गाँधी और आज़ादी

आजादी के बाद देश में कुछ “धर्म-एकता-दल” धर्मों,वर्णों व जातियों के संगठन बनने लगे, हर एक संगठन किसी एक राजनैतिक मंच को समर्थन दें इसलिए इन संगठनों को राजनीति के लोग भी बढाने लगे और इन संघों का रूझान राजनीति की तरफ होने लगा। इन संगठनों के वरिष्ठ सदस्य राजनीति करने लगे और व्यक्तिगत फायदे भी देखने लगे, ये बात अलग है कि इन संगठनों का निर्माण या तो राजनीति से जुड़े लोगों के द्वारा हुआ या राजनीतिक सोच वाले लोगों के द्वारा हुआ आम जनता कभी इनकी सोच को नहीं समझ पायी।

देश में और भी कई संगठन बने जो सामाजिक मंच बनकर देश की सरकारों को आम-जनता की पीड़ा सुनाने की दुहाई देकर लोगों को एकत्रित करने लगे और बोलने लगे कि हमारा कोई संगठन या दल नहीं है हमारी तो सेना है सेना। इस तरह सेना भी राजनीति में आ गई हर रोज एक नयी सेना का गठन होने लगा और उनका राजनीतिक दलों में विलय होने लगा वहीं अब इस तरह के संगठनों को एक नया शब्द मिला है देश में जिसे “आर्मी” कहा जा रहा है।

अभी देश में आर्मी का भी गठन हो चुका है अब ये कौन सा अलग तरीका निकालेंगे देखते चलो…..यह बात सब जानते हैं कि किसी भी धर्म के वर्ण अथवा जातिय संगठनों ने उस धर्म को बांटने का ही काम किया है। आज हर देशवासी ये जानता है कि इस तरह के संगठन धर्मों को तोड़ने का काम करते हैं चाहे वो मुस्लिम समुदाय के लोगों में सीया, सुन्नी और कुरैशीयों के नाम पर हो या सवर्ण, वैश्य, क्षत्रिय,शूद्रों के नाम पर वर्णों के संगठन हों या जाट, गुर्जर, ब्राह्मण, ठाकुर, जाटव, वैश्य, तैली, सविता इत्यादि के नाम पर बनाये गये जातिय संगठन हों। लेकिन ये भी सच्चाई है कि इस तरह के संगठन उस जाति विशेष को तथा धार्मिक संगठन उस धर्म विशेष को एक जुट करने का काम भी करते हैं जिससे वो जाति अथवा धर्म के लोग अपनी बात को एक जुट होकर सरकार के सामने रख पाते हैं।

लेकिन इस तरह के संगठन जब देश में निजी स्वार्थ के लिए देश की व्यवस्था को क्षति पहुंचाते हैं तब मेरे मन की भावनाएं आहत होती हैं। शहीद-ए-आजम भगतसिंह ने कहा था कि जिस तरह की आजादी हमको मिलेगी वो आजादी नहीं होगी बस इतना होगा कि इन गोरों की जगह हमारे देश के ही कुछ भूरे लोग हमें अपना गुलाम बना लेंगे आज वही है और इस तरह के संगठन बना कर लोगों ने एक नयी तरह से देशवासियों को भ्रमित कर अपनी विचारधारा का गुलाम बनाने का काम किया है इससे अधिक कुछ भी नहीं।

मैंने एक वाक्या गांधी जी का पढ़ा है जिसमें देश की आजादी के बाद रतन टाटा ने गांधी जी से पूंछा कि बापू अब देश आजाद हो चुका है अब क्या करना है तब गांधी जी ने जवाब दिया कि अभी तो और लड़ना है तो रतन टाटा ने पूंछा कि अब किससे लड़ोगे तो बापू ने कहा कि अब तुम जैसों से लड़ना है। इतिहास गवाह है इस बात का कि गांधी जी ने उस वक्त भी दो तरह की लड़ाई लड़ी एक अंग्रेजों से तो दूसरी शूद्रों को उनकी पहचान दिलाने के लिए अगड़ी जातियों से और गांधी जी दोनों ही लडाइयों में सफल रहे लेकिन इनमें से कोन सी लड़ाई संम्पूर्णत: सफल रही ये कहना थोड़ा मुश्किल है।

शायद आपने भी पढ़ा होगा कि गांधी जी ने शुरू में कहा था कि “ईश्वर ही सत्य है” और बाद में यही वाक्य “सत्य ही ईश्वर है” में परिवर्तित कर दिया मैंने इस पर बहुत अधिक चिंतिन किया कि आखिर बापू ने क्यों तो पहले ईश्वर को सत्य बताया और बाद में क्यों सत्य को ही ईश्वर बनाया।
जब मेरी मुलाकात श्री चिम्मन लाल जैन जी से हुई जो गांधी जी के साथ आंदोलन का हिस्सा रहे हैं उनसे इस बात को पूंछा तब उन्होंने यह बताया कि कई लोग ईश्वर में विश्वास करते थे और कई लोग नहीं करते थे इसलिए उस समय इस आधार पर भी संगठन बनने लगे और गांधी जी की चिंताएं बढ़ गईं तब जाकर गांधी जी ने ये बोला कि जो सत्य है वही सत्य है और सत्य ही ईश्वर है।

गांधी जी के इसी विचार ने इस आधार पर विघटित संगठनों को एक जुट किया। आज भी देश की जनता को अपने अंदर गांधी को जगाना चाहिए और इस तरह कई विचारधाराओं की जगह देशभक्ति, देशप्रेम की विचारधारा को प्रगट करते हुए सभी संगठनों को एक होना चाहिए लेकिन मेरे देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यहां देश-भक्ति की विचारधारा का भी मापदंड अलग-अलग है। लेकिन इन सामाजिक संगठनों से मैं आज ये बात जरूर कहूंगा कि राजनीति को गले मत लगाओ।

अगर ऐसा करोगे तो आलस्य पुरुषार्थ को निगल जायेगा,
न्याय खड़ा पछतायेगा और कानून ही सत्य को खायेगा।
लालच-लोभ के घेरे होंगे,
अज्ञान के घोर अंधेरे होंगे
और पाखण्डों के ढेरे होंगे।
फिर देशद्रोही और देशभक्त की होगी पहचान नहीं
नेताओं के आचरणों पर और भी ज्यादा राजनीति शर्मिंदा होगी
फिर पग-पग पर इनकी निंदा होगी।

 सौरभ त्यागी

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