काउण्टर साइन

बाबू रामलाल पिछले छः महीने से बीमार हैं। कमज़ोर तो पहले से ही थे मगर इस बीमारी ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी है। बेचारे सूख कर काँटा हो गए हैं।

मैं बाबू रामलाल को पिछले तीन साल से जानता हूँ। वे मेरे पड़ोस में ही रहते हैं। लम्बा-पतला शरीर, सिर पर इक्का-दुक्का बाल, सोच में डूबा हुआ चेहरा और चश्में से झाँकती हुई सवालिया निगाहें। यही उनका हुलिया है।

साधारण पाजामा-कमीज, पैर में हवाई चप्पल, हाथ में थैला और नज़र का चश्मा लगाए बाबू रामलाल को शायद ही कभी किसी ने खुल कर हँसते देखा हो। अच्छे से अच्छे प्रसंग पर वह सिर्फ मुस्करा कर रह जाते हैं।

बाबू रामलाल के घर में आठ अदद प्राणी हैं। उनकी पत्नी, पाँच लड़कियाँ, एक लड़का और वह खुद। म्यूनिसिपल बोर्ड में एक मामूली क्लर्क हैं और उन्हें कुल चौदह हज़ार रुपये वेतन मिलता है। इस वेतन में इतने प्राणियों का ठीक से पेट पालना मुश्किल हो जाता हैै। फिर भी गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह घिसट रही है।

बाबू रामलाल का दफ्तर उनके घर से पाँच किलोमीटर दूर हैै। हालांकि दफ्तर तक रिक्शा, बस एवं टैम्पो सभी जाते हैं मगर मैं उन्हें पैदल ही दफ्तर आते-जाते देखता हूँ।

धूप हो या सर्दी, हवा हो या वर्षा, वे सुबह आठ बजे ही घर से निकल पड़ते हैं तथा पाँच किलोमीटर का सफर दस बजे तक तय कर डालते हैं।

दफ्तर के समय में शायद ही कभी किसी ने उन्हें इधर-उधर टहलते या चाय पीते देखा हो। वे ठीक दस बजे अपनी सीट पर बैठ जाते हैं और फिर पाँच बजे ही उठते हैं। उनके साथी और दफ्तर के दूसरे लोग उन्हें सिड़ी या सनकी कहते हैं मगर वे किसी को परवाह नहीं करते और अपनी सीट का काम पूरी मुस्तैदी से निपटाते हैं।

परिवार की गाड़ी ठेलने के लिए वह दफ्तर के बाद दो घंटे एक प्राइवेट कम्पनी में पार्ट टाइम जॉब करते हैं और फिर थकान से चूर होकर लगभग दस बजे घर लौटते हैं।

बाबू रामलाल का यह नियम बिना नागा चलता रहता, अगर वे बीमार न पड़ते। एक दिन दफ्तर से लौटते समय काफी तेज वर्षा होने लगी और वे बुरी तरह भीग गए। जाड़े के दिन थे, उन्हें सर्दी लग गई और उसी रात बुखार आ गया।

सुबह उठे तो बुखार कुछ हल्का था। वे दफ्तर चले गए। रात को लौटे तो बुखार फिर तेज़ हो गया। यही सिलसिला पाँच-छः दिन चलता रहा। सुबह बुखार हल्का होने पर वह दफ्तर चले जाते और रात को लौटते तो बुखार फिर तेज़ हो जाता।

फिर कमज़ोरी बढ़ती गई और बुखार धीरे-धीरे ज़ोर पकड़ता गया। बाबू रामलाल पैसे की तंगी के कारण काफी दिनों तक दवा-दारू लेने या डॉक्टर के यहाँ जाने से कतराते रहे जिससे बीमारी और बढ़ गई। फिर जो बाबू रामलाल ने खाट पकड़ी तो छः महीने तक उठ नहीं पाए।

पिछले कुछ दिनों के बाद बाबू रामलाल की तबीयत लगभग ठीक है। कमज़ोरी की वजह से अभी उनकी हालत दफ्तर  जाने लायक नहीं हो पाई है मगर घर के हालात को देखते हुए वह दो-तीन दिन से दफ्तर जा रहे हैं मगर अधिकारी महोदय ने उन्हें अभी ऑफिस में ज्वाइन नहीं कराया है। वे यह कह कर रामलाल को वापस कर देते हैं कि पहले चिकित्सकीय प्रमाणपत्र पर सी.एम.ओ. से काउंटर साइन कराके लाओ, तभी तुम्हें ऑफिस ज्वाइन कराया जाएगा।

बाबू रामलाल ने अधिकारी महोदय की काफी खुशामद की। साहब, अभी बीमारी की वजह से काउंटर साइन की फीस के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं, जब वेतन मिल जाएगा तब मैं काउंटर साइन करा कर प्रमाणपत्र जमा कर दूँगा मगर अधिकारी महोदय पर उनकी अनुनय-विनय का कोई असर नहीं हुआ और वे अपनी बात पर अड़े रहे।

हार कर बाबू रामलाल ने कहीं से पैसों का जुगाड़ किया और आज चिकित्सकीय प्रमाणपत्र पर सी.एम.ओ. के काउंटर साइन कराने के लिए सुबह से ही अस्पताल गए हुए हैं।

सुबह दस बजे से बाबू रामलाल सी.एम.ओ. साहब के दफ्तर के सामने टहल रहे हैं। कई बार वह सी.एम.ओ. साहब के स्टैनो से खुशामद कर चुके हैं कि भाई साहब, हमारा काम जल्दी करा दो, कमज़ोरी की वजह से हमसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा है।

स्टैनो हर बार उन्हें झिड़क देता है और कहता है, यहाँ सब जल्दी वाले ही आते हैं। काम कराना हो तो खड़े रहो वर्ना अपने घर का रास्ता नापो। जब सी.एम.ओ. को फुर्सत होगी, तभी तुम्हारे कागज़ात को देखेंगे।

तीन बजने वाले है। खड़े-खडे़ बाबू रामलाल की टाँगें जवाब देने लगी हैं। सुस्ताने के लिए वे ग्राउंड में पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए हैं।

खैर, किसी तरह इंतज़ार की घड़ियां खत्म हुई। चपरासी आकर रामलाल से बोला- आपको स्टैनो साहब बुला रहे हैं।

बाबू राम लाल फौरन उसके साथ चल दिए।

स्टैनो बाबू रामलाल के कागज़ों पर एक सरसरी नज़र डालते हुए बोला- जल्दी से फीस निकालो, साहब जाने वाले ही हैं।

बाबू रामलाल ने फीस के पैंतीस रुपए निकाल कर स्टैनो के हाथ पर रख दिए।

यह क्या! सिर्फ पैंतीस रुपये। सी.एम.ओ. साहब एक महीने के प्रमाणपत्र पर काउंटर साइन करने के पचास रुपए लेेते हैं। तुम्हें छः महीने का चाहिए, इसलिए पचास रुपए महीने के हिसाब से तीन सौ रुपए देने होंगे। स्टैनो गुस्से से बोला।

मगर साहब, सरकारी फीस तो पैंतीस रुपये ही है।- बाबू रामलाल किसी तरह साहस जुटाकर बोला।

एक तो छः-छः महीने का झूठा प्रमाणपत्र चाहिए और ऊपर से नियम-कानून पढ़ाने चले आते हैं। जाइए, नहीं होंगे काउंटर साइन। स्टैनो बाबू रामलाल के कागज़ फेंकते हुए बोला।

बाबू रामलाल कहना चाहते हैं कि मैं तो वस्तव में ही बीमार रहा हूँ साहब, मगर स्टैनो के तेवर देख कर शब्द उनके गले में ही अटक कर रह गए।

घबराहट और कमज़ोरी से उनकी टाँगें काँपने लगती हैं। धीरे-धीरे उनकी आँखों के आगे अंधेरा-सा छाने लगता है और वे बेहोश होकर गिर जाते हैं।

कोई उन्हें उठा कर पंखे के नीचे लिटा देता है।

उधर इस हादसे से बेखबर उनकी पत्नी दाल, चावल और आटे के कनस्तरों को झाड़-झाड़ कर शाम के खाने के लिए राशन तलाश कर रही है और बुदबुदा रही है- बड़ी देर कर दी, अभी तक लौटे नहीं।

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