इंसान हूँ, इंसान ही रहना चाहता हूँ

इंसान हूँ मैं इंसान ही रहना चाहता हूँ।
कई आदर्श है इस जीवन के,
फिर भी नहीं चाहता भगवान बनना।।
इंसान हूँ मैं इंसान ही रहना चाहता हूँ।
सब जन को है चाह देव बन पूजे जावें।
पर इंसानों की खामियां कैसे कोई छिपावें।।
लोगों की इन खामियों पर कुछ कहना चाहता हूँ।
इंसान हूँ मैं इंसान ही रहना चाहता हूँ।
कई ऐब है मुझमें भी होगी कई खामियां भी।
छोडू मिटाऊँ कितनी ही रहेगी कुछ तो फिर भी।।
इन ऐब खामियों को ही पहचान बनाना चाहता हूँ।
इंसान हूँ मैं इंसान ही रहना चाहता हूँ।
कई दर्द है जीवन के सहना तो जीवन भर है।
जीवन की जोत बुझेगी ही जीना आखिर तो है।।
फिर भी इसी जीवन-नद में बहना चाहता हूँ।
इंसान हूँ मैं इन्सान ही रहना चाहता हूँ।
जीवन पार होता है गर कहीं ऊपर स्वर्ग भी।
नहीं चाहिये स्वर्ग वो होता है गर कहीं मोक्ष भी।।
सदके इसी मृत्यु लोक के मैं रहना चाहता हूँ।
इंसान हूँ मैं इंसान ही रहना चाहता हूँ।।

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