मुंशी प्रेमचंद जी का संपूर्ण जीवन परिचय

मुंशी प्रेमचंद जी का हिंदी साहित्य में अद्वितीय स्थान है। उनका नाम उन शीर्षस्थ रचनाकारों में गिना जाता है, जिन्हें हिंदी साहित्य के उत्थान हेतु हमेशा याद किया जाता रहेगा। इसीलिए साहित्य प्रेमियों के मन-मस्तिष्क में मुंशी प्रेमचंद जी के जीवन और साहित्य से सम्बन्धित बेहतर से बेहतर जानकारी प्राप्त करने के लिए उत्सुकता बनी रहती है।

इस लेख में हम मुंशी प्रेमचंद जी के जीवन के हर पहलू पर प्रकाश डालेंगे। और उनके जीवन में घटित रोचक व महत्वपूर्ण घटनाओं का भी उल्लेख करेंगे। न केवल जीवन परिचय बल्कि उनका हिंदी साहित्य व सिनेमा में योगदान, उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी उपलब्धियाँ – ये सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हैं। उनका व्यक्तिगत, पारिवारिक, आर्थिक जीवन कैसा रहा – आदि पक्षों को स्पष्ट करने के लिए यह लेख व्यापक रूप से तैयार किया गया है।

मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म और बचपन

मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म बनारस के निकट लमही गाँव के एक साधारण कायस्थ परिवार में 31 जुलाई, सन् 1880 (विक्रम सम्वत 1967) को हुआ। उनका असली नाम धनपतराय श्रीवास्तव था। उनकी माता का नाम आनंदी देवी और पिता का नाम अजायबराय था जो कि एक साधारण किसान थे और साथ ही डाकखाने में एक क्लर्क के तौर पर नौकरी करते थे। उनकी माँ अकसर बीमार रहती थी। उनकी एक बड़ी बहन भी थी। उनके दादा जी का नाम मुंशी गुरुसहाय लाल था जो कि एक पटवारी थे।

कायस्थ क्या है? संक्षिप्त विवरण

यह हिन्दुओं में एक जाति होती है। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी ने इन्हें अपनी काया की संपूर्ण अस्थियों के अंश से बनाया। इसीलिए काया+अस्थि = कायस्थ। भारतीय वर्ण व्यवस्था के अनुसार ये ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों वर्णों को धारण कर सकते है। प्राचीन भारत में कायस्थ अक्सर प्रशासनिक कार्य या प्रशासन से सम्बंधित लेखा – जोखा का काम करते थे। वर्तमान में मुख्य रूप से कायस्थ हैं – श्रीवास्तव, सक्सेना, निगम, माथुर, भटनागर, कुलश्रेष्ठ, बोस, दत्त, चक्रवर्ती, ठाकरे, आडवाणी, गुप्त, मुंशी, दत्त, देशमुख, नायडू, राव, रेड्डी, मेहता आदि।

मुंशी प्रेमचंद जी के घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इसलिए बचपन अत्यंत संकटों में बीता। कहा जाता है कि उनका बचपन इतनी अधिक घोर गरीबी में बीता कि घर में खाने के लिए पर्याप्त भोजन और पहनने के लिए पूरे कपड़े भी नहीं होते थे।

उनकी माता जी कैथी भाषा में कविताएँ लिखती थी। इसका प्रभाव मुंशी प्रेमचंद पर पड़ा। घर के संस्कारों ने उन्हें अध्ययन और लेखन हेतु प्रेरित किया। दुर्भाग्य से माता बचपन में ही चल बसी।

जब मुंशी प्रेमचंद (धनपतराय) केवल आठ वर्ष के थे, उनकी माता का निधन हो गया। आर्थिक तंगी तो थी ही, एक यह और मुसीबत उन पर आ पड़ी। कुछ दिनों बाद उनके पिता जी ने दूसरी शादी भी की। विमाता का व्यवहार इनके प्रति अच्छा नहीं था।

मुंशी प्रेमचंद जी की शिक्षा

मुंशी प्रेमचंद ने 5 वर्ष की आयु में ही पढ़ना प्रारम्भ कर दिया था। वे पढ़ने के लिए नंगे पाँव 5 – 6 मील दूर एक गाँव में जाते थे। शुरू में उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फारसी पढ़ी। कुछ बड़़े होने पर स्कूल की पढ़ाई की ओर रात में ट्यूशन पढ़ाते और अपना गुजारा करते थे। वे गणित में बहुत कमजोर थे। जैसे-तैसे एंट्रेंस की परीक्षा उत्तीर्ण की और अठारह रुपये मासिक वेतन पर एक छोटे-से स्कूल में अध्यापक बन गये। उस समय एफ० ए० की परीक्षा में गणित अनिवार्य विषय था, इसलिए कई वर्षों तक उसे पास ही नहीं कर सके। बाद में गणित विषय के हटने पर एफ० ए० पास किया और बी० ए० भी उत्तीर्ण कर ली। इसके बाद प्रयास करके वे शिक्षा विभाग में सब डिप्टी इन्सपेक्टर नियुक्त हो गये। वहाँ उन्होंने लम्बे समय तक काम किया।

स्कूल के दिनों में मुंशी प्रेमचंद जी को वकील बनने की चाहत थी। लेकिन वे गरीबी के कारण वकालत की पढ़ाई न कर सके।

मुंशी प्रेमचंद जी का पहला विवाह

परम्परा के अनुसार मात्र 15 वर्ष की उम्र में ही मुंशी प्रेमचंद जी की शादी हो गयी। शादी उनके सौतेले नाना ने तय की। मुंशी प्रेमचंद की पत्नी उम्र में उनसे बड़ी थी और साथ ही बदसूरत भी। इतना तो था ही, उनकी भाषा में बिलकुल भी मिठास नहीं थी। इस कारण वे जी उनसे भी दुखी रहते थे।

अब तक उन्होंने अपने जीवन में सिर्फ दुख ही दुख देखा था। घर में गरीबी, माता की मृत्यु, पिता की दूसरी शादी, विमाता का दुर्व्यवहार, स्वयं की कम उम्र में शादी, बड़ी और बदसूरत पत्नी, उसका भी व्यवहार ठीक नहीं।

पहली पत्नी के बारे में मुंशी प्रेमचंद जी ने लिखा है, “उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।…….” पत्नी के स्वभाव से दुखी होकर उन्होंने अपने पिता जी के निर्णय के बारे में भी लिखा, “पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया। मेरी शादी बिना सोचे समझे कर डाली।”

जब उनके पिता जी ने पुत्रवधू का मुंशी प्रेमचंद के प्रति व्यवहार देखा तो उन्हें भी बहुत दुख हुआ और अपनी गलती पर अफसोस हुआ। शादी के लगभग एक साल बाद ही पिता की मृत्यु हो गयी। उस समय मुंशी प्रेमचंद जी नौवीं कक्षा में पढ़ते थे।

सन 1905 में पत्नी पारिवारिक तनाव के कारण घर छोड़कर मायके चली गयी। और फिर वह कभी वापिस नहीं आयी। मुंशी प्रेमचंद जी ने कुछ समय तक अपनी पत्नी को मायके में ही खर्चा भी दिया।

मुंशी प्रेमचंद जी का दूसरा विवाह और पारिवारिक जीवन

मुंशी प्रेमचंद जी आर्य समाज के सम्पर्क में आए। वे विधवा विवाह का समर्थन करते थे। और अपना दूसरा विवाह एक विधवा के साथ ही किया। 1905 के अंतिम दिनों में उन्होंने शिवरानी देवी के साथ दूसरी शादी कर ली। और वे बड़े प्रेम से रहने लगे। शिवरानी देवी ने तीन संतानों को जन्म दिया – श्रीपतराय, अमृतराय और कमला देवी श्रीवास्तव।

शिवरानी देवी का संक्षिप्त परिचय

शिवरानी देवी के पिताजी का नाम मुंशी देवीप्रसाद था। शिवरानी बाल-विधवा थीं और सन 1905 में उनकी दूसरी शादी मुंशी प्रेमचंद जी से हुई। शिवरानी जी ने स्वाधीनता आन्दोलन में भी भाग लिया। इसीलिए उन्हें 1930 में 2 महीने की जेल भी हुई।

शिवरानी देवी पढ़ी लिखी भी थी। शिवरानी देवी ने मुंशी प्रेमचंद जी की मृत्यु के बाद उनकी जीवनी भी लिखी और उनके बारे में उन जानकारियों से पाठकों को अवगत कराया, जिनके बारे में सभी लोग अनजान थे। जीवनी का शीर्षक है – प्रेमचंद घर में। उन्होंने हंस पत्रिका का संपादन भी किया।

शिवरानी देवी ने मुंशी प्रेमचंद जी का हर परिस्थिति में साथ दिया। वे सच्चे अर्थों में उनकी जीवन संगिनी (साथी) थी।

अमृतराय का संक्षिप्त परिचय

अमृतराय ने मुंशी प्रेमचंद जी के पत्र, साहित्य आदि को संग्रहीत रखा ताकि पाठक इस महान विभूति के बारे में बेहतर तरीके से जान पाएँ। अमृतराय भी साहित्यकार हैं और प्रगतिशील लेखकों में उनका महत्वपूर्ण नाम है। कलम का सिपाही नामक पुस्तक पर उन्हें साहित्य अकादमी की और से सम्मानित किया गया। उपन्यास ‘बीज’ और ‘तिरंगा कफ़न’ नामक कहानी संग्रह भी चर्चित हुए।

घर के खर्चे लगातार बढ़ रहे थे। परिवार के पालन-पोषण का भार मुंशी प्रेमचंद जी के कन्धों पर था। उनके परिवार में छह सदस्य थे – विमाता, पत्नी, तीन बच्चे और स्वयं। छोटी-सी आमदनी में छः लोगों का खर्चा बड़ी मुश्किल से चल पाता था। अतः मुंशी प्रेमचन्द जी अभी भी आर्थिक तंगी में ही जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनकी नाजुक आर्थिक स्थिति का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि एक बार घर खर्च के लिए उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा।

एक बार वे अपनी पुस्तकें बेचने के लिए एक पुस्तक विक्रेता (बुकसेलर) के पास भी गए। सौभाग्य से उन्हें वहाँ एक प्रधानाध्यापक मिल गए। प्रधानाध्यापक को मुंशी प्रेमचंद जी की इस दशा पर दया आ गयी। उन्होंने मुंशी प्रेमचंद जी को अपने स्कूल में अध्यापक पद पर रख लिया। संभवतः यह उनके जीवन में सौभाग्य और शुभ या अच्छे संयोग का पहला मौका था।

मुंशी प्रेमचंद जी का व्यक्तित्व और स्वभाव

मुंशी प्रेमचंद जी सादा जीवन जीते थे। वे दिखावा और आडम्बरों से हमेशा दूरी बनाए रखते थे। वे अपना काम खुद करते थे। वे संवेदनशील लेखक, अच्छे वक्ता और मंजे हुए संपादक थे। उनको ग्रामीण जीवन बहुत पसंद था। उनका पहनावा भी ठेठ देहाती होता था। उनका स्वभाव सरल, उदार और हँसमुख था।

गरीबी के बावजूद भी वे मस्त रहते थे। वे जीवन को एक खेल मानते थे और जीवन की बाजी को जीतने के लिए हरसम्भव प्रयास भी करते थे। अपनी इसी विचारधारा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने मुंंशी दयानारायण निगम को एक पत्र में लिखा था, “हमारा काम तो केवल खेलना है। खूब दिल लगाकर खेलना, खूब जी तोड़ खेलना। अपने को हार से इस तरह बचाना मानों हम दोनों लोकों की संपत्ति खो बैठेंगे। किन्तु हारने के पश्चात्, पटखनी खाने के बाद धूल झाड़कर खड़े हो जाना चाहिए और फिर ताल ठोंक कर विरोधी से कहना चाहिए कि एक बार फिर। जैसा कि सूरदास कह गए हैं – तुम जीते हम हारे। पर फिर लड़ेंगे।”

दयानारायण निगम कौन थे?

दयानारायण निगम मुंशी प्रेमचंद जी के करीबी मित्र थे। वे कानपुर से प्रकाशित होने वाली ‘जमाना’ पत्रिका का संपादन करते थे। मुंशी प्रेमचंद जी की पहली कहानी ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ जमाना पत्रिका में उन्होंने ही प्रकाशित की थी। धनपतराय को प्रेमचंद नाम उन्होंने ही दिया जिसका विवरण हम इसी लेख में आगे करेंगे। विधवा देवरानी से विवाह करने की सलाह भी मुंशी प्रेमचंद जी को उन्होंने ही दी।

मुंशी प्रेमचंद जी मस्त तो रहते ही थे लेकिन उनके मन-मस्तिष्क में पीड़ितों और गरीबों के लिए विशेष सहानुभूति भी थी। उनकी सहानुभूति का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता कि जब उन्होंने प्रेस के मजदूरों को कुछ रूपये दे दिए। इसी सम्बन्ध में उनकी पत्नी कहती हैं कि “उन्हें सर्दियों के दिनों में दो बार चालीस – चालीस रूपये मिले। दोनों बार ही उन्होंने वे रूपये प्रेस में मजदूरों को बाँट दिए। जब मैं इस बात पर उनसे नाराज हुई तो उन्होंने कहा कि यह कहाँ का न्याय है। हम तो पहनें गर्म शूट और मजदूरों को खाने के लिए भोजन तक भी नहीं! वे भूखे सोएँ?”

एकदम साधारण दिखने वाले मुंशी प्रेमचंद जी असाधारण प्रतिभा के धनी थे। ऐसे लाखों लोग थे जो उनके संपर्क में आकर उनसे प्रभावित हुए। और प्रभावित होने वाले लोगों की तो आज भी कमी नहीं है, जबकि वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनके व्यक्तित्व, स्वभाव और व्यवहार के अनछुए पहलुओं को मुंशी प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने ‘प्रेमचंद घर में’ जीवनी उजागर किया है।

मुंशी प्रेमचंद जी पूर्णतः आशावादी थे। आजीवन गरीबी और कष्टों के बावजूद भी उन्होंने हरसंभव प्रयास किए और कभी निराश नहीं हुए। इस विषय पर उन्होंने समाज को ऊर्जावान और सकारात्मक सन्देश दिया, “ए लोगो, जब तुम्हें संसार में रहना ही है तो जिन्दों की तरह रहो, मुर्दों की तरह ज़िन्दा रहने से क्या फ़ायदा।”

मुंशी प्रेमचंद जी की लेखन कला

मुंशी प्रेमचंद जी से पहले हिंदी में पौराणिक, धार्मिक और राजा-रानियों की कहानियाँ ही लिखी जाती थी। उन्होंने इससे हटकर सामान्य जन-जीवन पर कहानियाँ लिखी। उन्होंने हिन्दी उपन्यास को तिलस्मी, जासूसी, धर्म, प्रेम तथा उपदेश के क्षेत्रों से बाहर निकाल कर सबसे पहले उसे जन-जीवन से जोड़ा। उन्होंने गरीबी, उपनिवेशवाद, सांप्रदायिकता, जमींदारी, भ्रष्टाचार, कर्जखोरी जैसे विषयों पर खुलकर कलम चलाई। उनकी अधिकतम रचनाओं में गरीबी और दैन्यता को लक्षित किया गया है।

वे पहले उर्दू में लिखते थे, फिर हिंदी में लिखना प्रारम्भ किया। इसलिए उनके साहित्य में दोनों भाषाओं का अद्भुत मिश्रण मिलता है। उन्होंने सरल व आम बोल-चाल की भाषा का प्रयोग करके अपने विचारों को दृढ़तापूर्वक तर्कों के साथ प्रस्तुत किया। इस प्रकार भाषा प्रयोग और रचना-विषय, दोनों दृष्टिकोणों से वे आम भारतीय के साहित्यकार थे।

मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों में समाज का यथार्थ चित्रण मिलता है। उन्होंने अपने उपन्यासों द्वारा न केवल जन-जागृति उत्पन्न करने का प्रयास किया, बल्कि उसे एक शक्तिशाली हथियार भी बनाया। उनकी प्रेरणा से समकालीन उपन्यासकारों को आदर्श और कल्पना के घेरे से निकालकर यथार्थ के धरातल पर आए। और वे नये युग की नई क्रान्तिकारी भावनाओं को अभिव्यक्ति देने की ओर उत्सुक हुए। इस तरह मुंशी प्रेमचंद नवीन क्रान्तिकारी चेतना के अग्रदूत बने। उन्होंने उपन्यासों को संस्कृत, अरबी फारसी शब्दों के प्रभाव से मुक्त किया। वे जनभाषा के समर्थक थे, जिसे जनता भली – भाँति पढ़ सके और समझ सके। उन्होंने हिन्दी-उर्दू का मिश्रण करके हिंदुस्तानी भाषा को जन्म दिया।

उनके उपन्यासों व कहानियों का मूल उद्देश्य जनता की भावनाओं और समस्याओं का चित्रण करना था। उनका मत था कि साहित्यकारों को जनता की बात जनता की भाषा में करनी चाहिए। साथ ही उन्होंने साहित्यकारों में निर्भीक भाव से अन्याय का विरोध करने की भावना उत्पन कर राष्ट्रीय चेतना को आगे बढ़ाया। मुंशी प्रेमचंद जी के साहित्य में उनका युग प्रतिबिम्बित होता है। वे निडर और प्रतिभासम्पन्न कलाकार थे।

उन्होंने हिन्दी साहित्य में वास्तविक तौर पर युगान्तकारी परिवर्तन किए इसीलिए वो हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक हैं। इसी सम्बन्ध में उन्होंने 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए कहा कि लेखक स्वभाव से प्रगतिशील होता है और जो ऐसा नहीं है वह लेखक नहीं है।

उन्होंने अपने इन शब्दों के माध्यम से उपन्यास लिखने की अपनी शैली के बारे में बताया और अन्य रचनाकारों को भी प्रेरणा दी – उपन्यास में आपकी कलम में जितनी शक्ति हो अपना जोर दिखाइए, राजनीति पर तर्क कीजिए, किसी महफिल के वर्णन में 10-20 पृष्ठ लिख डालिए (भाषा सरस होनी चाहिए), कोई दूषण नहीं।

वे किसी घटना मात्र को कहानी नहीं मानते थे। उन्होंने इस सम्बन्ध में अपने लेख ‘मैं कहानी कैसे लिखता हूँ’ में लिखा है, “कोई घटना कहानी नहीं होती, जब तक कि वह किसी मनोवैज्ञानिक सत्य को व्यक्त न करे।”

मुंशी प्रेमचंद जी अंग्रेजी के भी अच्छे जानकर थे। बताया जाता है कि अपनी अधिकतम रचनाओं की रूपरेखा पहले अंग्रेजी में तैयार करते थे, फिर हिंदी या उर्दू में विस्तार से लिखते थे।

मुंशी प्रेमचंद जी की साहित्य यात्रा, रचनाएँ और उनका प्रकाशन

मुंशी प्रेमचंद जी प्रारम्भ में उर्दू में लेखन करते थे। उन्होंने मात्र 13 वर्ष की उम्र में ही लेखन कार्य शुरू कर दिया था। उन्होंने नाते के मामू के प्रसंग पर पहली रचना (व्यंग्य) लिखी। इस रचना को लिखते ही उनकी गिनती साहित्यकारों में होने लगी। सन 1915 में सरस्वती पत्रिका के दिसम्बर अंक में उनकी पहली हिंदी कहानी ‘सौत’ प्रकाशित हुई।

सन 1894 में एक नाटक लिखा जिसका शीर्षक था – होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात। सन 1896 में ऐतिहासिक उपन्यास ‘रूठी रानी’ की रचना की। सन 1902 में प्रेमा, 1904-05 में ‘हम खुर्मा व हम सवाब’ उपन्यास लिखा। सन 1907 में उर्दू में पाँच कहानियों का संग्रह ‘सोजे वतन’ लिखा। ये कहानियाँ देश-प्रेम और देश की जनता की पीड़ा को लेकर लिखी गयी। इसलिए यह कहानी संग्रह विशेष प्रसिद्ध और चर्चित रहा।

ध्यान देने योग्य है कि उनकी पहली कहानी ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ इसी संग्रह में संकलित थी। मुंशी प्रेमचंद जी की उत्कृष्ट लेखन कला और प्रतिभा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी पहली कहानी ही विशेष चर्चित और लोकप्रिय रही।

सन 1935 में ‘सेवा सदन’ व ‘मिल मजदूर’ की रचना की। उन्होंने लगभग 300 कहानियाँ लिखी। जीवन के अंतिम दिनों में ‘मंगलसूत्र’ नामक उपन्यास लिख रहे थे। जो कि दुर्भाग्यवश पूरा न कर सके और उसे अधूरा छोड़कर ही चल बसे।

उनके साहित्य लेखन की शुरूआत और प्रकाशन के विषय पर वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं – उपन्यास तो मैंने 1901 ही से लिखना शुरू किया। मेरा एक उपन्यास 1902 में निकला और दूसरा 1904 में; लेकिन गल्प 1907 से पहिले मैंने एक भी न लिखी। मेरी पहली कहानी का नाम था, ‘संसार का सबसे अनमोल रत्न’। वह 1907 में, ‘जमाना’ में छपी।

इन्होंने लगभग 300 कहानियाँ लिखी। उनके जीवन काल में कुल नौ कहानी संग्रह प्रकाशित हुए- ‘सप्‍त सरोज’, ‘नवनिधि’, ‘प्रेमपूर्णिमा’, ‘प्रेम-पचीसी’, ‘प्रेम-प्रतिमा’, ‘प्रेम-द्वादशी’, ‘समरयात्रा’, ‘मानसरोवर’ : भाग एक व दो और ‘कफन’। मृत्यु के बाद उनकी सभी उपलब्ध कहानियों को मानसरोवर नाम से 8 भागों में संग्रहीत किया गया।

वैसे तो मुंशी प्रेमचंद जी के संपूर्ण साहित्य को खूब प्रसिद्धि मिली, फिर भी कुछ चुनिन्दा कहानियों को शीर्ष स्थान प्राप्त है – सुजान भगत, ईदगाह, कजाकी, कफ़न, गुल्ली डण्डा, शतरंज के खिलाड़ी, दुनिया का सबसे अनमोल रतन, दो बैलो की कथा, पंच परमेश्‍वर, पूस की रात, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, सद्गति।

कफन उनकी अंतिम कहानी मानी जाती है। उनकी रचनाएँ भारत की तरह विदेशों में भी खूब लोकप्रिय और प्रसिद्ध हैं। और लगभग सम्पूर्ण साहित्य का विभिन्न विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

गोदान उनकी सर्वप्रसिद्ध रचना है। जिसका दुनिया की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद हुआ। यह उपन्यास ग्रामीण जीवन और कृषि संस्कृति पर आधारित है। इसमें प्रगतिवाद, गांधीवाद और मार्क्सवाद (साम्यवाद) का बड़े ही अच्छे ढंग से चित्रण किया गया है। कुछ आलोचकों ने इस महान उपन्यास को महाकाव्यात्मक उपन्यास का दर्जा भी दिया है।

मुंशी प्रेमचंद एक सफल उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार और सम्पादक थे। उन्होंने अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ ग्रंथों का अनुवाद भी किया। उनकी सभी रचनाओं की सूची इसी लेख में नीचे दी गयी है।

मुंशी प्रेमचंद जी का नाम परिवर्तन

देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत कहानी संग्रह ‘सोजे वतन (राष्ट्र का विलाप या देश का दर्द)’ से अंग्रेजों को ईर्ष्या हुई। अंग्रेजों ने मुंशी प्रेमचंद जी पर रोक लगाने की योजना बनाई। हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया। जिलाधीश ने उन्हें पत्र भेजकर अपने दफ्तर बुलवाया और उनके इस कहानी संग्रह (सोजे वतन) की बची हुई 700 प्रतियाँ जब्त कर ली। साथ ही उन पर बंधन लगा दिया कि वे भविष्य में कभी उनकी आज्ञा के बिना न लिखेंगे। इस दौरान प्रेमचंद जी का साहित्यिक नाम था – नवाबराय

इस बंधन से बचने के लिए उन्होंने अपना नाम बदलने का निश्चय किया। इस बंधन के विषय में उन्होंने अपने प्रिय मित्र दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उन्होंने यह बताया कि अब वे नवाबराय या धनपतराय के नाम से नहीं लिख पाएंगे। तो दयानारायण ने उनको अपना नाम ‘प्रेमचन्द’ रख लेने की सलाह दी। यहीं से अब वे हमेशा के लिए प्रेमचन्द हो गए।

उन्होंने साहित्य सेवा के लिए अपना नाम तो बदल लिया लेकिन इसके बावजूद भी उनके अधिकांश मित्र और परिचितों ने उन्हें जीवन-पर्यन्त ‘नवाब’ ही कहा।

प्रेमचंद नाम से प्रकाशित होने वाली उनकी पहली कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ थी, जो कि जमाना पत्रिका के दिसम्बर, 1910 के अंक में प्रकाशित हुई।

प्रेमचंद से उनका नाम मुंशी प्रेमचंद कैसे हुआ? इस प्रश्न को हम इसी लेख में आगे स्पष्ट करेंगे।

मुंशी प्रेमचंद जी का कार्यक्षेत्र

मुंशी प्रेमचंद जी ने अपनी पहली नौकरी एक छोटे से स्कूल में शिक्षक के तौर पर की। लेखन में हस्तसिद्ध होने के कारण उनकी पदोन्नति हुई। वे स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर बना दिए गए।

मुंशी प्रेमचंद जी महात्मा गाँधी से अत्यन्त प्रभावित थे। जब सत्याग्रह आन्दोलन की शुरुआत हुई तो गाँधी जी के आह्वान पर 20 वर्ष पुरानी नौकरी छोड़कर आन्दोलन में कूद पड़़े। इसके बाद कई विद्यालयों में नौकरी की, किंन्तु अपने स्वतन्त्र स्वभाव के कारण सब जगह से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद उन्होंने मर्यादा एवं माधुरी आदि पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया।

मर्यादा पत्रिका के बारे में संक्षिप्त जानकारी

मर्यादा पत्रिका अपने समय की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका थी। इसका पहला अंक कृष्णकांत मालवीय ने 1910 में प्रकाशित किया। इस प्रसिद्ध पत्रिका के संपादक के तौर पर मुंशी प्रेमचंद जी को चुना गया जो कि एक गौरव की बात थी। यह पत्रिका कुछ विशेष कारणों से 1923 में बंद हो गयी।

माधुरी पत्रिका के बारे में संक्षिप्त जानकारी

इस पत्रिका का श्रीगणेश अगस्त 1921 में लखनऊ से हुआ। इसकी गिनती हिंदी की प्रारंभिक पत्रिकाओं में होती है। इस पत्रिका का संपादन समय-समय पर इन साहित्यकारों ने किया – विष्णुनारायण भार्गव और रूपनारायण पाण्डेय, मुंशी प्रेमचंद और कृष्णबिहारी मिश्र, जगन्नाथदास रत्नाकर और ब्रजरत्नदास, आचार्य शिवपूजन सहाय, अमृतलाल नागर।

मुंशी प्रेमचंद जी कुछ समय तक एक फिल्म कम्पनी में लेखन कार्य करने हेतु बम्बई भी गये, किन्तु वहाँ के वातावरण से ऊबकर वापिस चले आये। सिनेमा जगत और साहित्य जगत के बारे में उन्होंने जो तुलनात्मक बात कही वह साफ दर्शाती है कि उन्हें सिनेमा की तुलना में साहित्य के प्रति ज्यादा रुचि, प्रेम और लगाव था। उन्होंने कहा, “साहित्य के भावों की जो उच्चता, भाषा की प्रौढ़ता और स्पष्टता, सुन्दरता की जो साधना होती है, वह हमें सिनेमा में नहीं मिलती।”

इसके बाद हंस और जागरण नामक साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया, जो प्रतिमाह छपती थी। ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना में सहयोग किया और 1936 में उन्होंने इसकी अध्यक्षता भी की । इस बीच निरन्तर कहानियाँ, उपन्यास लिखते हुए अनवरत साहित्य सेवा मे जुटे रहे।

हंस पत्रिका के बारे में संक्षिप्त जानकारी

हंस पत्रिका की शुरूआत 1930 में बनारस से हुई। इसका सम्पादन मुंशी प्रेमचंद जी स्वयं करते थे। 1936 तक संपादन इसका संपादन करने के बाद और संपादन की जिम्मेदारी जैनेन्द्र कुमार और अपनी पत्नी शिवरानी देवी को सौंप दी।

जागरण पत्रिका के बारे में संक्षिप्त जानकारी

मुंशी प्रेमचंद जी की अभिलाषा थी कि वे एक साहित्यिक पत्र और निकालें। 22 अगस्त, 1932 को इसका उन्होंने जागरण का पहला अंक निकला। आर्थिक हानि होने के कारण 21 मई, 1934 को इसका आख़िरी अंक निकालकर बंद कर दिया।

मुंशी प्रेमचंद जी की धर्म और ईश्वर के प्रति आस्था

मुंशी प्रेमचंद जी की ईश्वर के प्रति आस्था लगातार कम होती चली गयी। उन्होंने अपनी जीवन में बहुत दुख सहे, शायद इसीलिये वे धीरे-धीरे नास्तिक-से हो गए थे। लेकिन वे पूर्णतः नास्तिक न थे। और न ही उनका आस्तिकों से कोई विशेष मतभेद था। धर्म और ईश्वरवाद का उन्होंने न कभी विरोध किया और न ही प्रचार। वे सामान्य जन-जीवन की पीड़ाओं को साहित्य में उतारने वाले महान कलाकार थे।

इस सम्बन्ध में उन्होंने एक बार जैनेन्द्र कुमार जी को एक पत्र में लिखा, “तुम आस्तिकता की ओर बढ़ते जा रहे हो या कहीं पक्के भक्त बनते जा रहे हो। मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।”

वैसे मुंशी प्रेमचंद जी ने अपनी आत्मकथा के एक प्रसंग में यह भी लिखा है, “इस अनुभव ने मुझे कट्टर भाग्यवादी बना दिया है। अब मेरा दृढ़ विश्वास है कि भगवान् की जो इच्छा होती है वही होता है, और मनुष्य का उद्योग भी इच्छा के बिना सफल नहीं होता।”

इसका इसका सीधा-सा मतलब है कि वे ईश्वर और भाग्य के अस्तित्व को स्वीकारते थे। यहाँ पर वे अपने आप को भाग्यवादी तो बता रहे हैं लेकिन वे कभी भाग्य के भरोसे नहीं रहे। उन्होंने जीवन पर्यन्त कड़ी मेहनत, संघर्ष, और मुसीबतों का डटकर सामना किया।

जैनेन्द्र कुमार का संक्षिप्त परिचय

जैनेन्द्र कुमार मुंशी प्रेमचंद जी के समकालीन साहित्यकार थे। वे भी कहानी और उपन्यास लेखन के लिए खूब प्रसिद्ध थे। उनका जन्म 2 जनवरी, 1905 को अलीगढ़ के कौड़ियागंज गांव में हुआ। उनका बचपन का नाम आनंदीलाल था। उन्हें 1971 में पद्म भूषण और 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 24 दिसम्बर1988 वे स्वर्ग सिधार गए।

मुंशी प्रेमचंद जी की मृत्यु

मुंशी प्रेमचंद जी जीवन के अंतिम दिनों में बीमार रहने लगे। अत्यधिक श्रम और बीमारी के कारण 8 अक्टूबर, 1936 में उनका स्वर्गवास हो गया।

अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले भी उन्होंने जैनेन्द्र जी से कहा था, “जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय में ईश्वर को याद करते हैं, मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।”

वो ऐसा शायद इसलिए कह रहे थे क्योंकि उन्होंने जीवन-पर्यन्त दुख ही दुख सहे और उन्हें ईश्वर की सहानुभूति पर विश्वास भी नहीं था। और जब आजीवन कष्ट ही सहा तो अब अंत समय में ईश्वर को याद करने की जरूरत ही क्या थी।

मुंशी प्रेमचंद जी का नामकरण

उनका वास्तविक और बचपन का नाम धनपतराय श्रीवास्तव था। फिर उन्होंने नवाबराय के नाम से साहित्य लेखन किया। उसके बाद मित्र दयानारायण निगम के सुझाव पर प्रेमचंद नाम से लिखना शुरू किया। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि उनके नाम के साथ मुंशी शब्द कैसे जुड़ गया। इस सम्बन्ध में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं।

अधिकांश विद्वानों का मानना है कि प्रेमचंद जी अपने कैरियर के शुरुआती दौर में शिक्षक रहे थे। उस ज़माने में शिक्षकों को मुंशी कहा जाता था। इसलिए उनके नाम के साथ मुंशी शब्द जुड़ गया होगा।

दूसरा मत है कि कुछ कायस्थों के नाम से पहले सम्मान स्वरुप मुंशी शब्द लगाया जाता था। प्रेमचंद जी एक कायस्थ परिवार से थे। संभवतः इसीलिए उनके नाम के साथ मुंशी शब्द जुड़ गया होगा।

इनके अलावा तीसरा मत यह है कि हंस नामक पत्र प्रेमचंद और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के सह-सम्पादन में निकलता था। दोनों के नाम उस पत्रिका पर इस प्रकार छपते थे –

संपादक
मुंशी, प्रेमचंद

कालान्तर में प्रेमचंद जी ज्यादा प्रसिद्ध हो गए और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी विशेष प्रभावित साहित्यकार नहीं थे, उनका रुझान राजनीति की तरफ बढ़ गया। इसलिए पाठकों ने भ्रमवश इस नाम को एक ही समझ लिया और प्रेमचंद जी को लोग मुंशी प्रेमचंद के नाम से जानने लगे।

एक बात और, प्रथम दो मत मात्र कल्पना और अनुमान पर आधारित हैं, जबकि तीसरा मत प्रमाणित है।

इस विषय पर प्रोफेसर शुकदेव सिंह कहते हैं कि प्रेमचंद जी ने अपने नाम के आगे ‘मुंशी’ शब्द का प्रयोग स्वयं कभी नहीं किया। साथ ही वे मानते हैं कि मुंशी एक सम्मान सूचक शब्द है जिसे प्रेमचंद के प्रशंसकों ने उनके नाम के साथ कभी भी लगा दिया होगा।

उपर्युक्त तीनों मतों को मनोविज्ञान के अनुसार परखें तो तीसरा मत ही कसौटी पर खरा उतरता है। उनकी पत्नी शिवरानी देवी द्वारा लिखी गयी जीवनी ‘प्रेमचंद घर में’ में कहीं भी उनके नाम के साथ मुंशी शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। जबकि अन्य कई लोगों के नाम के साथ शिवरानी जी ने मुंशी शब्द का प्रयोग किया है।

दूसरा तर्क यह है कि उनके नाम के साथ मुंशी शब्द यदि शिक्षक होने के नाते या कायस्थ होने के नाते जुड़ता तो वे स्वयं भी कभी-न-कभी अपने नाम के साथ मुंशी शब्द का प्रयोग करते। और यदि वे स्वयं ऐसा नहीं करते तो उनके समकालीन रचनाकार, मित्रों आदि में से कोई-न-कोई अवश्य करता।

अतः उनके परिवेश, साहित्य, जीवनी, संपादन, पत्र, समकालीन रचनाकारों आदि को प्रमाण के तौर पर रखते हुए कहा जा सकता है कि उनका ‘मुंशी प्रेमचंद’ नाम उनकी मृत्यु के बाद पड़ा।

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का संक्षिप्त परिचय

कन्हैयालाल जी ने गांधी जी के साथ 1915 में यंग इंडिया के सह-संपादक के तौर पर काम किया। प्रेमचंद जी के साथ हंस का संपादन किया। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, इतिहास, ललित कलाएँ आदि की 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं। वे 1952 से 1957 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी रहे।

मुंशी प्रेमचंद जी के साहित्य का सिनेमा में उपयोग

हालांकि मुंशी प्रेमचंद जी को सिनेमा जगत से विशेष लगाव न था, वे साहित्य को सिनेमा से बेहतर मानते थे। फिर भी सिनेमा जगत में उनके साहित्य का अति महत्त्वपूर्ण स्थान है। क्योंकि उनके साहित्य पर आधारित बहुत सारी फ़िल्में बनी हैं। जिनका विवरण इस प्रकार है –

  • सन 1938 में सुब्रमण्यम ने ‘सेवा सदन’ उपन्यास पर आधारित फिल्म बनाई। जिसमें सुब्बालक्ष्मी में मुख्या भूमिका निभाई।
  • 1960 में बना लोकप्रिय टी० वी० धारावाहिक निर्मला भी उन्हीं के उपन्यास पर आधारित है।
  • सन 1963 में गोदान पर और 1966 में गबन नामक उपन्यास पर भी लोकप्रिय फ़िल्में बनी।
  • मृणाल सेन ने ‘कफ़न’ कहानी के आधार पर सन 1977 में एक तेलगु फिल्म बनाई। जिसका नाम था – ओका ऊरी कथा। इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ तेलगु फिल्म के सम्मान से सम्मानित किया गया।
  • सत्यजीत राय ने उनकी दो कहानियों (शतरंज के खिलाड़ी, सद्गति) पर आधारित क्रमशः 1977 और 1981 में फ़िल्में बनाई।

शतरंज के खिलाड़ी’ फिल्म 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से पहले की कहानी कहती है। भारत के गुलाम बनने के कारणों को दर्शाया गया है। उस समय के लोकप्रिय बॉलीवुड सितारों ने इस फिल्म में भूमिका निभाई। कुछ मुख्य सितारे हैं – संजीव कुमार, शबाना आज़मी, फरीदा जलाल, विक्टर बैनर्जी, अमजद ख़ान, सईद जाफ़री, रिचर्ड एटनबरो और फ़ारुख़ शेख़। इस फ़िल्म को तीन फिल्मपेयर अवार्ड मिले।

1981 में रिलीज होने वाली फिल्म सद्गति में दिखाया गया है कि एक गुलाम मानसिकता वाला व्यक्ति किस प्रकार ब्राह्मणवाद की आड़ में अपना शोषण होने देता है। वह उसके खिलाफ कोई कदम नहीं उठता और गुलामी सहते-सहते ही मर जाता है। और बताया गया है कि मानसिक गुलामी दुनिया की सबसे खतरनाक गुलामी है, यहाँ तक तक कि मौत से भी ज्यादा खतरनाक और दर्दनाक। इस फ़िल्म में इन मशहूर बॉलीवुड सितारों ने काम किया – मोहन अगासे, ओम पुरी, स्मिता पाटिल, गीता सिद्धार्थ और ऋचा मिश्रा।

इनके आलावा बहुत सारी फ़िल्में और प्रचुर मात्रा में साहित्य उन्हीं की विचारधाराओं के आधार पर लिखा गया है। मुंशी प्रेमचंद जी के जीवन और उनके साहित्य आदि के बारे में अनेक लेख, पुस्तकें लिखी गयी हैं।

मुंशी प्रेमचंद जी पर आरोप

इतना महान व्यक्तित्व होने के उपरांत भी उन पर कई आरोप लगे हैं। कमलकिशोर गोयनका ने मुंशी प्रेमचंद जी पर एक पुस्तक लिखी, जिसका नाम है – प्रेमचंद : अध्ययन की नई दिशाएँ। इस पुस्तक में कमलकिशोर गोयनका ने लिखा है कि प्रेमचंद जी ने अपनी पहली पत्नी को अकारण छोड़ा। और दूसरी शादी के बाद भी प्रेमचंद जी के किसी अन्य महिला भी के साथ सम्बन्ध थे, इसे शिवरानी देवी ने उनकी जीवनी में भी लिखा है।

प्रेमचंद ने ‘जागरण विवाद’ में विनोदशंकर के साथ धोखा किया और अपनी प्रेस के वरिष्ठ प्रवासीलाल वर्मा के साथ भी धोखा किया। जब उनकी बेटी बीमार हुई तो झाड़ – फूँक का भी सहारा लिया। जो साफ दर्शाता है कि वे भी कुछ हद तक अंधविश्वासी थे।

वैसे इन आरोपों का उनकी ख्याति पर कोई असर नहीं पड़ा है। आरोपों तुलना में उनकी याद में बनाए गए स्मारक, संस्थान आदि का अत्यधिक प्रभाव है।

मुंशी प्रेमचंद जी की उपलब्धियाँ व सम्मान

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी हिन्दी के प्रथम मौलिक उन्यासकार हैं। यदि उन्हें हिन्दी उपन्यासों का जन्मदाता कह दिया जाय तो अत्युक्ति नहीं होगी। उन्हें ‘उपन्यास सम्राट’ और ‘आधुनिक हिंदी कहानी का पितामह’ भी कहा जाता है।

बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चटोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर सम्मानित किया।

उनकी याद ताजा बनाए रखने के लिए 31 जुलाई, 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे के मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया गया।

गोरखपुर के जिस स्कूल (राजकीय दीक्षा विद्यालय) में मुंशी प्रेमचंद जी अध्यापक थे, वहाँ प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गयी। उन्होंने पहली नौकरी इसी स्कूल में 19 अगस्त 1916 से 26 फ़रवरी 1921 तक सहायक अध्यापक के पद पर की। वे इसी विद्यालय में छात्रावास अधीक्षक भी थे और विद्यालय परिसर में ही बने एक कमरे में रहते थे। जिस कमरे में मुंशी प्रेमचंद जी रहते थे, उनकी याद में उस कमरे को प्रेमचंद साहित्य संस्थान में बदल दिया गया।

डॉ॰ रामविलास शर्मा ने प्रेमचंद पर दो किताबें (‘प्रेमचंद’ तथा ‘प्रेमचंद और उनका युग’) लिखकर हिंदी साहित्‍य व आलोचना में उन्हें और अधिक प्रतिष्ठित कर दिया।

मुंशी प्रेमचंद जी की रचनाओं की सूची

कहानियाँ

अग्नि-समाधि
अधिकार-चिंता
अंधेर
अनाथ लड़की
अनिष्ट शंका
अनुभव
अपनी करनी
अभिलाषा
अमावस्या की रात्रि
अमृत
अलग्योझा
आख़िरी तोहफ़ा
आख़िरी मंज़िल
आखिरी हीला
आगा-पीछा
आत्म-संगीत
आत्माराम
आदर्श विरोध
आधार
आप-बीती
आभूषण
आल्हा
आसुँओं की होली
आहुति
इज्ज़त का खून
इश्तिहारी शहीद
इस्तीफ़ा
ईदगाह
ईश्वरीय न्याय
उद्धार
उपदेश
एक ऑंच की कसर
एक्ट्रेस
कजाकी
कप्तान साहब
कफ़न
कमला के नाम विरजन के पत्र
कर्मों का फल
कवच
कश्मीरी सेब
क़ातिल
कानूनी कुमार
कामना
कामना तरु
कायर
कायापलट
काशी में आगमन
कुत्सा
कुसुम
कैदी
कोई दुख न हो तो बकरी ख़रीद लो
कौशल
क्रिकेट मैच
क्षमा
खुचड़
खुदाई फ़ौज़दार
ख़ुदी
खून सफेद
गरीब की हाय
गिला
गुप्तधन
गुरु-मंत्र
गुल्ली डंडा
गृह-दाह
गृह-नीति
ग़ैरत की कटार
घमन्ड का पुतला
घर जमाई
घासवाली
चकमा
चमत्कार
चोरी
जंजाल
जादू
जिहाद
जीवन का शाप
जीवन-सार
जुगुनू की चमक
जुरमाना
जुलूस
जेल
ज्योति
ज्वालामुखी
झाँकी
ठाकुर का कुआँ
डामुल का कैदी
डिक्री के रुपये
डिप्टी श्यामाचरण
डिमॉन्सट्रेशन
ढपोरसंख
तगादा
तथ्य
तांगेवाले की बड़
तावान
तिरसूल
तेंतर
त्यागी का प्रेम
त्रिया चरित्र
दण्ड
दफ्तरी
दाराशिकोह का दरबार
दारोगाजी
दिल की रानी
दीक्षा
दुनिया का सबसे अनमोल रतन
दुराशा
दुर्गा का मन्दिर
दुस्साहस
दूध का दाम
दूसरी शादी
दो कब्रें
दो बहनें
दो बैलों की कथा
दो भाई
दो सखियाँ
धर्मसंकट
धिक्कार
धोखा
नबी का नीति-निर्वाह
नमक का दारोगा
नया विवाह
नरक का मार्ग
नशा
नसीहतों का दफ्तर
नागपूजा
नादान दोस्त
निमंत्रण
निर्वासन
नेउर
नेकी
नैराश्य
नैराश्य लीला
पंच परमेश्वर
पछतावा
पण्डित मोटेराम की डायरी
पत्नी से पति
परीक्षा
पर्वत-यात्रा
पशु से मनुष्य
पाप का अग्निकुंड
पिसनहारी का कुआँ
पुत्र प्रेम
पूर्व-संस्कार
पूस की रात
पैपुजी
प्रतापचन्द और कमलाचरण
प्रतिशोध
प्रायश्चित
प्रारब्ध
प्रेम का उदय
प्रेम का स्वप्न
प्रेम की होली
प्रेम सूत्र
प्रेरणा
फातिहा
बड़े घर की बेटी
बड़े बाबू
बड़े भाई साहब
बन्द दरवाजा
बलिदान
बहिष्कार
बाँका जमींदार
बाबाजी का भोग
बालक
बासी भात में खुदा का साझा
बूढ़ी काकी
बेटी का धन
बेटों वाली विधवा
बैंक का दिवाला
बोध
बोहनी
बौड़म
ब्रह्म का स्वांग
भाड़े का टटटू
भूत
मतवाली योगिनी
मंत्र
मंदिर
मंदिर और मस्जिद
मनावन
मनुष्य का परम धर्म
मनोवृत्ति
मन्त्र
ममता
मर्यादा की वेदी
महरी
महातीर्थ
माँ
माता का हृदय
माधवी
मिलाप
मिस पद्मा
मुक्ति-मार्ग
मुक्तिधन
मुफ्त का यश
मुबारक बीमारी
मूठ
मृतक-भोज
मृत्यु के पीछे
मेरी पहली रचना
मैकू
मोटर के छींटे
मोटेराम जी शास्त्री
यह भी नशा, वह भी नशा
यह मेरी मातृभूमि है
यही मेरा वतन
रक्षा में हत्या
रसिक संपादक
रहस्य
राजहठ
राजा हरदौल
राज्य-भक्त
रानी सारंधा
रामलीला
राष्ट्र का सेवक
रियासत का दीवान
लाग-डाट
लांछन
लेखक
लैला
लॉटरी
लोकमत का सम्मान
वज्रपात
वफ़ा का खंजर
वफा की देवी
वरदान
वासना की कड़ियाँ
विक्रमादित्य का तेगा
विचित्र होली
विजय
विदाई
विदुषी वृजरानी
विद्रोही
विध्वंस
विनोद
विमाता
विश्‍वास
विषम समस्या
विस्मृति
वैर का अंत
वैराग्य
शंखनाद
शतरंज के खिलाड़ी
शराब की दुकान
शांति
शादी की वजह
शाप
शिकार
शिकारी राजकुमार
शूद्र
शेख मखगूर
शोक का पुरस्कार
सच्चाई का उपहार
सज्जनता का दंड
सती
सत्याग्रह
सद्गति
सभ्यता का रहस्य
समर यात्रा
समस्या
सवा सेर गेहूँ
सांसारिक प्रेम और देश प्रेम
सिर्फ एक आवाज
सुजान भगत
सुभागी
सुहाग की साड़ी
सेवा मार्ग
सैलानी बंदर
सोहाग का शव
सौत
सौदा-ए-खाम
सौभाग्य के कोड़े
स्त्री और पुरुष
स्मृति का पुजारी
स्वत्व-रक्षा
स्वर्ग की देवी
स्वांग
स्वामिनी
हार की जीत
हिंसा परम धर्म
होली का उपहार
होली की छुट्टी

उपन्यास

अलंकार
असरारे मुआबिद
कर्मभूमि
कायाकल्प
कृष्णा
गबन
गोदान
निर्मला
प्रतापचन्द्र
प्रतिज्ञा
प्रेमा
प्रेमाश्रम
मंगलसूत्र
रंगभूमि
वरदान
श्यामा
सेवासदन
हमख़ुर्मा व हमसवाब

नाटक

बाबा जी का भोग
लघुकथाएँ
संग्राम
सृष्टि

निबंध / लेख

अहदे अकबर में हिन्दुस्तान की हालत
आबशारे न्याग्रा
इत्तिफाक ताकत है
कलामे सुरूर
जॉन आफ आर्क
पद्म सिंह शर्मा के साथ तीन दिन
शहीदे आजम

जीवनी

शेख़ सादी

आत्मकथा

मेरा जीवन

संस्मरण

एक शांत नास्तिक संत : प्रेमचंद / जैनेन्द्र कुमार

बाल साहित्य

कुत्ते की कहानी
जंगल की कहानियाँ
दुर्गादास
नादान दोस्त
पागल हाथी
मनमोदक
मिट्ठू
रामचर्चा
सैलानी बंदर
स्वराज के फ़ायदे

पत्र

अहमद अली के नाम
दो सखियाँ
पं. देवीदत्त शुक्ल के नाम 5 पत्र
पण्डित जी के नाम
प्रेमचंद-महताबराय पत्राचार
सज्जाद जहीर के नाम 7 पत्र

अनुवाद

आजाद-कथा
एक चिनगारी घर को जला देती है
क्षमादान
जवाहरलाल नेहरू के पत्र पुत्री के नाम
दो वृद्ध पुरुष
ध्रुवनिवासी रीछ का शिकार
प्रेम में परमेश्वर
मनुष्य का जीवन आधार क्या है
मूर्ख सुमंत
राजपूत कैदी

मुंशी प्रेमचंद जी के और उनसे सम्बन्धित कुछ चित्र

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मुंशी प्रेमचंद जी का चित्र
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मुंशी प्रेमचंद जी का चित्र
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मुंशी प्रेमचंद जी का चित्र
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मुंशी प्रेमचंद जी का चित्र
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मुंशी प्रेमचंद जी अपने कार्यालय में
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मुंशी प्रेमचंद जी और उनकी पत्नी शिवरानी देवी।
30 पैसे के डाक टिकट पर मुंशी प्रेमचंद जी की फोटो।
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मुंशी प्रेमचंद जी का हस्ताक्षर
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मुंशी प्रेमचंद जी के पैतृक गाँव में बना उनकी स्मृति में द्वार।
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लमही गाँव में मुंशी प्रेमचंद जी की संगमरमर से बनी प्रतिमा।
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गोरखपुर में स्थित मुंशी प्रेमचंद जी की झोंपड़ी में लगा एक शिलालेख।
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