ब्रह्मांड

ब्रह्मांड जानने के लिए आप तथाकथित धार्मिक पुस्तकों की अपेक्षा विज्ञान का आश्रय लीजिए। इस सृष्टि में आप जो कुछ कंकड़,पत्थर,सोना, चाँदी आदि वस्तुएँ देख रहे हैं। सब परमाणुओं का संगठन है। परमाणुओं को संगठित होने में लाखों करोड़ों वर्ष लगते हैं। प्राय: हम समाचार पत्रों के माध्यम से पढ़ते है कि अमुक चीज़ या जीवाश्म एक दो या चार अरब पुराने हैं। लेकिन जब सृष्टि पर लेखनी चलानी पड़ती है तो बाईबिल या अंग्रेज़ी मानसिकता के ग़ुलाम ईसा से 3000 वर्ष पूर्व में सृष्टि की उत्पत्ति काल जोड़ देते हैं।विज्ञान को ताख पर रखकर हम ब्रह्मांड का अध्ययन कभी नहीं कर सकते हैं।

एक दिन में सूर्य बना चाँद बना,एक दिन में पृथ्वी बनी। 6 दिन में कुल ब्रह्मांड बन गया,7वा दिन विश्राम हुआ।यह एक कपोल कल्पित कल्पना नहीं है तो क्या है? क्या ब्रह्मांड की रचना की कोई ऐसी चीज़ है जिसमें निरन्तर परिवर्तन न हो। विश्राम अगर मिनट भर के लिए हृदय कर ले श्मशान घाट पहुँच जाएगा। ये ग्रह-नक्षत्र, तारे पृथ्वी अगर क्षण भर के लिए रुक गये, दिन काल वर्ष के आँकड़े गड़बड़ा जाएंगे। एक दूसरे से टकरा कर अस्तित्व खो देंगे। मगर क्या कीजिएगा हम विज्ञान विहीन पुस्तकों का अध्ययन करके सृष्टि की संरचना का मज़ाक उड़ाते हैं। इसी प्रकार विकासवादी कहते हैं कि आदि में इथर था उसमें कम्पन हुआ जिसके परिणाम स्वरुप गति, अग्नि, प्रकाश एवं विद्युत उत्पन्न हुआ। फिर धीरे धीरे आग का गोला बना उसमें विस्फोट हुआ एक-एक कर ग्रहों का निर्माण हुआ। पृथ्वी ठण्डी हुई जल बना उसमें अमीबा उत्पन्न हुआ फिर मछली मेढक बढ़ते-बढ़ते बन्दर और उससे मानव बना। लेकिन विकासवादी यह भूल जाते हैं कि बिना किसी में किसी माध्यम से गति या कम्पन दिए बिना कम्पन एवं गति उत्पन्न ही नहीं हो सकता। दूसरी बात यह है कि समान को समान जन्म देता है। क्या आपने कभी सुना है कि खच्चर ने बकरे को जन्म दिया आ लंगड़ा आम के बीज से अमरुद पैदा हुआ। किसान प्रतिवर्ष खेत मे गेहूँ और धान आदि के बीज बोता है। क्योंकि पूर्व प्रजाति अपने मूल रुप में होकर पुन:दो प्रजातियों से बनी बीज का रूप नहीं ले पाती हैं। मेण्डल ने भी मटर पर प्रयोग किया और पाया कि दो प्रजाति से तैयार मटर दुबारा तिबारा बोने पर अपने मूल रुप में आ जाता है पर मानव बन्दर से बनकर बन्दर न बनकर मानव बना रहा। हम कहते हैं कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज के अभाव में उसका विकास सम्भव नहीं है। बन्दर से उत्पन्न मानव को कौन समाज़ मिला जिससे उसके पास सबसे पहली भाषा संस्कृत मिली और सबसे पहली पुस्तक – ऋग्वेद।

आइए आगे चलते हैं सृष्टि ईसा से 3000 वर्ष पूर्व उत्पन्न हुई।आग के गोलों से छटक-छटक कर ग्रह, नक्षत्र, तारे बने। अगर ये छटके होंगे तो इनकी कोई गति रही होगी ऐसा तो नहीं इनकी गति प्रकाश के वेग से अधिक रही होगी। 5000 वर्ष पूर्व ये छटककर इतनी दूर गये कि अभी भी पृथ्वी तक आने में उनके प्रकाश को लाखों करोड़ों वर्ष लगेगें। है न आश्चर्य जनक बात। तथाकथित धर्म वालों और नास्तिकों ने विज्ञान का खूब मज़ाक उड़ाया। आश्चर्य तो आस्तिकों पर होता है कि ये भी बेचारे सृष्टि रचना पर उनके प्रभाव में आ गये जब सब विकास का परिणाम है तो सृष्टिकर्ता ईश्वर को क्यों कहते हैं।यह चिन्तन का विषय है।

आइए हम चलते हैं भारत के छह आस्तिक दर्शनों पर। ये हैं मीमांसा, न्याय, सांख्य, वैशेषिक, योग, वेदान्त।

हमने दर्शनों को इसलिए रखा कि इनमें कितनी सत्यता है विचार करना है।इन छह दर्शन के अलग-अलग विषय हैं लेकिन ये सब आपस में एक दूसरे के विरोधी नहीं अपितु पूरक हैं। ये सभी मिलकर कहते हैं कि बिना छह चीज़ों के कोई वस्तु नहीं बन सकती है

  1. मीमांसा कहता है कि बिना कर्मचेष्टा (मीमांसा) के कार्य जगत में कोई कार्य सम्भव नहीं है।
  2. न्याय (उपादान) बिना तत्व के कुछ नहीं बनता है।
  3. सांख्य (तत्वों का मेल) बिना तत्वों के मेल के कोई वस्तु नहीं बनती है।
  4. वैशेषिक (समय) बिना समय लगे कोई वस्तु बन ही नहीं सकती है।
  5. योग (विद्या,ज्ञान,विचार) विद्या, ज्ञान,विचार के अभाव में कैसे कोई वस्तु बनेगी।
  6. वेदान्त(कर्ता) बिना बनाने वाले के कभी कोई वस्तु बनती ही नहीं है।

इन दर्शनों और विज्ञान से दहाइये कि इस सृष्टि को बनाने में अगर कोई है तो वह परमात्मा है जिसने वुद्धि विवेक से जीवों के कर्म भोगने के लिए परमाणुओं में गति देकर उसे संगठित कर लाखो करोड़ो वर्ष में इस ब्रह्मांड को बनाया।

 अरुण कुमार ‘आर्य’

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