नवारम्भ

बाबू ओंकारनाथ श्रीवास्तव ‘अंचल’ कल ही बैंक की सेवा से रिटायर हुए थे। आज उनके नये जीवन का पहला दिन था, पर अन्य दिनों की भाँति वे सवेरे ही तैयार होकर बैंक चले गये थे। वहाँ अभी उन्हें कई मामले निपटाने थे- ग्रेच्युटी तथा अवकाश-नकदीकरण की चेकें बचत खाते में जमा करनी थींय पी. एफ. के पैसों की एफ. डी. करनी थी और इन सब कार्यों से निबटने के बाद बैंक ही के पास एक वृद्धाश्रम जाकर आर्थिक सहायता भी करनी थी। वृद्धाश्रम से उन्हें विशेश लगाव था, क्योंकि पिछले एक वर्ष से उनके मित्रवत् काव्यगुरू ‘सनेही’ जी वहां रह रहे थे।

नौकरी के साथ-साथ ओंकारनाथ कविताएं लिखा करते थे। पहले वे मुक्त छंद में, अथवा कहिए- गद्य कविताएं लिखते थे, पर जब से उन्हें सनेहीजी का सान्निध्य मिला था, वे छंदोबद्ध कविताएं लिखने लगे थे- गीत, गजल, दोहे, सवैया, घनाक्षरी आदि। कुछ कविताएं लघु पत्रिकाओं में छपी भी थीं, इससे उनका उत्साहवर्धन हुआ था। साथ-ही, अन्य रचनाओं के आकलन की समझ भी विकसित हुई थी। पहले वे शौकिया लिखते थे, पर अब लेखन जैसे उनका सामाजिक दायित्व बन गया हो। पिछले वर्ष उन्होंने अपने काव्य-संग्रह की पांडुलिपि भी तैयार कर ली थी, लेकिन किसी प्रकाशक के अभाव में वे अभी साहित्यिक संसार में अपनी आभा बिखेरने से वंचित थे।

सनेही जी को वे पहले अपने ही घर में रखना चाहते थे, पर पत्नी और बेटों की असहमति के चलते वे इस विचार को मूर्त रूप न दे सके। हालांकि घर उनका था- बैंक से लोन लेकर बनवाया था, फिर भी बच्चों की इच्छाओं के आगे वे विवश हो गये थे। जवान बेटों के बीच में बाप का कद कैसे बौना हो जाता है- इसका अनुभव उन्होंने पहली बार किया।

सनेहीजी आजीवन साहित्य-सेवा करते रहे। फलस्वरूप, वे न धन जोड़ पाये और न ही घर बनवा सके। धनाभाव तो था ही, दो वर्षों से वे विधुर भी थे। शासकीय सहायता अवश्य मिली थी, पर वह एक-दो साल ही चल पायी। अब उन्हें ओंकार जैसे दो-चार मित्रों तथा शुभचिन्तकों का अवलंब था। कोई नजदीकी रिश्तेदार नगर में था नहीं, एकाध दूर-दराज के जरूर थे, पर उनकी निर्धनता से रिश्तों के पौधे सूखे-के-सूखे ही रह गये।

ओंकार बाबू ने प्रमोशन नहीं लिया था। बाबू भरती हुए और बाबू ही रिटायर। बैंक में कर्मचारीगण भी उन्हें ‘बड़े बाबू’ कहकर संबोधित किया करते। ‘सर’ संबोधन सुनने का सपना ही उन्होंने नही देखा। इसीलिए, शायद जब भी प्रमोशन की परीक्षा में बैठना पड़ता, वे या तो मेडिकल लगा देते, अथवा परीक्षा में फेल होने के लिए बैठ जाते और बाकायदा फेल होकर खुशी मनाते। बाबू बने रहने से उपजने वाली हीन-भावना से वे कभी नही दबे, जबकि उनके साथ के लोग आज चीफ मैनेजर या रीजनल मैनेजर तक पहुँच चुके थे।

नौकरी में प्रमोशन न लेने के पीछे उनकी होम सिकनेस थी, जिसे वे अपने ही सिद्धान्त से ढँकते थे- ‘प्रमोशन लिया नहीं कि गृहस्थी चैपट!’ इस सिद्धान्त की पुष्टि वे बैंक के उन बाबुओं से करवाते थे जो प्रमोशन से या तो दूर भागते थे, या फिर वे उसके अधिकारी ही न थे। इसी सिद्धान्त की शक्ति से उन्होंने न केवल गृहस्थी बचा लेने की तथाकथित जंग जीती थी, बल्कि दोनों बेटों को अच्छी परवरिश भी की थी। अंग्रेजी मीडियम से उनकी पढ़ाई की व्यवस्था की और उन पर निरंतर अनुशासित दृष्टि रखी- तभी तो, एक सरकारी डाक्टर है और दूसरा पी. सी. एस. अधिकारी। बेटी का विवाह भी धूम-धाम से किया। दान-दहेज में कोई कसर न रखी, दामाद भी भारत सरकार में अधिकारी है।

कुल मिलाकर सब ठीक-ठाक चल रहा था कि पत्नी अचानक बीमार पड़ गयीं। जांच-पड़ताल के बाद पता चला कि उनकी दोनों किडनियां बेकार हो गयी हैं। किडनी ट्रान्सप्लांट होने का जुगाड़ हो ही रहा था कि उन्हें दिल का जानलेवा दौरा पड़ा। यह दौरा शायद उन्हें नहीं पड़ता यदि उन्हें यह पता न चलता कि घर में कोई किडनी नहीं देना चाहता, जबकि उनका तथा उनके एक बेटे और उनकी बहन का ब्लड गु्रप एक था। ….ओंकार अकेले रह गये।

बेटों के विवाह के रिश्ते आ रहे थे, पर बड़े वाले ने विवाह करने से मना कर दिया। थोड़ी झक-झक के बाद यह तय हुआ कि छोटे वाले का विवाह पहले कर दिया जाये, पर जो भी रिश्ते आ रहे थे वे अपेक्षाकृत निम्न मध्यम परिवार के लोग थे और अधिकांश क्लर्क या सेक्शन आॅफिसर जैसे लोग थे जो अपनी पुत्री का रिश्ता प्रचलित दान-दहेज के अनुसार करना चाहते थे। कोई भी उच्चवर्गीय घर से रिश्ता न आया था। आंेकार बाबू को अब अहसास हुआ, कि प्रमोशन न लेकर उन्होंने कितनी बड़ी गलती की है। यह अहसास तब और भी पुख्ता हुआ जब बेटों ने कोसने की सीमा तक प्रमोशन न लेने की बात कही।

जिस सिद्धांत के अन्तर्गत उन्होंने प्रमोशन नहीं लिया, अब वही उन्हें कटघरे में खड़ा करता था। किसी तरह छोटे बेटे का विवाह एक बिजनेसमैन की बेटी से हुआ जो पढ़ी-लिखी भी थी और अपने साथ अच्छा-खासा दहेज भी लायी थी। छोटे बेटे की नौकरी दिल्ली सरकार की थी, इसलिए बहू को लेकर वह दिल्ली चला गया।

बड़े बेटे ने प्रेम-विवाह किया- एक डाक्टरनी से, जो साथ में पढ़ती थी। गड़बड़ यह थी कि वह ब्राह्मणपुत्री थी, अपने मां-बाप की इकलौती संतान थी और उसके पिता ससुरजी के बैंक ही में उच्चाधिकारी थे। बहू के आने से बेटे के व्यवहार में परिवर्तन दिखायी देने लगा। बहू की दृष्टि में ससुरजी सम्मान पाने के अधिकारी न थे, क्योंकि वह अफसर की बेटी थी और किसी बाबू का सम्मान करना उसे सिखाया नहीं गया था। ओंकार ने दबी जुबान से इसकी शिकायत बेटे से की, पर बेटा ‘हां-हूं’ कर चुप हो गया। ‘श्रवणकुमार’ तो वह पहले भी न था और उसकी आशा भी ओंकार ने न की थी, पर उन्हें अपना अपमान असह्य था। कवि हृदय होने के कारण वे अतिरिक्त संवेदनशील थे। घर में भी दुनियादारी निभाने का समय आ गया है- यह उनकी समझ में बखूबी आने लगा था।

विधुर ओंकारनाथ जब तक नौकरी में थे, उन्हें कभी अकेलापन नहीं खला। नौकरी भी पत्नी की भांति होती है- वह लुभाती भी है और परेशान भी करती है। एक दिन सबको रिटायर होना पड़ता है। लेकिन अधिकांश बिना किसी तैयारी के रिटायर हो जाते हैं। आगे की कोई प्लानिंग नहीं! परिणाम, जीवन का रास्ता जैसे ब्लाक कर दिया गया हो। कल से क्या करना है? नये जीवन की शुरूआत कैसे करनी है? क्या दोस्तों के बीच गप्पे मारकर समय बिता देना है? आदि बातों पर ओंकार ने भी विचार नहीं किया था।

रिटायरमेंट के बाद आज पहली ही शाम थी, पर ओंकार को लगा कि उनका जीवन निरर्थक हो गया है। ….. बहू-बेटे हैं, समधी-समधिन हैं, पर सब के सब जैसे किसी और दुनिया के। अपनी असहायता को वे किसी से कह पाने की हिम्मत भी न जुटा पाये।

तीन-चार दिनों की अन्यमनस्कता से उबरकर वे वृद्धाश्रम चले गये और वहां सनेही जी से साहित्यिक चर्चा में संलग्न हो गये। इससे उन्हें जैसे जीवन का संबल मिल गया और उसकी दिशा भी- वे प्रेमचन्द साहित्य खरीद लाये और उसे पढ़ना शुरू कर दिया। …. परिस्थिति की पहेली सुलझने लगी।

बड़े बेटे के ससुर दिखावे के तौर पर रिश्ता निभाते थे- सुख-दुख में सम्मिलित होते, पर ओंकार के गले न लगते। फिर भी, एक नाता था जो अब दोनों के रिटायरमेंट के बाद एक नया रूप ले रहा था….दोनों समधी अब समान धरातल पर आ गये थे। जातीय भावना को छोड़ दें, तो पंडित जी का अफसर शांत हो चुका था और उसमें एक बाबू से नाता जोड़ने की हिचक भी समाप्त हो चुकी थी। पद, प्रतिष्ठा और पैसा एक सीमा तक ही आदमी को गुलाम बनाये रख सकते हैं। रिटायरमेंट के बाद जीवन में मनुष्यता की परीक्षा होती है। पैसे की धौंस प्रतिष्ठा या सम्मान नहीं दिला सकतीं। …… पंडितजी ने ओंकार के घर आना शुरू कर दिया।

रिटायर्ड आदमी के पास समय की कमी नहीं रहती- चाहे जितना अखबार पढि़ए, चाहे जितनी पुस्तकें पढि़ए, चाहे जितनी देर फोन पर बातें कीजिए, कितनी ही देर घूमिए-फिरिए। कुछ भी कर लीजिए, फिर भी समय बचा ही रहेगा। ओंकार बाबू इस मामले में सजग थे। उन्होंने अपनी साहित्यिक गतिविधियां तेज कर दीं। उनके काव्य-संग्रह की पांडुलिपि पहले ही तैयार थीं, वे उसके प्रकाशन में जुट गये। दिल्ली के एक प्रकाशक से बात हुई-सौ पृष्ठों की पुस्तक, हार्ड बाउंड पांच सौ प्रतियों के बीस हजार रुपये मांग रहा था। ओंकार दस हजार रुपये के बदले सौ प्रतियां चाह रहे थे, पर बात नहीं बनी। अंततः उन्होंने पत्नी के नाम का प्रकाशन खोल डाला और अपना तथा सनेही जी का काव्य-संग्रह छाप डाला। दोनों पुस्तकों में करीब तीस हजार रुपये खर्च हुए। पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ। समाचार-पत्रों में चित्र छपा। कवि और लोकार्पणकत्र्ता का नामोल्लेख भी हुआ।

ओंकार की प्रसन्नता का ठिकाना न था। वर्षों की साध पूरी हुई। जीवन में नया उल्लास था। भविष्य की योजनाएं थीं। …..समारोह पर करीब पांच हजार खर्च हुए। देश भर में कवियों, आलोचकों और संपादकों को पुस्तकें भेजने में भी दो-ढाई हजार खर्च हो गये।

इन सब व्यस्तताओं में चार-पांच महीने ऐसे बीत गये जैसे दस-पन्द्रह दिन ही बीते हों।

डाक्टर बेटे और बहू ने सोचा था कि पापा जब रिटायर होंगे, तो उनसे पंद्रह-बीस लाख रुपये लेकर किसी शांपिंग काम्प्लेक्स में एक दुकान खरीद लेंगे और उसमें प्राइवेट प्रैक्टिस करेंगे। पर जो भी दुकान मिल रही थी, वह पच्चीस-तीस लाख से कम की न थी और उनके पास केवल दस लाख तक की ही व्यवस्था थी- वह भी जेवरात बेचने या गिरवी रखने के बाद! पापा से मांगने पर भी दस ही लाख की व्यवस्था- मतलब, कुल बीस लाख! फर्नीचर वगैरह के लिए दो-ढाई लाख अलग से चाहिए। मामला बन नहीं रहा था…..

ओंकार ने बेटे को दस लाख देने की ‘हाँ’ तो कर दी, लेकिन दस लाख देने के बाद ओंकारनाथ के पास केवल पाँच लाख बच रहे थे। अभी जिन्दगी आगे क्या रंग दिखाये? यह सोच वे परेशान हो जाते। उधर बेटा और बहू अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से यही कहते कि पापा दस लाख से ज्यादा देना नहीं चाहते, जबकि उनके पास पन्द्रह-बीस लाख तो होंगे ही। पुस्तकों के प्रकाशन आदि पर बमुश्किल चालीस हजार रुपये खर्च हुए थे, लेकिन वे कहते- “लाखों रुपये किताबों पर उड़ाने के लिए हैं, पर हमें देने के लिए नहीं हैं!”

ओंकार बाबू ने हार कर अपनी सारी पूंजी बेटे के हवाले कर दी। बेटे ने भले ही उधार कह कर पैसे लिये थे, पर यह तो तय था कि पैसे वापस नहीं मिलने वाले। बाप की भविष्य निधि बेटे की वर्तमान निधि बन गयी।

बेटे ने दुकान खरीदी। क्लीनिक खुला और धीरे-धीरे चलने भी लगा। बेटा जनरल फिजीशियन था, बहू गायक्नोलाॅजिस्ट! दोनों सुबह-शाम क्लीनिक में बैठने लगे। बेटा हालांकि सरकारी अस्पताल में था, पर वह प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहा था। कई डाॅक्टर दोस्तों की तरह वह भी दृढ़ी था- जब तक नौकरी चलती रहेगी, वह यहीं से करेगा, पी.एच.सी. में जाकर नौकरी की, तो क्या की? शहर के डाक्टर गांव में जाकर नौकरी करना अपनी बेइज्जती समझते हैं। भले ही उन्हें अपनी आधी सैलरी भ्रष्टाचार देवता को चढ़ानी पड़े। ओंकार का बेटा भी अपवाद न था। इसका उन्हें दुख अवश्य था, पर उनके वश में कुछ न था। और तो और, वे बेटे से यह भी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाये कि वह ऐसा कर ठीक नहीं कर रहा, देश के साथ घात कर रहा है।

क्लीनिक खोलने के लिए श्वसुर जी ने पांच लाख रुपये दामादजी को दिये थे जिन्हें शीघ्र-ही चुकाया जाने लगा। श्वसुरजी यद्यपि पैसा वापस लेने से बराबर इन्कार करते रहे, तथापि उनका पैसा दो सालों में चुका दिया गया।

ओंकारनाथ ने कुछ पैसा पेंशन प्लान में लगा रखा था, क्योंकि बैंक में पेंशन नहीं थी। तीन हजार प्रतिमाह पेंशन के रूप में उनके बचत खाते में आ जाते थे। अब यही उनकी मासिक आय थी। इसी में से वे कभी-कभी घर के लिए फल-सब्जी खरीद लेते थे। उम्मीद थी कि महीने में जब वे चार-छः बार फल -सब्जी ले जायेंगे, तो बेटा हजार-दो हजार एक मुश्त दे देगा। फिर महीने के खर्च में आसानी रहेगी, लेकिन कल्पना तो कल्पना होती है, उसे यथार्थ में ढलने के लिए जिस कार्यशाली पूंजी की आवश्यकता थी, वह कभी न जुटी।

पहले, जब क्लीनिक नहीं खुला था, तो ओंकारनाथ कवि-मित्रों को घर पर ही बुला लेते और घंटों कविताओं और साहित्यिक चर्चा का आनंद उठाते। बीच-बीच में चाय-पानी की व्यवस्था घरेलू नौकर या महरी से पूरी हो जाती। पर, अब स्थिति बदल चुकी थी। नौकर उनकी सुनता न था और महरी बहूरानी के घर पर रहते ही आती थी। चाय-पानी की व्यवस्था अब ओंकार बाबू को स्वयं करनी पड़ती। कभी वे स्वयं ही किचन में चाय बना लेते, तो कभी चाय बाजार से थर्मस में भरकर आ जाती। जूठे कप महरी धोती थी और जब कभी वह छुट्टी मार देती, तो बहूरानी धोतीं। लेकिन यह व्यवस्था भी अधिक दिन चल न सकी। एक दिन जब वे थर्मस लेने किचन गये, तो देखा कि वहां ताला पड़ा हुआ है। ……
रात का खाना मिलने में भी आये दिन मुश्किल होने लगी। कभी बहू-बेटे, दोनों होटल से खाकर आ गये, कभी किसी पार्टी में चले गये। ऐसी अवस्था में ओंकार बाबू स्वयं ही खिचड़ी या दलिया आदि बनाते-खाते।

पिता का कोमल हृदय कठोर हो रहा थ। रिश्तों की पौध को प्रेम और आत्मीयता का खाद-पानी नहीं मिल रहा था। जिस फसल को लहलहाना था, वह सूखती जा रही थी। बाजारवाद और अवसरवाद ने परिवार को किसी निरीह संस्था में बदल दिया था।

आखिरकार ओंकार ने एक दिन जी कड़ा करके बेटे से पैसों का तकादाकर दिया, पर जैसा कि आशंका थी- न पैसे मिले और न ही उनके मिलने का आश्वासन। हां, इतना अवश्य हुआ कि बेटे ने चार-पांच हजार रुपये उनके हाथ पर इस ताकीद के साथ रख दिये कि भविष्य में वे पैसों की बात न करें। बस, अपनी जरूरतें बतायें। अगर वे पूरी होने वाली होंगी, तो जरूर पूरी की जायेंगी।

बेटे का यह व्यवहार देख ओंकार का जी धक्-से रह गया। आंखों में आंसू आये भी और सूखे भी। बिना खाना खाये वे रात-भर करवटें बदलते रहे। एकाध बार जरा-सी झपकी आयी। आज उन्हें पत्नी की सबसे अधिक याद आयी। सोच-विचार कर उन्होंने मन-ही-मन एक फैसला कर डाला।

अगले दिन वे बैंक पहंुचे। उन्होंने लोन लेकर जो मकान बनवाया था, उसके कागज अभी भी बैंक में बंधक पड़े थे। उन्हीं दिनों बैंकों में एक योजना आयी थी- ‘रिवर्स मार्गेज। ’ इसके अन्तर्गत वे मकान मालिक जिनकी अवस्था साठ साल या उससे अधिक थी, मकान के कागज बंधक रखकर ऋण ले सकते थे, जिसकी अदायगी न होने पर बैंक को अधिकार था कि ऋणी की मृत्यु के पश्चात् मकान की नीलामी कर अपना ऋण ब्याज समेत वसूल ले। ऋण चुकाने का उŸारदायित्व ऋणी के उत्तराधिकारियों पर था।

ओंकारनाथ ने उक्त योजना के अन्तर्गत दस लाख का ऋण ले लिया और मासिक किश्तों में उसके संवितरण का विकल्प चुना। धन से मिलने वाली सुरक्षा के साथ-साथ उन्हें मासिक खर्च की चिन्ता न थी।

लगभग एक माह वे घर में रहे, फिर वृद्धाश्रम चले गये। वहां उनके काव्यगुरु तो थे ही, दो-चार संगी-साथी और मिल गये। साहित्य के पठन-पाठन तथा सृजन का अच्छा अवसर मिला। प्रकाशन तो उन्होंने पहले ही खोल लिया था- बस, उसका पता बदल कर वृद्धाश्रम-वाला रख लिया। सहयोगी आधार पर एक काव्य-संकलन भी छापा जिसका खूब स्वागत हुआ। सौ पृष्ठीय पेपर बैक पुस्तक का मूल्य था- केवल पचास रुपये। दो सौ से अधिक प्रतियां बिक गयीं। पांच हजार का घाटा हुआ, जबकि उससे अधिक मूल्य की प्रतियां अभी बची हुई थीं।

पुस्तकों के प्रकाशन के बाद एक त्रैमासिक पत्रिका निकालने की योजना बनी, जिसमें दो खंड रखे जाने थे- ‘विरासत’ और ‘समकालीन सृजन’। ‘विरासत’ में उन साहित्यकारों की रचनाएं छापने का निश्चय किया गया जिनके दिवंगत हुए साठ वर्ष हो चुके हों ताकि काॅपी राइट का झंझट न रहे। समकालीन सृजन के लिए स्थानीय तथा अन्य प्रान्तों से रचनाएं मंगायी गयीं। आर.एन.आई. रजिस्ट्रेशन भी आवेदित किया गया। कई शीर्षक भेजे गये थे जिनमें से ‘नवारंभ’ स्वीकृत होकर आ गया। स्वामी-प्रकाशक-संपादक सभी कुछ ओंकारनाथ ही थे। मुद्रण व्यवस्था स्थानीय स्तर पर ही होनी थी। पत्रिका का पता वृद्धाश्रम का होने के कारण पाठकों तथा अन्य लोगों की सहज संवेदना उनके साथ थी।

दैनिक समाचार-पत्रों के हाकरों की सहायता से पत्रिका अधिकांश घरों में पहुंचने लगी। पहले निःशुल्क वितरित की गयी, हालांकि उसका मूल्य दस रुपये रखा गया था, जिन घरों में पत्रिका का प्रवेशांक भेजा गया, उनके मालिकों ने पहले तो आपत्ति की कि उन्हें पत्रिका की आवश्यकता नहीं है, पर बाद में उनका विचार बदला, क्योंकि पत्रिका का उद्देश्य व्यावसायिक न था। लोगों की रुचियों में परिष्कार हो, टी.वी. की बल्गरिटी का प्रभुत्व कम हो, बाजारवाद के विरुद्ध एक मानस तैयार हो, देश की राजनैतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक दशा व दिशा में जन सामान्य की सक्रिय भूमिका हो, आदि बिन्दुओं पर पत्रिका में विचारोत्तेजक लेख, कहानियां, कविताएं आदि होती थी।

पत्रिका का स्वरूप धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर का होने लगा। पाठकीय प्रतिक्रियाएं प्रेरणास्पद एवं दिग्दर्शिका बनीं। सुदूर प्रांत से प्रतिष्ठित लेखकों की रचनाएं भी आने लगी थीं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में ‘नवारंभ’ की समीक्षाएं-चर्चाएं छपीं। पहले पांच सौ प्रतियां छपती थीं, अब हजार भी कम पड़ने लगीं।

ओंकारनाथ ने जो पौधा रोपा था, वह फलदार वृक्ष बन चुका था। उनकी प्रसिद्धि भी देश के विभिन्न भागों में पहुंच चुकी थी, पर उनमें लेशमात्र अभिमान न था। विनम्रतापूर्वक वे अपना कार्य संपादित कर रहे थे। धनादि की व्यवस्था बिक्री तथा विज्ञापनों से हो जाती थी, कभी-कभी थोड़ा घाटा होता। लेकिन उसे यह सोच सह लिया जाता कि देश के निर्माण में घाटा-मुनाफा नहीं देखा जाता। साहित्यिक पत्रकारिता वह यज्ञ है जिसमें श्रम-परिश्रम, रचनाधर्मिता, धनादि की आहुतियां निरंतर देनी पड़ती हैं। पाठकों की मांग थी कि पत्रिका मासिक हो, पर इसके लिए जिन अतिरिक्त संसाधन की आवश्यकता थी, वह ओंकारबाबू या उनके सहयोगियों की सामथ्र्य से बाहर थी। अतः वह त्रैमासिक ही बनी रही।

ओंकारबाबू, सनेही जी तथा वृद्धाश्रम के उनके संगी-साथी, सभी यथासामथ्र्य ‘नवारंभ’ की सेवा में संलग्न हैं। अब उन्हें न घर की याद सताती है और न ही रिटायरमेंट के बाद के जीवन की चिन्ता। एक अंक डिस्पैच होते ही दूसरे की तैयारी में लग जाते हैं। उन्हें जीवन का उद्देश्य जो मिल गया है। वे उसे पूरे उत्साह से पूरा कर रहे हैं। ‘नवारंभ’ उनके जीवन का भी तो नवारंभ है।

बड़ा बेटा और बहू वृद्धाश्रम से उन्हें घर ले जाने की कोशिश में हैं। उन्हें पता चल गया है कि जिस घर में वे रहते हैं, वह बैंक में बंधक पड़ा है। आज वे लोग फिर आये हैं- ओंकारनाथ को वापस ले जाने के लिए। उनके आग्रह पर वे मुस्कुरा देते हैं और अपने काम में व्यस्त हो जाते हैं।

 

 

2 प्रतिक्रिया

संपर्क में रहें