सूचना प्रौद्योगिकी के युग में संयुक्त परिवार

परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है जहां से व्यक्ति संस्कारवान होकर मानव एवं संपूर्ण सृष्टि के बारे में ज्ञानार्जन करता है। भारत प्राचीन काल से ही संयुक्त परिवार की इस सभ्य परंपरा को सहेजता हुआ,संभालता हुआ वर्तमान की दहलीज़ तक आ पहुंचा है। दुनिया भर के कई देश भारतीय संस्कृति के इस अनोखे रिवाज़ को अपनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। संयुक्त परिवार व्यक्ति के सामाजिक दृष्टिकोण को व्यापक बनाते हुए उसकी पारिवारिक एवं सामाजिक जिम्मेदारियां से समय-समय पर उसको अवगत कराता रहता है। पुरातन काल से चली आ रही यह प्रथा भारत के संदर्भ में आज भी सकारात्मक माहौल पैदा करने का काम करती है। इसकी प्रमुख विशेषताओं में से एक है सामाजिक एकता जो एक इकाई के तौर पर बेहद सशक्त एवं आर्थिक सुदृढ़ीकरण का सर्वोत्तम उदाहरण है।

पुराने जमाने में संयुक्त परिवारों में से किसी भी परिवार में ज्यादा सदस्य होना संबंधित परिवार की मजबूती और उसकी संपन्नता का पर्याय माना जाता था। इस प्रथा में पारिवारिक उलझने बढ़ने की बजाय सुलझने की संभावना बहुत अधिक रहती थी क्योंकि परिवार के सभी लोग मिलकर किसी भी तरह की समस्या होने पर आपस में बैठकर सकारात्मक विचार विमर्श कर समाधान करने का प्रयास करते थे। वर्तमान दौर सूचना प्रौद्योगिकी का होने के कारण संयुक्त परिवार भी आज इसके विशाल दायरे में समाते जा रहे है। परिवार के सदस्यों का आपसी संवाद आजकल मीलों दूर होने के बावजूद पल भर में इसी सूचना प्रौद्योगिकी के सबसे उत्कृष्ट माध्यमों से संभव हो पाया है।

मोबाइल के जरिए लोग व्हॉट्स अप, फेसबुक, वीडियो कॉलिंग और फोटो शेयरिंग जैसी गतिविधियों से तुरंत एक दूसरे से संपर्क कर सकते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी ने आज की भागदौड़ भरी जीवन शैली में संयुक्त परिवार से बंधी रिश्तो की बुनियाद को मजबूत बनाए रखा है। संवाद के मध्य पनपने वाले समयांतराल को वीडियो कॉलिंग, वॉइस चैट, फ्री कॉलिंग जैसे सोशल साइट्स द्वारा प्रदत्त सुविधाओं ने बिल्कुल गायब कर दिया है। सूचना प्रौद्योगिकी की इस व्यापकता की आज न केवल शहरों तक बल्कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच बढी है। आम आदमी का सीधा जुड़ाव आज तकनीक से संभव हो पाया है। इस बात को कतिपय नकारा नहीं जा सकता है। इसने सबसे महत्वपूर्ण फायदा पहुंचाया है परिवार के सदस्यों के मध्य पनपने वाली कुंठाओं को आपस में शेयर करके उन्हें सकारात्मकता में तब्दील करने का। इससे पहले अक्सर बातचीत का इतना स्वतंत्र मंच परिवारों को, विशेषकर महिलाओं एवं बाल सदस्यों को नहीं मिल पाया था।

मान -मर्यादा, लिंग भेद, छोटे -बड़े का भेद सूचना प्रौद्योगिकी के समक्ष आज लड़खड़ाता दिख रहा है, यह एक सकारात्मक संकेत भी माना जा सकता है। कुछ मामलों में उपर्युक्त भेद संयुक्त परिवार के खात्मे का कारण भी बन जाते थे मगर आज खुलेपन का यह स्वर प्रबल होने से परिवार आपस में एक बार पुनः एकजुट होने लगे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी से संयुक्त परिवार को कई तरीके से सुदृढ़ किया जा सकता है। इंटरनेट के माध्यम से परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे के कार्यों का अवलोकन एवं मार्गदर्शन कर सकते हैं। परिवार के सदस्य मिलकर ई-कॉमर्स पर ध्यान केंद्रित करें तो व्यवसाय में बेहतर प्रगति कर सकते हैं, अपनी -अपनी रुचि के मुताबिक ऑनलाइन कोर्स भी किए जा सकते हैं। संयुक्त परिवार दरअसल संयुक्त रूप से मनोरंजन,स्वास्थ्य, सेवा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मिलजुल कर उन्नति कर सकते हैं।

संयुक्त रुप से पहल के तौर पर इन परिवारों के क्लब बनाकर कई नवाचार किए जा सकते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी में कंप्यूटर की भूमिका सर्वविदित है जो कि संयुक्त परिवारों को संरक्षण देने में सर्वोपरि भी है। कंप्यूटर ने आज लोगों के जीवन को सरल -सहज एवं उपयोगी बनाने का काम किया है। बेरोजगारी की समस्या पर शिकंजा कसने में आज सूचना प्रौद्योगिकी का बहुत बड़ा योगदान है। इसके व्यापक विस्तार से जनमानस का आपसी विश्वास भी तो बढ़ा है। 21वीं सदी में अत्याधुनिक तकनीकों के सदुपयोग से हमारी कार्यशैली में पारदर्शिता एवं तीव्रता आई है। वर्तमान दौर में हम अपने जीवन को कितना और कैसे बेहतर बना सकते हैं यह हमारे द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी के किए गये उपयोग पर निर्भर करता है।

आज कंप्यूटर, फाइबर ऑप्टिक्स, अंतर्राष्ट्रीय उपग्रह, डी टी एच टेलीविजन, एनिमेशन, मोबाइल,लैपटॉप, टैबलेट, डिजिटल नेटवर्क, मल्टीमीडिया,कंप्यूटर ग्राफिक्स, हाई डेफिनेशन टेलीविजन जैसी आधुनिक प्रणालियां हमारे समक्ष उपलब्ध है। इंटरनेट की इस श्रृंखला की सबसे उत्कृष्ट एवं नूतन व्यवस्था है इसकी उपायदेयता एवं प्रभावोत्पादकता घरेलू, सरकारी, गैर सरकारी और व्यावसायिक क्षेत्रों में आज काफी बढ़ गई है। शिक्षा, बैंकिंग, कंपनी, प्रबंधन, विपणन, बीमा, चिकित्सा, अंतरिक्ष,कृषि और अनुसंधान जैसी प्रक्रियाओं के स्वचालन में इंटरनेट की सराहनीय भूमिका है।

19वीं शताब्दी में चार्ल्स बावेज ने आधुनिक डिजिटल कंप्यूटर का आविष्कार किया तब से लेकर रहा आज तक सूचना प्रौद्योगिकी ने नवाचार को स्वीकारते हुए अपने आप में अनेक उत्कृष्ट बदलाव किए हैं। परिणाम स्वरुप लोगों की समस्याओं को हल करने में आज बेहद आसानी हुई है। आज मैन्युअल वर्क की बजाए कंप्यूटर पर आधारित ऑफलाइन एवं ऑनलाइन कार्यों पर हमारी निर्भरता बढ़ी है और इसी निर्भरता ने डिजिटल क्रांति का सूत्रपात किया है। ईमेल न्यूज़ ग्रुप, टेलनेट, फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल (एफ़टीपी) चैट, चैनल्स, ऑनलाइन सेवाएं, बुलेटिन बोर्ड सेवाएं और ऑनलाइन बैंकिंग जैसी आधुनिक सुविधाओं ने लोगों की जीवनशैली को आज काफी हद तक प्रभावित किया है। स्वर्गीय श्री राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल(1984 1989) में देश में सूचना प्रौद्योगिकी के विकास को पर्याप्त महत्व मिला था। परिणाम स्वरुप 1998 में भारत ने सुपर कंप्यूटर ‘परम ‘ को विकसित कर संपूर्ण विश्व को अचंभित कर दिया था।

सूचना प्रौद्योगिकी के पुराने माध्यम रेडियो जिसके तहत भारत में प्रसार भारती और आकाशवाणी का गठन देश के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है। 1984 से पूर्व रेडियो ने देशवासियों को एकजुट बनाए रखने में सराहनीय भुमिका निभायी। इस प्रसारण में सटीक खबरों, रोचक कार्यक्रमों, नाटक – नाटिकाओं और विशेष अवसरों पर आंखों देखा हाल के रूप में महत्वपूर्ण जानकारियां भारतीय परिवारों को सुलभता से प्राप्त हो रही है। सूचनाओं के शीघ्र प्रवाहन में रेडियो आज भी सबसे भरोसेमंद सूचना प्रौद्योगिकी के सर्वोत्तम साधन के रूप में भारतीय परिवारों के ह्रदय में बसा हुआ है। विविध भारती रेडियो सेवा का प्रसारण देश के हर उम्र वर्ग के लोगों को केंद्र में रखते हुए होता है जिससे आज भी हमें संयुक्त परिवारों की आवश्यकता का आभास होता रहता है, उनकी जरूरत महसूस होती है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत में संयुक्त परिवारों की जगह एकाकी परिवार लेने लगे है। आधुनिकता की आड़ में रिश्तो की अनदेखी बढ़ने से व्यक्ति स्वयं तक सीमित होता जा रहा है। कंप्यूटर मोबाइल लैपटॉप इत्यादि तकनीकों की आवश्यकता से अधिक उपयोग ने लोगों के आपसी संवाद को सीमित करने का भी काम किया है। सामाजिकता का आभासी दायरा आज सोशल साइट्स पर हमें बहुत बड़ा एवं करीबी लगने लगता है मगर वास्तव में हमारे पारिवारिक एवं सामाजिक रिश्ते इससे बहुत हद तक प्रभावित हुए हैं। तकनीकी के आगमन से व्यक्ति परिवार, रिश्तेदारों और मित्रों को समय नहीं दे पाता है। आज विचारों की अभिव्यक्ति में निश्चित रूप से इजाफा तो हुआ है मगर आज अपनत्व की भावना कहीं न कहीं कमजोर हुई है। स्वार्थपरकता को मजबूती मिली है जबकि एक तरफ लोगों को इस तकनीक सेे अभिव्यक्त का सर्वोत्तम और सहजता से उपलब्ध होने वाला मंच हासिल हुआ है। वही बात बात पर लोगों की भावनाओं के भड़कने से संवेदनशीलता का दायरा भी काफी हद तक सीमित हो गया है। सूचना प्रौद्योगिकी अभी भी इतनी विकसित नहीं हो सकी है कि आज हमारी भावनाओं का शत प्रतिशत आदान प्रदान हो सके।

समाज में एकाकी परिवारों की बढ़ती संख्याओं ने संयुक्त परिवारों की परंपरा को कमजोर किया है और यह सब कुछ मानवीय स्वार्थपरकता से ही अस्तित्व में आया है। बहरहाल आज समय की मांग है सूचना प्रौद्योगिकी की महत्ता और मानवीय संवेदनाओं को सर्वोपरि रखते हुए संयुक्त परिवारों के संरक्षण में हर नागरिक को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। रिश्तो की कद्र स्वार्थ से ऊपर उठकर की जानी चाहिए उससे हमारी पारिवारिक एवं सामाजिक एकता को मजबूती मिलेगी। समाज में बुजुर्गों का मान सम्मान बढ़ेगा और उनका मार्गदर्शन समाज की प्रगति में सहायक बन सकेगा।

सामाजिक एवं पारिवारिक एकता के सुनिश्चित हो जाने से राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिलने की संभावनाएं बढ़ेगी। रिश्तो में आत्मीयता भावी पीढ़ी के मानव विकास में काफी हद तक मददगार बन सकेगी। अन्तत: निष्कर्ष के तौर पर यह कहना उचित होगा कि भारत में अभी भी संयुक्त परिवार प्रथा बची हुई है, जबकि दुनिया के अनेक देश ऐसा कर पाने में नाकाम रहे है। संयुक्त परिवारों का बचना हमारी सामाजिक एवं सांस्कृतिक सहानुभूति का बेहतरीन प्रतीक है। अतः हम सभी को इसके महत्व को समझने की जरूरत है।

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