माँ की सौगंध

दोपहर का समय था। पूना में सेना के वित्त विभाग के कार्यालय में एक नौजवान कर्मचारी बार-बार गिड़गिड़ाकर दो दिन की छुट्टी माँग रहा था। मगर अंग्रेज़ अधिकारी ने उसकी छुट्टी की अर्ज़ी मंजूर करने से इंकार कर दिया। इस नौजवान का नाम वासुदेव बलवन्त फड़के था। वासुदेव की माँ गाँव में सख्त बीमार थी। उनकी बीमारी का तार आया था। बलवन्त को जल्दी घर बुलाया गया था। मगर उसे दफ्तर से छुट्टी नहीं मिल पा रही थी।

यह सन् 1869 की बात है। भारत की गुलामी के दिन थे। पूरे भारत में अंग्रेज़ों की तूती बोलती थी। भारतीय लोगों पर तरह-तरह के अत्याचार किए जाते थे। नौकरियों में भी भारी भेद-भाव बरता जाता था। मगर भारतीय इसको सहने के लिए मजबूर थे, क्योंकि वे गुलाम थे।

वासुदेव बलवन्त फड़के अपनी माँ से  बहुत प्यार करते थे। जब दो दिन तक अंग्रेज़ अधिकारियों ने उनकी छुट्टी मंजूर नहीं की तो वे बहुत परेशान हो उठे। उन्होंने बिना छुट्टी के ही घर जाने का निश्चय कर लिया। वे अपने गाँव शिरोढान के लिए चल पड़े। जिस समय वासुदेव अपने गाँव पहुँचकर घर में प्रवेश कर रहे थे, उसी समय उनकी माँ सरस्वती बाई इस संसार से विदा हो गईं। वासुदेव को माँ की जगह उनकी लाश मिली। वासुदेव माँ-माँ पुकारते हुए माँ के शव से लिपट गए।

वासुदेव के दुख का कोई अंत नहीं था। अंत समय में माँ से न मिल पाने की पीड़ा उन्हें खाए जा रही थी। इस दुर्घटना ने आज पहली बार उन्हें गुलामी का अहसास कराया था। उनके मन में सोया हुआ विद्रोही क्रांतिकारी जाग उठा। वे पूरी तरह अंग्रेज़ों के शत्रु  बन गए। अंग्रेज़ों को भारत से खदेड़ देने की मन में ठान ली। उन्होंने गुलामी की नौकरी को ठोकर मार दी और पूरी तरह क्रांतिकारी कार्यों में जुट गए। अंग्रेज़ों के खिलाफ उन्होंने लोगों को भड़काना शुरू कर दिया। बगावत करने के लिए उन्होंने पूना के रामोसियों को संगठित किया। रामोसी पूना की जरायम पेशा जाति थी। इन लोगों का काम लूटमार करना था। इस जाति के लोग फुर्तीले और बहादुर थे। मरने-मारने से वे ज़रा भी नहीं घबराते थे। इन लोगों ने वासुदेव को अपना नेता मान लिया। वासुदेव भी रामोसी बनकर उनके बीच में रहने लगे थे।

वासुदेव चाहते थे कि अंग्रेज़ों के खिलाफ बगावत करने के लिए एक सेना तैयार की जाए। जब और किसी तरह से धन का इंतज़ाम नहीं हो पाया तो क्रांति के लिए धन इकट्ठा करने के लिए वे रामोसियों के साथ मिलकर डाका डालने लगे। थोड़े दिनों में ही वासुदेव के पास काफी धन इकट्ठा हो गया। कुछ बंदूकें और तलवारें भी जमा हो गईं। उन्होंने कुछ और हथियार भी खरीदे। वासुदेव लूटे हुए धन का बाकायदा हिसाब रखते थे।

धीरे-धीरे वासुदेव की ताकत बढ़ती गई। उनका आतंक चारों ओर फैल गया। वासुदेव की बढ़ती गतिविधियों से अंग्रेज़ सरकार बहुत चिन्तित हो उठी। पुलिस की सरगर्मियाँ बढ़ गईं। वासुदेव को पकड़ने के लिए पुलिस ने जगह-जगह पर इश्तिहार लगाए। सरकार ने उनको पकड़वाने वालों को इनाम देने की घोषणा की। मगर कोई फर्क  नहीं पड़ा। वासुदेव को पकड़ना इतना आसान काम नहीं था। डाका डालने के बाद वासुदेव अपने दल के साथ पहाड़ियों में जाकर छिप जाते थे।

इधर वासुदेव को पकड़ने के लिए पुलिस का घेरा बढ़ता जा रहा था, उधर वासुदेव का मन डकैती के काम से उचाट होने लगा था। वासुदेव ने यह अनुभव किया कि जिस पवित्र उद्देश्य के लिए वे डकैतियां डालते हैं, वह उद्देश्य तो पूरा नहीं हो रहा है। रामोसी उनकी विचारधारा से सहमत नहीं थे।

वासुदेव लूट के धन को जनता और स्वराज्य की अमानत समझकर खर्च करना चाहते थे मगर रामोसी उस धन को अपने कामों में खर्च करने लगे। वे अपने पास लूट का माल रखने लगे और उसका हिसाब देने से कतराने लगे। यह देखकर वासुदेव को अपने काम में ग्लानि होने लगी। उन्होंने अपनी टोली की कमान एक विश्वासी साथी दौलतराम को दे दी और स्वयं कुछ दिनों विश्राम करने के लिए कुर्नूल चले गए।

इसी दौरान सरकारी दफ्तरों  में रात के समय अचानक भयानक आग लग गई। अंग्रेज़ सरकार ने इस घटना के लिए वासुदेव को ही दोषी ठहराया। अतः चारों ओर वासुदेव की खोज होने लगी। इधर वासुदेव बड़े थके हुए और निराश थे। उनकी तबियत भी खराब थी। अंग्रेज़ों से भारत को आज़ाद कराने का उन्हें कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। इस निराशा की स्थिति में एक दिन उन्होंने मंदिर में देवता के सामने अपनी गर्दन काटकर चढ़ानी चाही। मगर पास ही खड़े किसी आदमी ने उनका हाथ पकड़ लिया। उसने वासुदेव को अपना कार्य पूरा करने की प्रेरणा दी।

वासुदेव के मन में फिर से उम्मीद जागी। उन्हें फिर प्रकाश दिखाई देने लगा। वासुदेव हैदराबाद राज्य में घूमकर रूहेला सरदारों से मिलकर एक सेना का गठन करने में लग गए। उधर अंग्रेज़ पुलिस का क्रूर दानव मेजर डेनियल तथा हैदराबाद का पुलिस अधिकारी सैयद अब्दुल हक वासुदेव की तलाश में लगे हुए थे। दोनों यमदूत बने उनका पीछा कर रहे थे।

एक रात वासुदेव अपने एक साथी के साथ देवर नाडगी के मंदिर में विश्राम कर रहे थे। थके तो थे ही, उन्हेें बुखार भी चढ़ा हुआ था। मेजर डेनियल और अब्दुल हक ने एक पुलिस टोली के साथ उन्हें रात में जा घेरा। उन्हें उसी समय अचानक गिररतार कर लिया गया।

पूना जेल में वासुदेव पर मुकदमा चलाया गया। उन्हें आजन्म काले पानी की सज़ा दी गई। अंग्रेज़ों की निगाह में वह अत्यन्त खतरनाक मुजरिम थे, इसलिए उन्हें देश से बाहर अदन जेल भेज दिया गया। अदन जेल में ही वासुदेव बलवन्त फड़के वतन की आज़ादी की लड़ाई लड़ते-लड़ते शहीद हो गए।

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