बस्ता खुश हो गया

देवांश की तबीयत ठीक नहीं थी। वह टेबल पर सिर रख कर सो गया। तभी उसे किसी के फुसफुसाने की आवाज आई। उस ने ध्यान से इधर-उधर देखा। आवाज किधर से आ रही है। तभी उस का ध्यान बस्ते की ओर गया। टेबल पर रखा उसका नीला बस्ता पास वाले लाल बस्ते से कह रहा था, ‘‘ तुम बहुत सुंदर हो !’’

‘‘ हां,’’ पास ही रखा लाल वाला साफ-सुथरा बस्ता कह रहा था, ‘‘ मैं भी सुंदर हूं और मेरे अंदर रखी कापी किताबें भी सुंदर हैं।’’

‘‘ ठीक कहते हो,’’ देवांश के नीले बस्ते से निकली हुई गणित की किताब कह रही थी, ‘‘ एक मेरी हालत देखो। मैं जगहजगह से फट गई हूं। मेरा कवर तो है ही नहीं।’’

‘‘ हां बहन, ठीक कहती हो।’’ लाल रंग के सुंदर बस्ते के अंदर से बाहर निकली सजी-धजी हिंदी की किताब कह रही थी, ‘‘ मगर, जहां तक मुझे याद है। तुम मुझे से बाद में आई थी। फिर तुम्हारी स्थिति इतनी खराब कैसे हो गई ?’’

‘‘ क्या बताऊं , बहन ? ’’ गणित की किताब ने कहा, ‘‘ मेरा मालिक है ना, वह थोड़ा लापरवाह है।’’

‘‘ हां हां, देवांश नाम है, वही ना ?’’ हिन्दी की किताब बोली।

‘‘ हां हां, वहीं, ’’ गणित की किताब ने कहा, ‘‘ वह बहुत नेकदिल इंसान है। मगर, मेरा ध्यान नहीं रखता है। यहां से जब घर जाता है तब वह मेरे बस्ते को उठा कर फेंक देता है। जैसे पीठ पर लदा बोझा उतार कर फेंक दिया हो। इस से हम बुरी तरह आपस में टकराते हैं।  फिर धरती पर गिरती हैं। आपस में टकराने से बचती हैंतो दीवार से टकरा जाती हैं।

‘‘ इस से हमारे अस्थिपंजर हिल जाते हैं,’’ यह कहते हुए गणित ने अपने नीले बस्ते का कोना दिखाया।,‘‘ यह कोना देखो, यह पलंग की कील से टकराने के कारण फट  गया है। फिर, इस पर लगी सब्जी ने इस के रेशों को गला-सड़ा दिया है। इस से बस्ता इस जगह से बेकार हो गया।’’

नीला बस्ता चुप था। वह बहुत गंदा हो रहा था। टिफिन से निकला खाना उस पर लगा हुआ था। उस ने अपने को झटका दिया। बस्ते पर लगी सब्जी  निकल कर नीचे गिर गयी। उसे गणित की बात सही लग रही थी,‘‘ देख लो ! मेरे ऊपर सब्जी लगी है।’’ नीले बस्ते ने बुरा सा मुंह बना कर कहा, ‘‘ इस ने मुझे बदरंग बना रखा है।’’

लाल बस्ते से  बदबू आ रही थी। वह नाक-भौं सिकोड़ कर बोला, ‘‘ वाकई तुम तो बदबू मार रहे हो।’’

‘‘ हां भाई, क्या करूं ? मेरे अंदर सब्जी के साथ-साथ रोटी और तेल मसाला लगा हुआ है। वह मेरे कपड़े के शरीर को सड़ा रहा है। इसलिए बदबू आ रही है।’’ नीले बस्ते ने कहा, ‘‘ मगर, तुम्हारे शरीर से बहुत अच्छी सुगंघ आ रही है,’’ कहते हुए नीले बस्ते ने अपनी नाक से सांस ऊपर खीच लीं।

‘‘ मेरे मालिक ने कल ही मुझे सुगंधित साबुन से नहलाया था। इस कारण मेरे शरीर से खुशबू आ रही है,’’ लाल बस्ते ने अपनी खुशबू का राज बताया।

‘‘ काश ! मेरा मालिक भी मुझे सुगंधित साबुन से नहला कर साफसुथरा रखता तो मैं भी आज तुम्हारे जैसा चमक कर खुशबू बिखैर रहा होता।’’ कहते हुए नीला बस्ता लाल बस्ते को देखने लगा।

‘‘ हां भाई, ठीक कहते हो, ’’ लाल बस्ते से निकली हिंदी की किताब कह रही थी, ‘‘ हर बस्ते को तुम्हारे जैसा मालिक नहीं मिलता है। वह तुम्हारी देखभाल अच्छी तरह करता है। इस कारण तुम सब चमकीली और नई नवेली दिख रही हो। हमारी किस्मत ऐसी कहाँ है। अन्यथा हम भी चमकते।

‘‘ हमारे मालिक को देखा। वह स्वयं मोटाताजा और बेढंगा है। इसलिए हमें भी बेढंगा रखता है।’’

‘‘ ठीक कहते हो, ’’ लाल बस्ते ने कहा, ‘‘ बस्ते से ही उस के मालिक की पहचान होती है। जैसा बस्ता होगा वैसा ही उस का मालिक होगा।’’

यह बात सुन कर देवांश को गुस्सा आ गया। उसी के सामने, उसी की किताबें और बस्ते, और उसकी बुराई करे। यह वह कैसे बर्दाश्त कर सकता था। वह गुस्से से भर उठा। इस बस्ते को सबक सिखाना पड़ेगा। आज इसे फाडफूड़ कर चूल्हें में फेंक दूंगा। यह सोचते हुए उसने अपना हाथ उठाना चाहा कि लाल बस्ते की किताब बोल पड़ी, ‘‘ हमारे मालिक अमन को देखो। वह हमेशा साफ-सुथरा रहता है। रोज दौड़-भाग करता है। हर खेलकूद में हिस्सा लेता है। स्वयं साफ-सुथरा रहता है। हमें भी साफ-सुथरा रखता है।

‘‘ हमारे कवर को देखो। इन्हें व्यवस्थित रखता है। जब गंदे होते हैं साफसुथरे कर देता है। जब खराब होते हैं, नए बदल देता है। यह हमारे नए कपड़े है। जो हमें सुंदर बनाते है।’’

‘‘ वाकई तुम्हारा मालिक अच्छा है। वह स्वयं खेलता-कूदता व दौड़ता रहता है। उस की सेहत भी अच्छी रहती है और तुम्हेंं भी अच्छा रखता है। काश ! हमारा मालिक भी हमारी बात समझ पाता,’’ यह सुन कर देवांश का हाथ रूक गया। वरना, वह किताबों को सबक सिखा देता। वाकई, किताबें सही कह रही थी। देवांश ने अपने बस्ते की सारी किताबों की दशा खराब कर रखी थी। कई किताबें फट चुकी थी। कइयों के कवर नहीं थे। कई मुड़ी हुई थी। कापियें खराब हो रही थी। उन पर स्याही लगी हुई थी। बस्ता फटा, गंदा व बेकार हो रहा था। देवांश स्वयं मोटा व थुलथुला लग रहा था। इस कारण, वह अकसर बीमार रहता था।

यह सुन कर देवांश सोच में पड़ गया। वाकई बस्ता व किताबें सही कह रहे हैं। वह बहुत लापरवाह और आलसी हो चुका है। यह सोचते ही उस ने अपना बस्ता उठाया और एक निश्चय किया। वह आज के बाद साफ-सुथरा रहेगा। रोज दौड़-भाग करेगा। वह स्वयं भी साफ-सुथरा रहेगा ओर बस्ते को भी साफ-सुथरा रखेगा।

‘‘चलो भाई ! आज से मैं स्वयं को बदलूंगा। अपना बस्ता साफ-सुथरा रखूंगा। स्वयं भी दौड़-भाग कर अपना शरीर साफ-सुथरा रखूंगा।’’ यह कहते ही वह उठ कर स्कूल से बाहर चल दिया।

यह सुन कर उस की पीठ पर लटका गंदा नीला बस्ता खुश हो गया, ‘‘ चलो, आज उसे भी नहाने-धोने और नया होने का अवसर मिलेगा।’’ इसलिए वह चिल्ला उठा, ‘‘ हीप्पहीप्प हुरर्रे !’’
यह सुन कर लाल बस्ता उसे बाय-बाय करने लगा। ‘ चलो ! संगत का असर तो हुआ।

 

प्रतिक्रिया दें

संपर्क में रहें

        

कृपया ध्यान दें