बीरबल का दुख (महान कौन – अकबर या महाराणा)

गँवार भी जानता है कि तानसेन, रहीम, टोडरमल आदि के साथ-साथ बीरबल भी अकबर के ‘नवरत्नों’ में सम्मिलित था। अकबर के नवरत्न एक-से-बढ़कर-एक विद्वान् और कलाकार थे। सभी अपने-अपने क्षेत्र के माहिर थे। अकबर विद्वानों का आदर और कलाकारों का सम्मान करता था। उसके नवरत्नों में विद्वता और कला, दोनों थीं। इसलिए, वह उनका आदर और सम्मान, दोनों करता था। उसके सम्मान करने और आदर देने का एक कारण यह भी था कि वह स्वयं अनपढ़ था। संगीत सुनने के शौक़ के अलावा उसके किसी कला  से कोई लेना-देना नहीं था। यदि वह पढ़ा-लिखा विद्वान होता, तो उसे ईर्ष्या करने से ही अवकाश न मिलता, आदर-सम्मान के झंझट से बच जाता!

उसे जब यह अहसास होता कि वह बादशाह है और नवरत्न उसके मातहत, तो वह आदर और सम्मान को अवकाश दे देता। मातहत भी कहीं आदरणीय और सम्माननीय हो सकता है!

नवरत्न बनने से पूर्व श्रीमान बीरबल पान के बीड़े बेचते थे। उस समय बीड़ी प्रचलन में आयी थी या नहीं, ज्ञात नहीं। यदि पी जाती होती, तो उसे भी बेचते होंगे। बीरबल चूना लगाने में माहिर थे। इसके बावजूद उनका पान दूर-दूर तक मशहूर था। वे पान में चूना और कत्था लगाने के दौरान हास्य-व्यंग्य की कविता सुनाया करते थे। जब कविता नहीं सधती थी, तो सरस्वती मन्त्र का जाप किया करते थे–  ॐ क्लीं-क्लीं, ॐ… ॐ…  इससे ग्राहकों का पूरा पैसा वसूल हो जाता। एक पान की क़ीमत में पान के साथ-साथ कविता या बुद्धिवर्धक मन्त्र! पान में केवड़े की ख़ुशबू से मेच करता पवित्र मन्त्र की सुगन्ध!

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एक दिन अकबर बादशाह की सवारी उधर से निकली, जिधर बीरबल की दुकान थी। उस समय दुकान पर पान खाने और कविता सुनने वाले ठेलुओं की भीड़ जमा थी। हाथी पर सवार अकबर की निगाह भीड़ पर ठहर गयी। उसके मन में प्रश्न उठा – भीड़ हुकूमत के ख़िलाफ़ बग़ावत की साज़िश तो नहीं कर रही! महावत को कहा कि दुकानदार को बुलवाओ।

बीरबल डरते-डरते आया। बादशाह के कड़क कर पूछने पर उसने अपना परिचय कविता में दिया। अकबर ने बीरबल की बुद्धिमानी और चतुराई के क़िस्से सुन रखे थे। माता सरस्वती की महिमा देखिए कि बीरबल अकबर को पहली ही नज़र में जँच गया। उसने उसे अपने मंत्रि-मण्डल में शामिल होने का न्योता दे डाला। बीरबल को तो मनमाँगे से भी अधिक मिल गया। उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि वह मन्त्री बन जाएगा! ठीक ही है, राजाश्रय मिल जाए, तो एक पनवाड़ी भी मन्त्री और ‘नवरत्न’ हो जाता है।

लक्ष्मी को तो बरगलाया जाना सुना था, लेकिन यहाँ सरस्वती के साथ भी ऐसा हो गया—जय हो सरस्वती माता! यह भी सिद्ध हुआ कि सरस्वती भी चापलूसी-पसन्द हैं और अपने भक्तों की फ़रमाइश पर बादशाहों की मति फेरने का काम किया करती हैं। त्रेता युग में यह नेक काम उन्होंने कैकेयी के साथ भी किया था।

अकबर के बारे में सुना जाता है कि वह पैदाइशी महान था। यों तो मेवाड़ के महाराणा प्रताप भी महान थे, पर उनकी महानता बड़ी कष्टदायक थी। अकबर की महानता में सुख-सुविधा के लड्डू-पड़े लगे रहते थे, जबकि राणा प्रताप की महानता में घास की रोटियाँ ही थीं। महानता वही प्रसिद्धि पाती है, जिससे सुख-सुविधाएँ झरती हैं।

अकबर और महाराणा प्रताप में हमेशा ठनी रहती थी। अकबर ने राणा से कई लड़ाइयाँ लड़ीं, लेकिन विजयी न हुआ। परास्त हो उसने कूटनीति की। मेवाड़ में फूट डलवायी। मानसिंह को सेनापति का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। मानसिंह की सलाह पर अकबर ने राणा से दोस्ती करनी चाही। कहा, “राणा! मेरी अधीनता स्वीकार कर लो; मैं तुम्हें रत्न बनाकर रखूँगा। नवरत्नों में शामिल कर लूँगा!

राणा ने अकबर को डाँट दिया, “तुम्हारे जैसे म्लेच्छ और ढोंगी को मैं अपने अधीन न रखूँ। तुम्हारी यह कहने की हिम्मत कैसे हुई कि मैं तुम्हारी अधीनता स्वीकार कर सकता हूँ!”

राणा की फटकार से अकबर बहुत दुखी हुआ। अकबर दुखी हुआ, तो बीरबल दुखी हुआ। दुखी होना उसका राजधर्म था।

उनने अकबर का दुःख दूर करने की सोची। इसी ग़रज़ से वह जंगलों की ख़ाक छान रहा था कि राणा प्रताप से टकरा गया। उन दिनों राणा प्रताप घास की रोटियों पर जीवित थे। उन्होंने दुश्मन के आदमी को भी अतिथि माना और उसे घास की रोटी ऑफर की, लेकिन बीरबल ने उसको खाना तो दूर, उसकी तरफ़ देखा तक नहीं। उस समय तक अकबर की दी हुई रसद ख़त्म हो चुकी थी, फिर भी बीरबल ने कहा, “मैं ब्राह्मण हूँ। भिक्षा माँग लूँगा, पर घास की रोटी को हाथ भी न लगाऊँगा!”

राणा ने बीरबल को समझाया कि स्वाधीनता की घास पराधीनता की मलाई से लाख गुना अच्छी है, पर बीरबल ने इसे अपना तथा अपने अन्नदाता- अकबर का अपमान समझा। उसने राणा को धमकी-भरी सलाह दी कि वे अकबर महान की अधीनता स्वीकार कर लें, तो उन्हें मेवाड़ पुनः सौंप दिया जाएगा, वरना उन्हें स्वाधीनता की घास भी न खाने दी जायेगी! उसने अकबर की महानता का जमकर बखान किया, लेकिन महाराण प्रताप ने उसे दुत्कार दिया। अपमानित होकर बीरबल जंगल से भागा। राणा के सिपाहियों ने उसका पीछा करना चाहा, पर राणा ने उन्हें रोक दिया।

बीरबल की चतुराई धरी-की-धरी रह गयी। पहले वह अकबर के दुख से दुखी था। अब वह राणा की फटकार से दुखी था; अपने अपमान से दुखी था। हालाँकि उसका अपना क्या था? जो भी था, अकबर का था; फिर भी वह अपने शरीर और सुख-दुख़ को अपना कहने का भ्रम पाले हुए था।

(2)

कुछ शोधशास्त्री मानते हैं कि बीरबल बचपन  में उतना चतुर नहीं था, जितना कि विवाह के बाद हो गया था— ख़ास तौर पर जब उसकी बेटी थोड़ी सयानी हुई।

बेटी सयानी हो, तो बाप को भी सयाना बनना पड़ता है। पर कभी-कभी सयाना बाप भी सयानी बेटी से मात खा जाता है। बीरबल के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। लेकिन वह चतुर आदमी था। उसने बेटी की चतुराई का लाभ उठाया। राज-काज के मसलों पर उसने बेटी से सलाह-मशविरा करने लगा। इससे बीरबल की धाक और भी बढ़ी।…

राणा प्रताप वाले मसले को लेकर एक दिन बीरबल का मन बड़ा उदास था। वह बेचैनी की अवस्था में बेटी के पास पहुँचा। उसे सारा हाल कह सुनाया। बेटी ने मामले पर गौर करने के बाद कहा, “पिता जी! महाराणा प्रताप भारत का स्वाभिमानी बेटा है। वह वास्तव में महान है; अनुकरणीय है। अकबर तो अपनी चालाकियों से महान बना हुआ है।… आपको चाहिए की आप अकबर का नहीं,  राणा प्रताप का साथ दें!”
बेटी से उसे ऐसी उम्मीद न थी। उसने लालच देकर उसका मन बदलना चाहा, “लेकिन बेटी! यह महल, ये नौकर-चाकर, ये राजसी ठाठ! सब कुछ छिन जाएगा। मैं अकबर के विरुद्ध कैसे जा सकता हूँ? वह मेरा उद्धारक है, बेटी! राणा का साथ देकर मैं तो जीते जी मर जाऊँगा। मैं मरना नहीं चाहता, जीना चाहता हूँ!… मैं अपनी बेटी का सुख नहीं छीनना चाहता!”

पिताजी! आप मेरी चिन्ता न करें। मैंने इस राजसी ठाठ-बाट में कभी सुख का अनुभव नहीं किया। मैं कठिन-से-कठिन अवस्था में रह लूँगी, परन्तु मुझे अकबर की महानता स्वीकार्य नहीं!… क्षमा कीजिए, आप जैसे सत्ता-लोभियों के कारण ही अकबर अपनी महानता बघार रहा है और महराणा प्रताप घास की रोटियों खाने को विवश हैं!”

बेटी से लताड़ खाकर बीरबल और दुखी हो गया। अपना दुख़ खर्च करने की ग़रज़ से उसने जब मामले की चर्चा अपने नवरत्न मित्र टोडरमल से की, तो उसने सुझाव दिया कि बेटी जब बाप को पढ़ाने लगे, तो उसका विवाह शीघ्रातिशीघ्र कर देना चाहिए। बेटियाँ यदि सत्ता सम्बन्धी विचार व्यक्त करें, तो समझिए कि सामजिक विद्रोह का ख़तरा उत्पन्न हो चला है!

बीरबल को बेटी के विवाह की बात जँच गयी। वह उसके लिए उपयुक्त वर की तलाश में जुट गया। थोड़े दिनों के लिए उसने राणा के विरुद्ध खोले हुए मोर्चे पर ताला लगा दिया। अकबर ने भी बीरबल को ज़्यादा डिस्टर्ब नहीं किया। वह उसकी वफ़ादारी से पूरी तरह से मुतमइन था।

उधर जब बेटी को पता चला कि पिताजी सामजिक ठेकेदारों के कहने पर उसके लिए बेड़ियाँ तलाश रहे हैं, तो उसने एक रात चुपके से राजमहल को लात मार दी।… अब वह मन्त्री की बेटी नहीं, आम जनता थी। इसलिए दर-दर की ठोकरें खाने लगी।

बीरबल अपनी बेटी खोने से दुखी था। फिर भी उसने अपनी निष्ठा से अकबर की महानता को पागलपन की सीमा तक खाया-पिया, ओढ़ा-बिछाया और एक दिन अकबर महान की ओर से लड़ते-लड़ते शहीद हो गया।

(3)

बीरबल जैसे लोग न होते, तो अकबर भला कैसे महान बनता? महान बना, तो बना; वह भारतीय संविधान की शोभा भी है। ज्ञातव्य है कि भारत के संविधान की मूल प्रतियों के सभी अध्यायों के प्रारम्भिक पृष्ठ के लगभग आधे भाग में भारतीय अस्मिता की पहचान को किसी-न-किसी रूप में रेखांकित किया गया है— पहले अध्याय में ‘मोहनजोदड़ो’ का रेखाचित्र है, तो दूसरे में एक ‘वैदिक आश्रम’। दूसरा अध्याय नागरिकता का वर्णन करता है। संविधान शायद कहना चाहता है कि भारत का सच्चा नागरिक वही है, जो झोपड़ी में रह ले और लँगोटी पहनकर जीवन व्यतीत कर ले।  तीसरा अध्याय नागरिकों के मूल अधिकारों के बारे में है। उसमें राम लक्ष्मण और सीता के वन-गमन का रेखाचित्र अंकित है। आशय यह कि अधिकार चाहिए, तो कर्तव्यपरायण होना होगा; आवश्यकता पड़ने पर सत्ता को भी त्यागना होगा। चौथे अध्याय में कृष्ण द्वारा अर्जुन को गीतोपदेश का चित्र अंकित है। इसी प्रकार, सभी अध्यायों के प्रारम्भ में किसी-न-किसी पौराणिक या ऐतिहासिक घटना को दर्शाया गया है। किसी-किसी अध्याय में हमारे पूर्वजों में से किसी एक का चित्र रेखांकित है। इसी क्रम में एक अध्याय के प्रारम्भ में ‘अकबर महान’ भी रेखांकित हैं।

महाराणा प्रताप घास की रोटियाँ खाते थे, इसलिए वे भारत के संविधान में रेखांकित होने से वंचित रह गये।
संविधान ने तो अपने पूर्वजों में से अकबर को चुन लिया है। आप किसे चुनेंगे?

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