पूत

शनीचरा! हाँ, यही नाम था उसका। सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उसका यह नाम इसलिए पड़ा होगा कि वह शनिवार को जन्मा होगा, लेकिन कोई माँ-बाप अपने बेटे का ऐसा नाम क्यों रखेगा? वास्तव में, यह नाम उसके माँ-बाप ने नहीं, गाँव के बुद्धिजीवियों ने रखा था। एक हिसाब से वह अनाथ ही पैदा हुआ था— जन्म के महीना भर पहले पिता तपेदिक से मरे थे और उसे जन्म देने के तुरन्त बाद माँ चल बसी थी।

शनिश्चर प्रसाद, उर्फ़ शनिश्चर, उर्फ़ शनीचरा अपने माँ-बाप की इकलौती सन्तान थी। गाँव में उसके बाप को बसे कोई आठ-दस साल हुए होंगे। नाम- बीरू, जाति- रैदास, उम्र- तीस से कुछ ऊपर, कद- लम्बा, रंग- काला, चेहरा- मूँछदार, पहनावा- कुर्ता-धोती, पेशा- मजदूरी। कहीं से भागकर आया था। पूछने पर कुछ भी बता देता। लोग अटकलें लगाते : चोरी-डकैती या क़त्ल करके भागा हुआ लगता है। कोई कहता कि इसे गाँव से भगाओ, नहीं तो एक दिन सारा गाँव पुलिस का कोप-भाजन होगा। कोई कहता कि पुलिस को ख़बर कर दो! लेकिन एक बुजुर्ग ने समझाया— पुलिस को ख़बर करने की क्या ज़रूरत है। जब अभी तक गाँव में पुलिस नहीं आयी, तो उसे एक ऐसे आदमी के लिए क्यों न्योतते हो, जो किसी का कुछ बिगाड़ नहीं रहा। काम ही तो माँग रहा है और रहने के लिए खटिया भर की जगह! दे दो बेचारे को तालाब के किनारे थोड़ी-सी जगह। नहीं होगा, तो गाँव की रखवाली ही करेगा ! देखो, कैसे तन्मय हो कबीर के निर्गुन गाता है ! ऐसा आदमी चोर-डकैत हो सकता है भला? फिर भी कुछ दिन नज़र रखो, फिर तय करना कि गाँव में रखना है कि नहीं!

थोड़े-ही दिनों में बीरू ने अपने आचरण से गाँव का दिल जीत लिया। गाँव वालों की शंकाएँ काफूर हो गयीं। वह तालाब के किनारे एक झोंपड़ी डालने का अधिकारी हो गया। जल्द-ही चुनाव होने वाले थे, सो वोटर लिस्ट में उसका नाम आ गया। राशन कार्ड का मालिक भी हो गया।

कोई साल बीता होगा कि वह एक पच्चीस-छब्बीस वर्षीया स्त्री को पत्नी बनाकर ले आया। गाँव वालों को यह ठीक न लगा। कुछ ने दबी जुबान से आलोचना भी की, पर विगत में उसने जो विश्वसनीयता अर्जित की थी, वह परिस्थिति को सँभालने के लिए पर्याप्त थी। गाँव की औरतों ने हल्की-फुल्की भुनभुनाहट की, पर बाद में उन्हीं के समर्थन के साथ मामला रफ़ा-दफ़ा हो गया।

कुछ समय बीता। बीरू की पत्नी भी काम करने लगी। पहले आस-पास के घरों में, फिर पति के साथ खेतों में। सम्पत्ति के नाम पर उनके पास एक झोपड़ी, एक चारपाई, दो कथरियाँ, एक रजाई, दो फटी चादरें, दो-तीन टाट के बोरों से बने बिछावन, एक बाल्टी-लोटा और बहुत ज़रूरी अल्यूमीनियम के बर्तन।

पिछली चकबन्दी में उम्मीद थी कि गाँव सभा द्वारा भूमिहीनों को जब पट्टे दिये जायेगे, तो उसे भी कुछ ज़मीन मिल जायेगी, पर ऐसा हो नहीं पाया। वह प्रधानजी के लड़के को नहीं पटा पाया— एक बोतल अँग्रेजी दारू, मुर्गा वगैरह के लिए ढाई सौ रुपये नहीं जुटा पाया। परिणामतः वह भूमिहीन-का-भूमिहीन रहा। ज़मीन प्रधान जी के नौकरों के नाम चढ़ गयी। मौके पर वह ज़रूर प्रधानजी के क़ब्ज़े में रही। लेखपाल और ए.सी.ओ. प्रधानजी की ‘सिधाई’ और विनम्रता के क़ायल थे ही, चकबन्दी प्रक्रिया के दौरान उनकी ख़ातिरदारी के ग़ुलाम भी हो गये।

भारतीय संविधान में ‘आदर्श नागरिक के कर्त्तव्य’ नामक अध्याय जुड़ने से, और चाहे कुछ हुआ हो या नहीं, पर बीरू जैसे लोगों की बदौलत नागरिकों के कर्त्तव्यों का पालन अवश्य होने लगा, भले ही उन्हें एक भी मौलिक अधिकार न मिला हो। वैसे भी अधिकार और कर्त्तव्य एक ही व्यक्ति या वर्ग से जुड़े रहें, यह भारतीय लोकतंत्र को शोभा नहीं देता। अधिकार के लिए प्रधानजी और कर्त्तव्य के लिए बीरू जैसे लोगों का होना अनिवार्य है। सभी विपक्षी राजनैतिक पार्टियाँ गवाह हैं कि देश को आज़ादी मिलने से लेकर अब तक ‘इंडिया, दैट इज भारत’ में साधन-सम्पन्न अमीर अपने अधिकारों का शिकार करने में व्यस्त रहे हैं, जबकि अनपढ़ और ग़रीब कर्त्तव्यनिष्ठा का शिकार होते रहे हैं। शायद यही हमारी परम्परा है और यही हमारी अस्मिता की पहचान!

ऐसे ही प्रत्याभूत समीकरण का पालन करते हुए बीरू और उसकी पत्नी दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करते और रूखा-सूखा खाकर बेहोशी की सीमा तक रात-भर सोते। तीज-त्यौहारों पर ही उन्हें पकवानों के दर्शन होते। पहनने के नाम पर दोनों के दो जोड़ी कपड़े थे। धराऊ (कहीं आने-जाने के लिए आरक्षित) कपड़ों की साध मन में दबी-की-दबी रह गयी। पति बनियाइन और जाँघिया में ही अधिकतर रहता। जब बनियाइन फट जाती और जब तक नयी नहीं आ जाती, तब तक वह ख़ाली जाँघिया से काम चला लेता। पत्नी अवश्य धोती-ब्लाउज में रहती, लेकिन अधोवस्त्र किसे कहते हैं? उन्हें पहनकर वह कभी नहीं जान पायी।

बिना मक़सद के दोनों की जिन्दगियाँ घिसट रही थीं। सामाजिक-सांस्कृतिक उतार-चढ़ाव भी उनकी दिनचर्या में कोई बाधा नहीं डाल पाते थे। न कोई दोस्त-रिश्तेदार; न कोई आनेवाला, न जानेवाला ! सोचते थे, एक सन्तान ही हो जाए कि सूखे जीवन में कुछ रस आ जाए, परन्तु सब कुछ आदमी के हाथ में तो नहीं होता! थोड़ी-बहुत वैद-हक़ीम की दवा की, पर व्यर्थ! अंग्रेजी डॉक्टरनी को भी दिखाया, लेकिन उसने दवा देने के बजाए तमाम टेस्ट बता दिये। उन सब के लिए पैसे कहाँ से आते? क़िस्मत के सहारे मामले को छोड़ दिया गया।

जिस प्रकार शिकारी के मन में कभी-कभी दया आ जाती है, उसी प्रकार नीली छतरी वाले का भी दिल पसीज गया।…. बीरू बाप बनने वाला था। जिन्दगी के बंजर में हरे-भरे उपवन की कल्पना से वह मगन हो उठा।… लेकिन उसकी यह खुशी अधिक दिनों तक नहीं टिक सकी। ग़रीबी का बीमारी से पुराना नाता है। पहले बुखार ने दस्तक दी। फिर खाँसी ने धर दबोचा। खाँसते-खाँसते उसका बुरा हाल हो जाता। गले की नसें बाहर निकल आतीं। काला चेहरा कत्थई हो जाता।…एक दिन तो ख़ून भी निकला।

दिन-ब-दिन वह कमज़ोर होता जा रहा था। खेती का काम सधता न था, लेकिन गाँव में खेतिहर मजदूरी ही उसकी आजीविका थी। काम किये बिना गुजारा न था। शारीरिक अवस्था ऐसी हो गयी कि एक दिन काम करता, तो दो दिन आराम! नज़दीक की पी.एच.सी. में दिखाया। डाक्टर ने बताया कि उसे टी. बी. हो गयी है। नियमित इलाज, संतुलित भोजन और पूरी तरह से आराम ज़रूरी है। चार-पाँच दिन खटिया पर पड़े-पड़े इलाज चला, मगर जिसके घर खाने को न हो, वह इस तरह से कितने दिन इलाज करा सकता है? कुछ आराम मिला, तो काम पर निकल पड़ा। जब दम न बचता, तो आराम करने लगता और तनिक दम आते ही फिर काम पर!…

इस प्रकार, कुछ दिन तो इलाज चला, लेकिन पैसों के बिना कैसा इलाज और कैसा आराम? भाग्य पर आश्रित जीवन भला कब तक चलता? आखिर वह काला दिन आ पहुँचा जब टी. बी. ने उसे संसार से मुक्ति दिला दी। अन्तिम संस्कार के नाम पर उसे तालाब के किनारे गाड़ दिया गया।

पत्नी अकेली रह गयी। सात माह की गर्भवती स्त्री और वह भी अकेली। काम न करे तो खाने के लाले, मगर काम करने की न तो हालत थी और न ही ताब! दूसरों के टुकड़ों पर पलते-पलते किसी तरह शनीचरा को जन्म देकर परलोक सिधार गयी।

गाँव की दो-तीन स्त्रियों ने तब शनीचरा को सहारा दिया था। दूध-शरबत, दाल का पानी पिला-पिलाकर उन्होंने उसकी आँखों की चमक को बरकरार रखा था। हालांकि ऐसा करने में उन्हें अपनी पतियों और गाँव के वर्ण-रक्षकों के ताने भी सुनने पड़ते थे, लेकिन तब भी उन्होंने मानवता की रक्षा की।

शिशु शनीचरा का दिन तो किसी तरह कट जाता, पर रात रोते-रोते ही कटती थी। कभी अपने झोंपड़े में किसी स्त्री की देख-रेख में होता, तो कभी किसी के घर में ! माँ की गोद तो उसे नहीं नसीब हुई, लेकिन वह बिल्कुल अनाथ भी न था। ‘जिसका कोई नहीं होता, उसका तो खुदा होता है!’ यह उक्ति चरितार्थ हो गयी थी। ख़ुदा के बन्दों ने शनीचरा की ज़िन्दगी बचा ली।…

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जीवन भी क्या रंग दिखाता है- कभी धुँधला, कभी चटख! जन्म लेते ही समय की मार खाने वाला शनीचरा धीरे-धीरे घुटनों के बल चला, फिर खड़े-खड़े! और जूठन खाते-खाते आज वह बीस साल का गबरू जवान हो गया। उसकी झोंपड़ी खण्डहर हो चुकी थी। गाँववाले कहते- ‘‘माँ-बाप की निशानी है, इसे तो सँभाल!’’

वह मस्तमौला था, कहता- ‘‘उसकी माँ तो गाँव की एक-एक स्त्री है, एक-एक घर उसका घर है, फिर वह क्यों रहे इस खण्डहर में?’’ उत्तर सुनकर लोग मुस्कुरा देते।

गाँव की जिन तीन-चार स्त्रियों ने शनीचरा को पाल-पोस कर बड़ा किया था, उनमें से सजीवन की माँ प्रमुख थी।

सजीवन अपने माँ-बाप का इकलौता बेटा था— दुलारा और नकचढ़ा। अवस्था में वह शनीचरा से क़रीब दो साल छोटा था, पर उस पर हुक्म चलाता, गालियाँ देता और खानदान का रौब झाड़ता। शनीचरा उसके व्यवहार को नज़रअन्दाज़ कर उसे सगे भाई की तरह मानता था।

इकलौता पूत होने के कारण सजीवन को हरसम्भव सुख-सुविधा उपलब्ध थी। घर में औसत खेती-बाड़ी थी। माँ-बाप ने उसे पढ़ाने में कोई कसर न उठा रखी थी, पर सजीवन को जैसे सरस्वती से बैर ही निभाना था। पड़ोस के गाँव में आठवीं तक का स्कूल था। वह स्कूल जाता तो, पर वहाँ से भाग निकलता ! हाँ, स्कूल जाने के बदले माँ से पाँच-दस रुपये रोज़ ही झटक लेता। माँ अगर ना-नुकुर करती, तो अगले दिन चुरा लेता।

किसी तरह वह आठवीं पास हुआ— वह भी तब, जब घर वालों ने प्रिसिंपल के ख़ूब हाथ-पाँव जोड़े। वह आगे नहीं पढ़ना चाहता था, लेकिन माँ-बाप उसे तब तक स्कूल भेजना चाहते थे, जब तक उसका विवाह न हो जाए !

न चाहते हुए उसे पड़ोस के कस्बे में स्थित इण्टर कालेज में नाइन्थ में एडमीशन लेना पड़ा। एडमीशन होने में कोई दिक्कत नहीं आयी, क्योंकि कालेज उसी साल खुला था और उसे छात्रों की आवश्यकता थी। जुलाई के पहले हफ़्ते में ही एडमीशन हो गया था, लेकिन पढ़ाई शुरू होने का सवाल ही न था। अभी टीचरों की भर्ती चल रही थी। क्लास-रूमों में प्लास्टर हो रहा था।….ऐसे में कालेज जाना, न जाना एक बराबर था, फिर भी सजीवन ने कालेज जाना ज़ारी रखा। एडमीशन के हफ्ते-भर में ही उसके दो पक्के दोस्त बन गये थे— एक क़स्बे का रहने वाला था और एक गाँव का। क़स्बे वाले के पिता की परचून की दुकान थी। वह भी अपने घर का इकलौता चिराग़ था। नतीज़तन, उसे पैसे-रुपये की किल्लत न थी। जब चाहता, दस-बीस रुपये गल्ले से निकाल लेता ! गाँव वाला दोस्त सजीवन की तरह अपनी माँ की आँख का पुतला था, उसके पिता पहले ही अपने सपूत के कारनामे देखने के लिए जीवित न थे।

कालेज से कोई दो सौ क़दम चलते ही बाज़ार शुरू हो जाता था।…. दोस्तों के साथ क़स्बा घूमना, चाट खाना, सिनेमा का नून शो देखना— पढ़ाई के नाम पर सजीवन का यही शगल था। धीरे-धीरे यही उसकी दिनचर्या हो गयी।… एक दिन उसे जुआ खेलने का भी मौक़ा मिल गया। उसमें वह जीत भी गया। दस रुपये की चाल थी। बीस रुपये हाथ में आते ही उसे अनिर्वचनीय सुखानुभूति हुई। शीघ्र-ही उसे एक और दोस्त मिल गया। इस नये दोस्त की बदौलत उसे एक दिन व्हिस्की का भी स्वाद मिला। दो पेग चढ़ाने के बाद सजीवन को लगने लगा कि अब वह जिस दुनिया में है, उससे अब तक अपरिचित क्यों रहा? फिर तो, आये दिन वह स्वर्गिक आनन्द में विचरण करने लगा।

कालेज से शिकायत आने का प्रश्न ही नहीं था। यह आम बात थी कि कोई भी विद्यार्थी स्वेच्छा से या घरेलू विवशता के चलते से कालेज से किनारा कर सकता था। छः महीने की फीस पहले ही वसूल ली गयी थी। पढ़ाई से जी चुराने वाले लड़कों पर उनके माँ-बाप भी वक्त और पैसा बरबाद करके बेवकूफी नहीं करते थे। शिक्षकों को भी स्कूल आने-जाने से मतलब था। उनके अनुसार, शिक्षा तो भाग्य से मिलती है, शिक्षक और अभिभावक तो बहाना-भर हैं।

जब पानी सिर से उपर हो गया, तो सजीवन की पढ़ाई छुड़ा दी गयी। इससे उसे राहत तो मिली, लेकिन क़स्बे में घूमने-फिरने का जो मज़ा था, वह छिन गया। मुँह में शराब-सिगरेट का जो चस्का लग चुका था, उसकी पूर्ति कैसे हो? अब यही विकट प्रश्न सामने था।

गाँवों में बाल-मजदूरी की प्रथा को बुरा नहीं माना जाता, क्योंकि यह वह ट्रेनिंग है, जिसे पाकर देहाती नौजवान ‘कामगार’ बनकर खेती-मजदूरी का महत्त्वपूर्ण दायित्व सँभालते हैं, ताकि पढ़े-लिखे बेरोजगार नवयुवक सोना उगलने वाली अपनी धरती पर गर्व कर सकें; व्यवस्था के प्रशासनिक चंट वैश्विक फलक पर आँकड़ेबाजी कर आयात-निर्यात के चार्ट सजा सकें और खुर्राट टोपीधारी सटीक भाषण कर सकें।

पढ़ाई छूटने के बाद चिरंजीव सजीवन न तो खेती-लायक़ ‘कामगार’ बन सके और न ही कृषि-उत्पादन पर गर्व करने योग्य नवयुवक ! वे चौर्य-संस्कृति के पालनहार बन गये। जिस प्रकार कन्धे पर जुआ धरे दो बैलों में आपसी सहमति होती है, वैसे ही सजीवन और उसके दोस्तों में किंचित मतभेद न था। सहयोग की उबाल खाती भावना के कारण वे अपने गाँव से पाँच गाँव बाहर निकल सहकारिता के आधार पर हल्की-फुल्की लूट-पाट करने लगे और अँधेरी रातों में बाप-दादों का नाम रौशन करने लगे।

जब शनीचरा को पता चला कि सजीवन कुसंगति का शिकार हो गया है, तो उसने माता यशोदा से उऋण होने की सोची। अनाथ बच्चों की तरह वह भी अपनी उम्र से अधिक अनुभवी, प्रौढ़ और जिम्मेदार था।

एक दिन वह गाँव से बाहर एक पेड़ से टिका यही सोच रहा था कि सजीवन को कैसे सही रास्ते पर लाया जाए! उसे समझाये, उसके दोस्तों से बात करे या उसके पिता से? अभी वह कुछ तय नहीं कर पाया था कि अचानक गाँव के प्रधान का पोता- मन्नू दिखायी पड़ा। यह सजीवन का वह दोस्त था, जो सभी बुराइयों की जड़ में था। वह शनीचरा की तरफ़ ही आ रहा था। शनीचरा ने उसे पास बुलाया, समझाया और धमकाया; पर जब इन बातों का उस पर कोई असर न पड़ा, तो वह उसकी छाती पर चढ़ बैठा और उसका गला दबाने लगा।…. क्रोध के मारे वह भूल बैठा कि इसका परिणाम क्या होगा? ‘घों-घों’ की आवाज़ें आने लगीं।… संयोग से उसी समय सजीवन आ गया। उसे देखते ही शनीचरा ने मन्नू का गला छोड़ दिया और उस पर पिल पड़ा। ख़ासी मार खाकर वह किसी तरह भागा। मन्नू भी खाँसते-खाँसते घर पहुँचा।

सजीवन ने अपनी जानकारी में पहली बार जमकर मार खायी थी— वह भी नौकर-सरीखे शनीचरा से ! यह बात उसे किसी तरह हजम नहीं हो रही थी। वह बदला लेने की फ़िराक़ में था। माँ-बाप से शिकायत करने पर शनीचरा के विरुद्ध कार्रवाई की कोई गुंज़ाइश न थी। इसलिए मन्नू और उसके साथियों की मदद से वह शनीचरा को सबक सिखाने की योजना बनाने लगा।

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दीपावली की संध्या। आठ बज रहे थे। सजीवन और मन्नू को छोड़ सारा गाँव दीवाली मना रहा था। ये दोनों गाँव से बाहर दूर एक बाग़ में अपने ढंग से दीवाली मना रहे थे। कलियाँ (बहुत छोटी मछलियाँ) खाते हुए, दारू पीते हुए ताश के पत्तों के सहारे जुआ खेलने का कार्यक्रम सम्पन्न होने को था। अभी कलियाँ भूनी जा रही थीं।…

सजीवन की माँ परेशान थी— त्यौहार वाले दिन लड़का पता नहीं कहाँ घूम रहा है? उसने शनीचरा से सजीवन का पता लगाने को कहा। शनीचरा ने संभावित अड्ड़ों को छान मारा, पर सजीवन का कहीं पता न चला। निराश होकर वह घर लौटने वाला ही था कि दूर बाग़ में कुछ हलचल दिखायी दी। वह जल्दी-से उधर लपका।

कुछ अनचीन्हे लड़के भी सजीवन के कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए आये थे। पहले तो सजीवन और मन्नू ने उनकी उपस्थिति पर आपत्ति की, पर बाद में अपने ही ‘धरम-वाले’ मानकर उन्हें शामिल कर लिया।

शनिचरा जब बाग़ में पहुँचा, तो वहाँ का नज़ारा देख उसके होश ही उड़ गये। एक तगड़ा-सा लड़का सजीवन की छाती पर सवार था। दो लड़के पास खड़े थे। वे कह रहे थे कि उनकी घड़ी, साइकिल और रुपये वापस कर दो, वर्ना…!

सजीवन सफाई दे रहा था कि उसने सब सामान मन्नू को दे दिया है, उसके पास कुछ नहीं है। लेकिन वे कुछ भी सुनने को तैयार न थे।… शनीचरा को पास आता देख उनका हौसला कुछ ढीला पड़ा।

मन्नू और उसके साथी, जो पास के पेड़ की ओट में छिपे थे, दौड़कर आ गये। शनीचरा के डाँटने पर उन लोगों ने सजीवन को तो छोड़ दिया, लेकिन शनीचरा पर पिल पड़े। ये तीन थे, शनीचरा अकेला। कुछ देर तक वह लड़ा, पर अन्ततः धराशायी हो गया। एक ने चाकू निकाल लिया था। उसने उससे कई वार किये।… शनीचरा का पेट फट गया। रक्त का फौव्वारा छूटा। अंतड़ियाँ निकल आयीं।… वह बेहोश हो गया।

क्षण भर को सजीवन भी अचेत हो गया। जब चेतना लौटी, तो भी उसकी समझ में न आया कि क्या करे? हतप्रभ वहीं खड़ा रहा। मन्नू गाँव वालों को बुलाने दौड़ पड़ा।

शनीचरा की हालत गंभीर थी। ट्रैक्टर से उसे जिला अस्पताल लाया गया। डॉक्टर ने ‘मेडिको लीगल’ केस कहकर हाथ लगाने से इंकार कर दिया। पुलिस में एफ.आई.आर. होते-होते रात के दो बज गये। किसी तरह इलाज शुरू हुआ। नर्स ने जब इंजेक्शन लगाया, तो शनीचरा अंतिम साँसें ले रहा था।

शनीचरा को जब भी होश आता, वह सजीवन की ओर देखता। जैसे कह रहा हो, “भाई! अब ऐसे लोगों से दूर रहना।… तुम वचन दो तो मैं जाऊँ!”

सभी लोग शनीचरा को घेरे खड़े थे। सजीवन की माँ ने जैसे ही उसके सिर पर हाथ रखा, वह अपने माँ-बाप से मिलने चल पड़ा।

 राजेन्द्र वर्मा

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  • मैंने पूत कहानी को पढ़ा।मैं कहानी में खो गया।इसमें शनिचरा नामक पात्र ने बहुत प्रभावित किया और राजेन्द्र जी की लेखनी ने भी।बहुत ही लाज़वाब रचना है।

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