अंधा कौन

आज रेयांश देश का सबसे प्रसिद्ध पेंटर है। वह देश व विदेश में अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनियाँ लगाता है। उसकी एक-एक पेंटिंग एक-एक लाख रुपए की  बिक जाती है। वह अपना एक स्कूल भी चलाता है, जहाँ वह गरीब बच्चों व शौकिया कलाकारों को मुफ़्त सिखाता है। कोई खुश होकर यदि कुछ दे देता है, तो उसे गुरु दक्षिणा या प्रसाद समझकर ग्रहण भी कर लेता है। वह पैंतीस वर्ष का हो गया, शादी करने का समय नहीं मिला। उसके घर का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है। घर में काम करने के लिए कई नौकर है। वह या तो पेंटिंग करता रहता है, या दूसरों को पेंटिंग सिखाता है। इसके अलावा उसका कोई शौक नहीं है। कभी बोर भी हुआ तो टी.वी. पर न्यूज़ देख लेता है।

कहने को तो वह अकेला है, लेकिन वह हर समय लोगों से घिरा रहता है। मोहल्ले के कुत्ते तक उसके खाने का इंतज़ार करते हैं , क्योंकि हर एक कुत्ते को भरोसा है कि उसे कुछ न कुछ अवश्य मिलेगा।

एक दिन वह पेंटिंग कर रहा था,  साथ में टी.वी. भी खुला था। वह अपने पेंटिंग में इतना मग्न था कि उसे न्यूज़ सुनाई ही नहीं दे रही थी। तभी मोहल्ले के पड़ोसी युवा ने ज़ोर से चिल्लाया, सुनो, सुनो, भैया को कोई इनाम मिला है। कुछ ही क्षणों में उसकी तंद्रा टूटी, और कहा, “मज़ाक मत कर, दस मिनट में पेंटिंग ख़तम हो जाएगी, उसके बाद में न्यूज़ देख लूँगा। पड़ोसी युवक उसे हाथ पकड़कर टी.वी. के पास  ले गया और उसे अगले बुलेटिन आने तक उसे वहीँ ठहरने के लिए बाध्य किया। न्यूज़ में बरेली के मशहूर पेंटर श्री रेयांश चौधरी को उनकी पेंटिंग के लिए ‘पिकासों पेंटिंग अवार्ड 2016’ मिला है। अगली 26 जनवरी को यह इनाम उनको नई दिल्ली के विज्ञान भवन में दिया जाएगा।

पड़ोसी युवा रेयांश को यह न्यूज़ सुनवाकर तेजी से बाहर भागा और यह ख़बर आग की तरह मोहल्ले में फैला आया। लगभग सुबह करीब 3 बजे तक पार्टियाँ चलती रहीं। न्यूज़ सुन-सुन कर शहर के अन्य कलाकार भी बधाई देने आने लगे। पूरे देश से और कुछ विदेश से भी बधाई के फ़ोन आए।

रेयांश पीता नहीं है, लेकिन दोस्तों के साथ पी लेता है। मना करने के बाद भी थोड़ी ज़्यादा हो गई। उसको अधिक पीने के बाद नींद नहीं आती। सब लोगों के जाने के बाद वह अपनी अधूरी पेंटिंग पूरी करने में लग गया। उसके बाद यह सोचने लगा कि वह इस मुकाम पर पहुँचा कैसे। सोचते-सोचते वह बचपन में खो गया। पता नहीं क्यों उसे बचपन से ही पेंटिंग करने का शौक था। एक बार मामा घर आए थे, उसे कुछ रुपए दे गए थे। स्कूल से घर लौटते समय, रंग खरीद लिए। उसे जब भी छुट्टी मिलती, वह रंग भरता रहता। एक-आध बार माँ बाप ने देख लिया तो डाँट पड़ जाती। बाप मुझे  डाँटते, तो माँ को भी डाँटते। माँ से कहते तुम्हारे भाई ने इसे बिगाड़ दिया है। यह अफसरों का खानदान है, इन लक्षणों से यह क्या अफसर बन पाएगा, भूखों मरेगा। जींस की फटी पेंट पहनकर झोला लटकाए दोस्तों से पैसे माँगता फिरेग। एक दिन पिता जी ने मुझे पेंटिंग करते देख लिया। फ़िर क्या था, डाँट भी पड़ी और मार भी पड़ी। मेरे सारे रंग घर के पीछे नाली में फ़ेंक दिए गए। वह रात उसने रोते-रोते काटी। उसका स्कूल दोपहर का था और पिताजी और माताजी दोनों ही सर्विस करते थे और शाम को ही आया करते थे। दोपहर को स्कूल से लौटने के बाद वह पीछे गली से सब रंग उठा लाया। अब समस्या यह थी कि इनको रखा कहाँ जाए। बाल बुद्धि लगाई। उसके घर से तीसरे घर में एक मजिस्ट्रेट रहते थे। कुछ ही दिन पहले उनके बूढ़े पिता यहाँ आकर रहने लगे। शाम को खेलते-खेलते अक्सर  मेरी गेंद उनके गार्डन में चली जाती थी। गेंद लेने मुझे उनके गार्डन में जाना पड़ता था। इस तरह मेरी उनसे दोस्ती हो गई। कई दिनों बाद पता चला कि वे अंधे हैं। मैं उनको अपनी पेंट्स यह कहकर दे आया कि बाबा, मेरी पेंट्स आप रख लीजिए ज़रूरत पड़ने में मैं ले लिया करूँगा। बाबा ने मेरी निवेदन को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

अब मैं लगभग रोज़ ही स्कूल से आकर उनके घार से पेंट ले आता और कोई-न-कोई पेंटिंग बना कर उनको दे आता। एक दिन मैंने हिम्मत करके बाबा से कहा, “बाबा, बाबा, अगर आप मेरी पेंटिंग देख लेते तो कितना अच्छा होता। लेकिन आप तो अंधे…।” मैं शर्मिंदगी के कारण वाक्य पूरा न बोल सका।

बाबा ने कहा , “ अंधा हूँ तो क्या हुआ, जन्म से थोड़ी ही हूँ। कलर का ज्ञान है। तुम्हारी तरह मैं भी बचपन में पेंटिंग करता था और मार पड़ती थी। मैं समझ गया कि तेरे पिता भी तुझे पेंटिंग नहीं बनाने देते थे।  तू रोज़ दोपहर को अपनी पेंटिंग मुझे दिखा जाया कर। चाहे तो अपनी पेंटिंग यहीं रख दिया कर। बाबा ने रेयांश के सिर पर हाथ फेरा और आशीर्वाद देते हुए कहा कि एक दिन तू बहुत बड़ा आर्टिस्ट बनेगा। तब तेरी यह पेंटिंग भी प्रदर्शनी में दिखाया जाया करेंगी।”

एक वर्ष तक ऐसा ही चलता रहा। छुट्टी को छोड़कर हर रोज़ रेयांश बाबा को अपनी पेंटिंग दिखाता और एक-एक कर अपनी पेंटिंग के बारे में बताता। बाबा खुश होकर उसे शाबाशी देते। कभी-कभी कलर के बारे में रेयांश से ही पूछकर कुछ सुझाव भी दे देते। लगभग दो साल तक ऐसा ही चलता रहा। उस के बाद मुझे हॉस्टल भेज दिया गया। उस स्थान को छोड़ते समय रेयांश, बाबा के पास अपनी सभी पेंटिंग छोड़ गया।

जाते-जाते बाबा ने कहा, “बेटा, जब तू बहुत बड़ा पेंटर बन जाएगा, तब ये पेंटिंग ले जाना। देखना इनकी कितनी कद्र होती है, तब तक मैं इन्हें धरोहर के रूप में रखूँगा।”

मुझे विदा करते समय बाबा के आँखों से  आँसू टपक रहे थे। सिर पर हाथ रख कर खूब आशीर्वाद दे रहे थे।

रेयांश के मस्तिष्क में इतना सब कुछ चलचित्र की तरह घूम गया। दीवार घड़ी ने पाँच का घंटा बजाया। उसे अंदर से लगने लगा, यदि बाबा न होते तो मैं इतना बड़ा कलाकार न बन पाता। उनके पास केवल प्रेरणा, प्रेरणा, प्रेरणा ही थी, जबकि मेरे पिता के पास कला के प्रति तिरस्कार, तिरस्कार, तिरस्कार। रेयांश को लगा कि 26 जनवरी को वह अपने साथ बाबा को साथ ले जाएगा, यदि वे जीवित हुए। दूसरे दिन से वह अपनी बाबा को तलाश करना शुरू कर दिया।

कुछ ही दिनों में उसे इस पुरस्कार का औपचारिक निमंत्रण  मिल गया, “आप अपने साथ प्रेरणा-स्रोत अपने माता-पिता को अवश्य लाइए’। 26 जनवरी को समय से पूर्व वह बाबा को लेकर बैठ गया था। उसने पत्र द्वारा अपने माता-पिता को भी बुला लिया था। हॉल खचाखच भरा था। देश-विदेश के कई नामी-गिरामी पेंटर आए थे, बगल के कमरे में ही उसकी पेंटिंग लगी थीं।

कार्यक्रम समय से शुरू  हुआ। मंच पर भारत के सांस्कृतिक  मंत्री, सांस्कृतिक सचिव, रेयांश और एक अंधा आदमी बैठे थे। एक सीट खाली थी।

इनाम देने भारत के सांस्कृतिक मंत्री पधारे थे। औपचारिकताओं के बाद रेयांश का जीवन चरित्र पढ़ा गया। उसमें उसके  प्रेरणा–स्रोत का नाम श्री धनंजय प्रसाद का नाम बताया गया। उसे अपने माँ-बाप के नाम नहीं थे। बाद में सत्कारमूर्ति श्री रेयांश से सम्मानांतर व्याखान देने को कहा गया। अपने व्याख्यान में रेयांश ने अपने बचपन से लेकर इस समय तक की अपनी संघर्ष की कहानी सुनाई। उसके व्याख्यान में श्री धनंजय प्रसाद का नाम कई बार आया और उनके माँ-बाप का कहीं ज़िक्र नहीं था। बाद में पत्रकारों ने पूछा, “स्टेज पर आपके साथ यह बुज़ुर्ग कौन बैठे हैं। क्या यहीं श्री धनंजय प्रसाद है? क्या यहीं आपके प्रेरणा-स्रोत हैं ?”

“हाँ, ये ही  मेरे प्रेरणा स्रोत हैं।”

एक पत्रकार ने पूछा, ”इन्हें तो शायद दिखाई नहीं देता।”

रेयांश ने उत्तर दिया, “कलाकार को प्रेरणा देने के लिए आँखें ही नहीं, ह्रदय से प्रोत्साहन देने वाला चाहिए। इनको दिखाई भले ही न देता हो, लेकिन ये पेंटिंग की परख रखते हैं। ये ही  मेरी प्रथम और अंतिम गुरु हैं। मेरे माता-पिता के तो दो-दो आँखें थीं, लेकिन …।

इसके आगे रेयांश न बोल सका। उसने श्री धनंजय प्रसाद के चरण-स्पर्श किए, सब श्रोताओं ने खड़े होकर दो मिनट तक रेयांश और श्री धनंजय प्रसाद को स्टैंडिंग ओवेशन दिया। उस समय श्री धनंजय प्रसाद  रेयांश की बचपन की पेंटिंग लहलहा रहे थे और उनके माता-पिता के आँखों से आँसू झर -झर निकल रहे थे।

पूरे हॉल में एक ही यक्ष प्रश्न लहलहा रहा था — अंधा कौन?

 

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