महात्मा गाँधी की आत्मकथा – साक्षरता और समाज सेवा

महात्मा गाँधी के जीवन, चरित्र, स्वभाव आदि के बारे में विभिन्न लेखकों द्वारा बहुत सी पुस्तकें लिखी गयी हैं। जिनमें अलग – अलग दृष्टिकोण से उनके बारे में व्याख्या, आलोचना, समीक्षा आदि की गयी हैं। उनमें से सभी पुस्तकों को पूर्णतः सही साबित करना बहुत मुश्किल है। क्योंकि इतिहास में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो बचपन से मृत्यु तक महात्मा गाँधी के साथ रहा हो। इसीलिए पाठक उनकी आत्मकथाएँ बहुत पढ़ते हैं, क्यों कि वे स्वयं महात्मा गाँधी ने लिखी थी। महात्मा गाँधी अपने बारे में क्या लिखते हैं – ये जानने के लिए पढ़िए उनकी एक आत्मकथा – साक्षरता और समाज सेवा

जैसे-जैसे मैं अनुभव प्राप्त करता गया, वैसे-वैसे मुझे लगा कि अगर चम्पारन में ठीक से काम करना हो, तो गाँवों में शिक्षा का प्रवेश होना चाहिए। लोगों का अज्ञान दयाजनक था। गाँव में बच्चे मारे-मारे फिरते थे अथवा माँ-बाप नील के खेतों में दिनभर उनसे मजदूरी कराते थे, ताकि उन्हें दिन के दो या तीन पैसे मिल सकें।

साथियों से चर्चा करके मैंने प्रथम छह गाँवों में बच्चों के लिए पाठशालाएँ खोलने का निश्चय किया। शर्त यह थी कि उस उस गाँव के अगुवा मकान और शिक्षक के भोजन का खर्च खुद उठाएँ और बाकी दूसरे खर्च की व्यवस्था हम करें।

सबसे बड़ा सवाल यह था कि शिक्षक कहाँ से लाये जाएँ? मैंने एक आम अपील द्वारा इस काम के लिए स्वयंसेवकों की माँग की। बारह शिक्षकों और शिक्षिकाओं का एक दल बना।

लेकिन मुझे सिर्फ शिक्षा की व्यवस्था करके ही रुकना न था। गाँवों में गन्दगी का पार न था। बडों को स्वच्छता की शिक्षा देना आवश्यक था। चम्पारन के लोग रोगों से पीड़ा पाते देखे गये थे।

इस काम के लिए डॉक्टर की सहायता आवश्यक थी और मुझे यह सहायता मिल गई।

सबको यह समझा दिया गया था कि कोई निलहे गोरों के खिलाफ की जाने वाली शिकायतों में न पड़े, राजनीति को न छुए। कोई अपने क्षेत्र से बाहर एक कदम भी आगे न बढे। चम्पारन के इन साथियों का नियम पालन अदभुत था।

पाठशाला, सफाई और दवा के काम से लोगों में स्वयंसेवकों के प्रति विश्वास और आदर बढ़ा और उन पर अच्छा असर पड़ा।

लेकिन मुझे खेद के साथ कहना चाहिए कि इस काम को स्थायी रूप से करने की मेरी इच्छा पूरी न हो सकी। फिर भी छह महीनों तक जो काम वहाँ हुआ, उसने अपनी जड़ें इतनी जमा ली थी कि किसी न किसी स्वरूप में आज तक वहाँ उसका असर बना हुआ है।

एक ओर समाजसेवा का काम हो रहा था और दूसरी ओर लोगों के दुख की कहानियाँ लिखने का काम उत्तरोत्तर बढ़ते पैमाने पर हो रहा था। निलहे गोरों का क्रोध बढ़ने लगा। मेरी जाँच को बंद कराने की उनकी कोशिशें बढती गई।

एक दिन मुझे बिहार सरकार का पत्र मिला। उसका भावार्थ यों था – आपकी जाँच को शुरू हुए काफी अरसा हो चुका है, अत: अब आपको अपनी जाँच बन्द करके बिहार छोड देना चाहिए। पत्र विनयपूर्वक लिखा गया था, पर उसका अर्थ स्पष्ट था। मैंने लिखा कि जांच का काम तो अभी देर तक चलेगा और समाप्त होने पर भी जब तक लोगों के दुख दूर न हों, मेरा इरादा बिहार छोड़कर जाने का नहीं है।

गवर्नर सर एडवर्ड गेट ने मुझे बुलाया और कहा कि वे स्वयं एक जाँच समिति नियुक्त करना चाहते हैं। उन्होंने मुझे उसका सदस्य बनने के लिए निमंत्रित किया। समिति के दूसरे नाम देखने के बाद मैंने साथियों से सलाह की और इस शर्त पर सदस्य बनना कबूल किया कि मुझे अपने साथियों से सलाह मशवरा करने की आजादी रहनी चाहिए और सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि सदस्य बन जाने से मैं किसानों की हिमायत करना छोड़ न दूँगा तथा जांच हो चुकने पर मुझे सन्तोष न हुआ, तो किसानों का मार्ग-दर्शन करने को अपनी स्वतन्त्रता को मैं हाथ से जाने न दूँगा।

सर एडवर्ड गेट ने इन शर्तों को मुनासिब मानकर इन्हें मंजूर किया। जाँच-समिति ने किसानों की सारी शिकायतों को सही ठहराया और निलहे गोरों ने जो रकम अनुचित रीति से वसूल की थी उसका कुछ अंश लौटाने तथा ‘तीन कठिया’ के कानून को रद्द करने की सिफारिश की।

इस रिपोर्ट के सांगोपांग तैयार होने और अन्त में कानून के पास होने में सर एडवर्ड गेट का बहुत बड़ा हाथ था। उन्होंने समिति की सिफारिशों पर पूरा-पूरा अमल किया।

इस प्रकार सौ साल से चले आने वाले “तीन कठिया’ कानून के रद्द होते ही उसके साथ निलहे गोरों के राज्य का अस्त हुआ, जनता का तो समुदाय बराबर दबा ही रहता था उसे अपनी शक्ति का कुछ भान हुआ और लोगों का यह बहम दूर हुआ कि नील का दाग धोये धुल ही नहीं सकता।

चम्पारन में अभी मैं समिति के काम को समेट ही रहा था कि इतने में खेड़ा से मोहनलाल पंड्या और शंकरलाल पारीख का पत्र आया कि खेड़ा जिले में फसल नष्ट हो गई है और लगान माफ कराने की जरूरत है। उन्होंने आग्रहपूर्वक लिखा था कि मैं वहाँ पहुँचूँ और लोगों की रहनुमाई करूँ। मौके पर पहुँचकर जाँच किये बिना कोई सलाह देने की इच्छा न थी, न मुझमें वैसी शक्ति या हिम्मत थी।

दूसरी ओर से श्री अनसूया बाई का पत्र उनके मज़दूर-संघ के बारे में आया था। मजदूरों की तनख्वाह कम थी। तनख्वाह बढ़ाने को उनकी माँग बहुत पुरानी थी। इस मामले में उनकी रहनुमाई करने का उत्साह मुझमें था, लेकिन मुझमें यह क्षमता नहीं थी कि इस अपेक्षाकृत छोटे प्रतीत होने वाले काम को भी मैं दूर बैठा कर सकूँ। इसलिए मौका मिलते ही मैं तुरन्त अहमदाबाद पहूँचा।

अहमदाबाद में खेड़ा जिले के बारे में सलाह-मशवरा हो ही रहा था कि उसी बीच मैंने मजदूरों का काम अपने हाथ में ले लिया।

मेरी हालत बहुत नाजुक थी। मजदूरों का मामला मुझे मजबूत मालूम हुआ। मिल-मालिकों के साथ मेरा सम्बन्ध मीठा था। उनके विरुद्ध लड़ने का काम विकट था। उनसे चर्चाएँ करके मैंने प्रार्थना की कि वे मजदूरों की माँग के सम्बन्ध में पंच नियुक्त करें। किंतु मालिकों ने अपने और मजदूरों के बीच पंच के हस्तक्षेप के औचित्य को स्वीकार न किया।

मैंने मजदूरों को हड़ताल करने की सलाह दी।

रोज नदी किनारे एक पेड़ की छाया तले हड़तालियों की सभा होने लगी। उसमें वे रोज सैंकड़ों की संख्या में हाजिर रहते थे। मैं उन्हें रोज प्रतिज्ञा का स्मरण कराता था तथा शान्ति बनाये रखने और स्वाभिमान की रक्षा करने की आवश्यकता समझाता था।

मजदूरों की बात को आगे चलाने से पहले यहाँ आश्रम की झाँकी कर लेना आवश्यक है।

आश्रम की जगह कोचरब गाँव में थी। वहाँ प्लेग शुरू हुआ। प्लेग को मैंने कोचरब छोड़ने का नोटिस माना। श्री पूंजाभाई हीराचन्द ने आश्रम के लिए आवश्यक जमीन की खोज तुरन्त ही कर लेने का बीड़ा उठाया। उन्होंने आज जहाँ आश्रम है उस जमीन का पता लगा लिया। इसमें मेरे लिए खास प्रलोभन यह रहा कि यह जमीन जेल के पास है।

कोई आठ दिन के अन्दर ही जमीन का सौदा तय किया। जमीन पर न कोई मकान था, न कोई पेड़। नदी का किनारा और एकान्त जमीन के हक में ये दो बड़ी सिफारिशें थीं। हमने तम्बुओं में रहने का निश्चय किया और सोचा कि धीरे-धीरे स्थायी मकान बनाना शुरू कर देंगे।

स्थायी मकान बनने से पहले की कठिनाइयों का पार न था। बारिश का मौसम सामने था। इस निर्जन ज़मीन में साँप वगैरा तो थे ही। रिवाज यह था कि सर्पादि को मारा न जाय। लेकिन उनके भय से मुक्त तो हममें से कोई भी न था, आज भी नहीं है।

फीनिक्स, टॉलस्टॉय फार्म और साबरमती, तीनों जगहों में हिंसक जीवों को न मारने के नियम का यथाशक्ति पालन किया गया है। तीनों जगहों में निर्जन जमीनें बसानी पडी हैं। तीनों स्थानों में सर्पादि का उपद्रव काफी रहा है। तिस पर भी आज तक एक भी जान खोनी न पड़ी, इसमें मेरे समान श्रद्धालु को तो ईश्वर के हाथ का, उसकी कृपा का ही दर्शन होता है। कोई यह निरर्थक शंका न उठावे कि ईश्वर कभी पक्षपात नहीं करता, मनुष्य के दैनिक कामों में दखल देने के लिए वह निकम्मा नहीं बैठा है, आदि। मैं इस चीज को, इस अनुभव को दूसरी भाषा में रखना नहीं जानता। ईश्वर की कृति को लौकिक भाषा में प्रकट करते हुए भी मैं जानता हूँ कि उसका कार्य अवर्णनीय है। किन्तु यदि पामर मनुष्य दर्शन वर्णन करने बैठें, तो उसके पास तो अपनी तोतली बोली ही हो सकती है। साधारणत: सर्पादि को न मारने पर भी आश्रमवासियों के पच्चीस वर्ष तक बचे रहने को संयोग मानने के बदले ईश्वर की कृपा मानना अगर बहम हो, तो ऐसा बहम भी संग्रहणीय है।

मजदूरों ने शूरू के दो हफ्तों तक खूब हिम्मत दिखाई, शान्ति भी खूब रखी। प्रतिदिन की सभाओं में वे बड़ी संख्या में हाजिर भी रहे। प्रतिज्ञा का स्मरण तो मैं उन्हें रोज कराता ही था। वे रोज़ पुकार-पुकार कर कहते थे “हम मर मिटेंगे, लेकिन अपनी टेक कभी न छोडेंगे।”

लेकिन आखिर वे कमजोर पड़ने लगे और मुझे डर मालूम हुआ कि कहीं वे किसी के साथ जबरदस्ती न कर बैठें। मैं यह सोचने लगा कि ऐसे समय में मेरा धर्म क्या हो सकता है। जिस प्रतिज्ञा के करने में मेरी प्रेरणा थी, जिसका मैं प्रतिदिन साक्षी बनता था, वह प्रतिज्ञा क्योंकर टूटे? इस विचार को आप चाहे मेरा अभिमान कहिये, चाहे मज़दूरों के प्रति और सत्य के प्रति मेरा प्रेम कहिये।

सवेरे का समय था। मैं सभा में बैठा था। मुझे कुछ पता न था कि मुझको क्या करना है। किन्तु सभा में ही मेरे मुँह से निकल गया, “यदि मजदूर फिर से तैयार न हों और फैसला होने तक हड़ताल को चला न सकें तो मैं तब तक उपवास करूँगा।”

जो मजदूर सभा में हाजिर थे, वे सब हक्के-बक्के रह गये। वे एक साथ कह उठे, “आप नहीं, हम उपवास करेंगे। लेकिन आपको उपवास नहीं करना चाहिए। हमें माफ कीजिए, हम अपनी प्रतिज्ञा पालेंगे।”

मैने कहा, “आपको उपवास करने की जरूरत नहीं। आपके लिए तो यही बस है कि आप अपनी प्रतिज्ञा का पालन कों। हमारे पास पैसा नहीं है। हम मजदूरों को भीख का अन्न खिलाकर हड़ताल चलाना नहीं चाहते। आप कुछ मजदूरी कीजिए और उससे अपनी रोज की रोटी के लायक पैसा कमा लीजिए, ऐसा आप करेंगे तो हड़ताल फिर कितने ही दिन क्यों न चले, आप निश्चिन्त रह सकेंगे। मेरा उपवास तो अब फैसले से पहले न टूटेगा।”

इस उपवास में एक दोष था। मालिकों के साथ मेरा सम्बन्ध मीठा था। इसलिए उन पर उपवास का प्रभाव पड़े बिना रह ही नहीं सकता था। मैं जानता था कि सत्याग्रही के नाते मैं उनके विरुद्ध उपवास कर ही नहीं सकता। उन पर कोई प्रभाव पड़े, तो वह मजदूरों की हड़ताल का ही पड़ना चाहिए। मेरा प्रायश्चित उनके दोषों के लिए न था, मज़दूरों के दोषों के निमित्त से था। में मजदूरों का प्रतिनिधि था, इसलिए उनके दोष से मैं दोषित होता था। मालिकों से मैं केवल प्रार्थना ही कर सकता था। उनके विरुद्ध उपवास करना उन पर ज्यादती करने के समान था। फिर भी मैं जानता था कि मेरे उपवास का प्रभाव उन पर पड़े बिना रहेगा ही नहीं। प्रभाव पड़ा भी। किन्तु मैं अपने उपवास को रोक न सकता था। मैंने स्पष्ट देखा कि ऐसा दोषमय उपवास करना मेरा धर्म है।

मैंने मालिकों को समझाया, “मेरे उपवास के कारण आपको अपना मार्ग छोडने की तनिक भी जरूरत नहीं।” उन्होंने मुझे कड़वे – मीठे ताने भी दिये। उन्हें वैसा करने का अधिकार था।

मालिक केवल दयावश होकर समझौता करने का मार्ग ढूँढने लगे। श्री आनन्द शंकर ध्रुव भी बीच में पड़े। आखिर वे पंच बनाए गए और हड़ताल टूटी। मुझे केवल तीन उपवास करने पड़े। मालिकों ने मजदूरों में मिठाई बाँटी। इक्वीस दिन में समझौता हुआ।

मज़दूरों की हड़ताल समाप्त होते ही मुझे खेड़ा जिले के सत्याग्रह का काम हाथ में लेना पड़ा। उन दिनों मैं गुजरात सभा का सभापति था। सभा ने कमिशनर और गवर्नर को प्रार्थनापत्र भेजे, तार किये, अपमान सहे। सभा उनकी धमकियाँ पी गई।

लोगों की माँग इतनी साफ और इतनी साधारण थी कि उसके लिए लड़ाई – लड़ने को ज़रूरत ही न होनी चाहिए थी। कानून यह था कि अगर फसल चार आना या उससे कम आवे, तो उस साल का लगान माफ किया जाना चाहिए। लेकिन सरकार क्यों मानने लगी? लोगों की ओर से पंच बैठाने की माँग की गई। सरकार को वह असह्य मालूम हुई। जितना अनुनय-विनय हो सकता था, सो सब कर चुकने के बाद मैंने साथियों से परामर्श करके सत्याग्रह करने की सलाह दी।

पाटीदारों के लिए इस प्रकार की लड़ाई नई थी। गाँव-गाँव घूमकर इसका रहस्य समझाना पड़ता था। सरकारी अधिकारी जनता के मालिक नहीं बल्कि नौकर हैं, जनता के पैसे से उन्हें तनख्वाह मिलती है, यह सब समझाकर उनका भय दूर करने का काम मुख्य था। निर्भय होने पर भी विनय की रक्षा का उपाय बताना और उसे गले उतारना लगभग असम्भव-सा प्रतीत होता था। यदि सत्याग्रही अविनयी बनता है, तो वह दूध में ज़हर मिलने के समान है। विनय सत्याग्रह का कठिन-से-कठिन अंग है। यहाँ विनय का अर्थ सम्मानपूर्वक वचन कहना ही नहीं है। विनय का अर्थ है विरोधी के प्रति भी मन में आदर, सरल भाव, उसके हित की इच्छा और तदनुरूप व्यवहार।

शुरू के दिनों में लोगों में खूब हिम्मत पाई गई। आरम्भ में सरकार की कार्यवाही भी कुछ ढीली ही थी। लेकिन जैसे-जैसे लोगों की दृढ़ता बढ़ती मालूम हुई, वैसे-वैसे सरकार को भी अधिक उग्र कार्यवाही करने की इच्छा हुई। लोगों में घबराहट फैली। कुछ ने लगान जमा करा दिया। दूसरे मन-ही-मन यह चाहने लगे कि सरकारी अधिकारी उनका सामान जब्त करके लगान वसूल कर लें तो भर पाये। कुछ मर-मिटने वाले भी निकले।

भयभीत लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए मोहनलाल पंड्या के नेतृत्व मैं मैंने एक ऐसे खेत में खड़ी प्याज की तैयार फसल को उतार लेने की सलाह दी, जो अनुचित रीति से जब्त किया गया था। मेरी दृष्टि में इससे कानून भंग न होता था। लेकिन अगर कानून टूटता हो, तो भी मैंने यह सुझाया कि मामूली-से लगान के लिए समूची तैयार फसल को जब्त करना कानूनन ठीक होने पर भी नीति-विरुद्ध है और स्पष्ट लूट है। अतएव इस प्रकार की गई जब्दी का अनादर करना धर्म है।

मोहनलाल पंड्या और उनके साथियों के गिरफ्तार होने पर लोगों का उत्साह बढा।

इस लड़ाई का अन्त विचित्र रीति से हुआ। साफ था कि लोग थक चुके थे। मेरा झुकाव इस ओर था कि सत्याग्रही के अनुरूप प्रतीत होने वाला इसकी समाप्ति का कोई शोभाजनक उपाय मिल जाय, तो उसका सहारा लेना ठीक होगा। ऐसा एक उपाय अनसोचा सामने आ गया। नडियाद तालुके के तहसीलदार ने संदेशा भेजा कि अगर अच्छी हालत वाले पाटीदार लगान भर दें तो गरीबों का लगान मुलतवी रहेगा। सारे जिले की जिम्मेदारी तो कलेक्टर ही उठा सकता था, इसलिए मैंने कलेक्टर से पूछा। उनका ज़वाब मिला कि तहसीलदार ने जो कहा है, उसके अनुसार तो हुक्म जारी हो ही चुका है। प्रतिज्ञा में यही वस्तु थी, इसलिए इस हुक्म से हमने सन्तोष माना।

फिर भी इस प्रकार की समाप्ति से हम कोई प्रसन्न न हो सके। सत्याग्रह की लडाई के पीछे जो मिठास होती है, वह इसमें नहीं थी। कलेक्टर मानता था कि उसने नया कुछ किया ही नहीं। गरीब लोगों को छोड़ने की बात कही जाती थी, किन्तु वे शायद ही छूट पाये। जनता यह कहने का अधिकार आजमा न सकी कि गरीब में किसकी गिनती की जाय। मुझे दुख था कि जनता में इस प्रकार की शक्ति ही न थी। अतएव लड़ाई की समाप्ति का उत्सव तो मनाया गया, परन्तु इस दृष्टि से वह मुझे निस्तेज ही लगा।

सत्याग्रह का शुद्ध अन्त तभी माना जाता है, जब जनता में आरम्भ की अपेक्षा अन्त में अधिक तेज और शक्ति पाई जाती है। मैं इसका दर्शन न कर सका।

फिर भी खेड़ा की लड़ाई से गुजरात के किसान समाज की जागृति का और उसकी राजनैतिक शिक्षा का श्री गणेश हुआ।

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