम होता था कि इस प्रकार हाथ-पाँव तान कर व अस्त-व्यस्त रीति से पड़कर कविता करना ही कवित्व का सच्चा मार्ग है। इसी प्रकार कड़ी गर्मी में रेतीली जमीन पर पड़कर पृथ्वीराज पराभव नामक वीर रस प्रचुर कविता मैंने बनाई। उसमें वीर रस ओतप्रोत भरा था तो भी उस कविता का अन्त शोघ हो गया। अर्थात् उस डायरी ने भी अपनी बहिन उस नीली बही के मार्ग का अनुसरण किया। उसका पता भी नहीं कि वह कहाँ खो गई।

हम बोलपुर से चलकर रास्ते में साहबगंज, दिनापुर, इलाहाबाद और कानपुर में थोड़़े-थोड़े दिन ठहरते हुए अमृतसर जा पहुंचे।

रास्ते में एक घटना हुई, वह मेरे स्मृति पटल पर अभी भी मौजूद है। एक बड़े स्टेशन पर हमारी गाड़ी रुक गई। तब एक टिकिट कलेक्टर आया और उसने हमारी टिकिटें काटी। वह मेरी ओर अजीब तरह से देखने लगा। उस पर से ऐसा मालूम हुआ कि उसे कुछ सन्देह हुआ। वह चला गया और फिर अपने एक साथी के साथ आया और हमारे डिब्बे के सामने कुछ चुलबुलाहट करके वे दोनों फिर चले गये। अन्त में स्वयं स्टेशन मास्टर आया और उसने मेरा आधा टिकिट देखकर पूछा कि क्या इस बालक की अवस्था बारह वर्ष से अधिक नहीं है?

पिताजी ने कहा – नहीं।

उस समय मेरी अवस्था ग्यारह वर्ष की थी, परन्तु अवस्था की अपेक्षा मैं अधिक बड़ा दिखता था।

स्टेशन मास्टर ने कहा कि तुम्हें उसका भाड़ा पूरा देना चाहिए। पिताजी के नेत्र लाल हो गए, पर एक भी शब्द न कहकर उन्होंने अपनी पेटी में से एक नोट निकालकर स्टेशन मास्टर को दिया। उसने नोट का खुदरा मेरे पिताजी को लाकर दिया। पिताजी ने लेकर तुच्छतादर्शक मुद्रा से उसके आगे फेंक दिया। तब अपने संशय की क्षुद्रता इस प्रकार प्रकट होते देख लज्जा से स्टेशन मास्टर स्थगित हो गया।

अमृतसर का स्वर्ण मन्दिर, स्वान के समान मेरी आँखों के आगे आता है। सरोवर के मध्यभाग में विराजमान गुरु दरबार को मैं अपने पिता के साथ सुबह के वक्त कई बार गया था। वहाँ पवित्र गीतों की अखंड ध्वनि सदा होती रहती थी। कभी – कभी उपासकों के बीच में मेरे पिता भी बैठ जाते और उनके साथ-साथ स्तुति स्तोत्र पढ़ने लगते थे। एक परकीय गृहस्थ को इस प्रकार मिलते देख वहाँ वालों को आनंद होता था। शक्कर तथा मिठाई के प्रसाद का बोझ लेकर हम अपने डेरे पर लौट आते थे।

एक दिन पिताजी ने उक्त उपासना गीत गाने वालों में से एक मनुष्य को अपने स्थान पर बुलाकर उससे उन पवित्र गानों में से कुछ गाने सुने। उसे जो विदाई दी गई उससे वह खूब सन्तुष्ट हुआ होगा, इसमें  सन्देह नहीं। इसका परिणाम यह हुआ कि गवैयों ने हमारा इतना पीछा किया कि हमें अपनी रक्षा के लिए कठोर उपायों को काम में लेना पड़़ा। जब उन गवैयों को मालूम हुआ कि हमारे स्थान पर आने की सख्त मनाही है, तब वे हमें रास्ते में ही गांठने लगे। सुबह हम ज्यों ही फिरने को जाते त्यों ही हमें कंघे पर तम्बूरा लटकाये हुए लोग मिलते। उन्हें देखते ही बधिक की बन्दूक की नली देखकर जिस प्रकार शिकार की अवस्था होती है उस प्रकार की हमारी भी अवस्था होती। हम ज्यों ही तंबूरे की आवाज़ सुनते त्यों ही घबड़़ाकर भागना शुरू कर देते थे, तभी हमारी उन लोगों से रक्षा हो पाती थी।

संध्या होते ही पिताजी बगीचे की ओर के बरामदे में आ बैठते और मुझे गाने के लिए बुलाते थे। चन्द्र का उदय हो गया है, उसकी किरणें वृक्ष राजी के बीच में से बरामदे के फर्श पर पड़ रही हैं और ऐसे समय में मैं विहग राग गा रहा हूँ।

पिताजी उस समय गर्दन नीची डालकर और अपने हाथ में हाथ मिलाकर एकान्त चित्त से सुना करते थे। सायंकाल के उस दृश्य का आज भी मुझे अच्छी तरह स्मरण है।

मैं ऊपर एक जगह बता चुका हूँ कि जब मैंने एक बार भक्ति के सम्बन्ध में कविता बनाई थी और उसका वर्णन श्रीकंठ बाबू ने पिताजी से किया था, तब बड़े आनन्द से उन्होंने उनकी हँसी उड़ाई थी। आगे जाकर उसकी भरपाई किस तरह हुई, उसका मुझे अच्छी तरह स्मरण है। माघ मास में एक उत्सव के समय पढ़े जाने वाले स्तोत्रों में से बहुत-से स्तोत्र मेरे रचे हुए थे।

इस समय पिताजी चिन्मुरा में रुग्ण शय्या पर पड़़े हुए थे उन्होंने मुझे और मेरे भाई ज्योति को बुलाया। मुझे अपने बनाये हुए स्तोत्र हारमोनियम पर गाकर सुनाने की आज्ञा दी और ज्योति को हारमोनियम बजाने के लिए कहा। उनमें से कितने ही गाने मुझे दो-दो बार गाने पड़़े थे।

गायन समाप्त होने पर उन्होंने मुझसे कहा कि अपने देश के राजा को यदि अपनी भाषा का ज्ञान होता और उसके साहित्य की मधुरता वह समझता होता तो उसने अवश्य ही कवि का सम्मान किया होता। परन्तु वस्तु स्थिति इस प्रकार न होने से यह काम मुझे ही करना पड़ेगा, यह कहकर उन्होंने मेरे हाथ में एक दर्शनी हुंडी दी।

मुझे सिखाने के लिए पीटर पाले नामक पुस्तकमाला की कुछ पुस्तकें पिताजी साथ लाये थे। शुरू में ही बैंजामिन फ्रेंकलिन नामक पुस्तक उन्होंने चुनी। उन्हें यह मालूम हुआ कि इस पुस्तक से शिक्षा और मनोरंजन दोनों होंगे।

परन्तु हमारे पढ़ना शुरू करने के थोड़े ही दिनों बाद उन्हें अपनी भूल मालूम हुई। बैंजामिन फ्रेंकलिन अत्यन्त व्यवहार दक्ष मनुष्य था। उसके हिसाबी नीति तत्वों को संकुचितता से मेरे पिता को उसके प्रति घृणा हो गई थी। कुछ बातों के सम्बन्ध में उसका ऐहिक सयानापन देखकर पिताजी इतने अधीर हो जाते थे कि उसके प्रति निन्दाव्यंजक शब्द कहे सिवाय उनसे रहा नहीं जाता था।

इसके पहले व्याकरण के नियमों को कंठस्थ कर लेने के सिवाय मैं संस्कृत बिलकुल नहीं सीखा था। प्रवास के समय पिताजी ने एकदम संस्कृत वाचन पुस्तक का दूसरा भाग पढ़ाना शुरू किया और पढ़ते-पढ़ते स्वत: ही शब्दों के रूप भी बनाने के लिए उन्होंने मुझ से कहा – बंगाली भाषा का जो मुझे अधिक ज्ञान हो गया या। उससे इस समय मुझे बहुत सहायता प्राप्त हुई। पिताजी ने मुझे प्रारम्भ से संस्कृत में लिखने का प्रयत्न करने के लिए बहुत उत्तेजन दिया था। संस्कृत पुस्तकों में मिले हुए शब्द भंडार में कहीं कहीं अम् और अन् का मनमाना उपयोग करके मैंने बड़े – बड़े सामासिक पद बना डाले थे। उन्हें देवभाषा की खिचड़ी ही कहना चाहिए। परन्तु मेरी इस जल्दबाजी से, उतावलेपन से, पिताजी ने मेरा कभी उपहास नहीं किया।

इसके बाद प्रोक्टर की सुलभ ज्योतिषशास्त्र सम्बन्धी पुस्तकें हमने पढ़ी। इन पुस्तकों को पिताजी ने सरल भाषा के द्वारा मुझे समझा दिया था। फिर इन पुस्तकों का मैंने बंगाली में अनुवाद किया।

मेरे पिताजी अपने स्वत: के उपयोग के लिए जो पुस्तकें लाये थे उनमें ‘गिविन और रोम’ नामक एक दस-बारह भागों की बड़ी पुस्तक भी थी। इस पुस्तक की ओर मेरा ध्यान खिंचा करता था। यह बड़ी नीरस पुस्तक यी। मोहकता तो उसमें नाममात्र को भी न थी। मेरे मन में उस समय यह विचार उत्पन्न होता था कि मैं अभी छोटा हूँ, असमर्थ हूँ और परावलम्बी हूँ। अत: मुझे पुस्तकें बांचना भर है,  पर जिन्हें बिना अपनी तीव्र इच्छा के पुस्तके बांचने की जरूरत नहीं है, वे अवस्था-प्राप्त मनुष्य पुस्तकें बांचने का कष्ट क्यों उठाते हैं?

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