हिंदी के प्रसिद्ध व महान कवि-कवयित्री और उनका जीवन परिचय

हिंदी भाषा के साहित्य में अनेक कवि-कवयित्रियों ने अपना योगदान दिया। है। जब साहित्य प्रेमी सर्वश्रेष्ठ श्रेणी का साहित्य पढ़ना चाहते हैं तो मन में सबसे पहले एक ही प्रश्न आता है – हिंदी के सर्वश्रेष्ठ और प्रसिद्द कवि-कवयित्रियाँ कौन – कौन हैं। तो दोस्तो, इस लेख में हम आपको हिंदी के चुनिन्दा और महान कवियों का संक्षिप्त जीवन परिचय और उनके द्वारा लिखी गयी रचनाओं के बारे में बताएँगे। हिंदी के मुख्य और शीर्षस्थ कवि – कवयित्री ये हैं –

कवि – मैथिलीशरण गुप्त

मैथिलीशरण गुप्त (सन् 1866 – 1964) का जन्म उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले में चिरगाँव नामक स्थान पर हुआ। शिक्षा-दीक्षा गांव की पाठशाला एवं झाँसी के मैकडोनल प्रथम हाई स्कूल में हुई। उन्हें भारत सरकार ने राष्ट्रकवि के रूप में विभूषित भी किया। गुप्त जी द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि थे। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से प्रेरणा ग्रहण कर सन् 1905 से काव्य रचना प्रारंभ की जो छह दशक तक जारी रही। गुप्त जी ने भारत की दुर्दशा, राष्ट्रोत्थान, नारी-जागरण साम्प्रदायिक विद्वेष का उम्मूलन, हिंसा, धार्मिक अन्धविश्वास, प्रकृति-प्रेम आदि विषयों पर रचनाएँ लिखी। उनके साहित्य में भारतीय संस्कृति को आधुनिक भावबोध प्रदान कर उसे पुनर्रचित करने का ऐतिहासिक कार्य किया गया। साकेत, यशोधरा और विष्णुप्रिया द्वारा भी साहित्य की उपेक्षिता नारियों को महत्त्व देकर साहित्यिक असन्तुलन को दूर करने तथा नारी को ऐतिहासिक गरिमा प्रदान करने का उल्लेखनीय सृजन-कर्म किया। गुप्त जी ने अनेक प्रबंध काव्य रचकर आधुनिक युग में प्रबंध परंपरा का पल्लवन किया। गुप्त जी चरित्र-चित्रण में बहुत कुशल थे।

वे पात्रों में आधुनिक युग के अनुरूप मनोभावों की रचना करते हैं। गुप्त जी ने खड़ीबोली के खड़े अनगढ़पन को मुलायम करने की कोशिश की तथा उसकी छायावादी पृष्ठभूमि बनाई। उनके काव्य में रीतिकालीन चमत्कार के कुछ अवशेषों तथा आधुनिक युग की स्वच्छन्द मनोभूमि और भाषा प्रयोगों का सहज मिलन है।

मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएँ

गुप्त जी के रंग में भंग (1909), भारत-भारती (1912), ज़यद्रथ-वघ (1910), पंचवटी (1925), साकेत (1931), झंकार (1929), यशोघरा (1932), द्वापर (1936), कुणालगीत, सिद्धराज, नहुष, जय भारत (1952), विष्णु प्रिया (1957) आदि काव्य-ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं।

कवि – रामधारी सिंह दिनकर

मैथिलीशरण गुप्त के बाद राष्ट्रकवि के रूप में विभूषित रामधारी सिंह दिनकर (सन् 1908 – 1974) राष्ट्रीय धारा के कवियों में सर्वोपरि हैं। दिनकर बिहार के मुंगेर जिले में सिमरियाधाट नामक स्थान पर जन्मे, गाँव के स्कूल से पटना विश्वविद्यालय तक पढ़े और छात्र-जीवन से ही राष्ट्रीयता की रचनाएँ लिखने लगे। उन्होने छायावाद के बाद के हिंदी काव्य को गति दी तथा राजनैतिक-सामाजिक यथार्थ से लेकर प्रेम की छायावादी वायवीयता तक की उत्कृष्ट रचनाएँ सर्जित की। उनकी कविता का मूल स्वर सौंदर्य, प्रेम, राष्ट्रीयता और विशेष रूप से भारत के अतीत का गौरवगान रहा है। हिंदी की खड़ीबोली कविता को सहज ओज प्रदान करने में दिनकर की विशेष भूमिका रही है। दिनकर ने कविता को राष्ट्रीय दर्प तथा शोषित-पीड़ित मानवता के पक्ष में खड़ा किया है इसीलिए दिनकर को प्रगतिवादी कवि भी माना गया। वे अपने समय की ज्वलन्त समस्याओं पर कविता लिखते थे इसलिए उन्हें युगचारण भी कहा गया। दिनकर ने स्वतंत्रता से पूर्व रेणुका, हुंकार आदि कविताओं के जरिए भारतीय जन-मानस को स्वतन्त्रता के प्रति प्रेरित किया, द्वितीय विश्वयुद्ध से उपजी विभीषिका से संवेदित होकर कुरुक्षेत्र जैसे युद्ध-काव्य का सृजन किया तथा प्रेम की प्रौढ़ता और उदात्तता को लेकर उर्वशी जैसे प्रेम महाकाव्य का प्रयणन किया। इस प्रकार दिनकर ने कभी समय के साथ चलकर तो कभी समय को अपने साथ चलाकर हिंदी कविता के स्वर को ओजस्वी संस्कार दिया। दिनकर ने काव्य के आलावा संस्कृति, इतिहास, धर्म, दर्शन एवं साहित्यशास्त्र के क्षेत्र में भी उत्कृष्ट गद्य का सृजन किया।

रामधारी सिंह दिनकर की रचनाएँ

दिनकर की काव्य कृतियों में रेणुका (1935), हुंकार (1940), रसवंती (1940), सामधेनी (1947), कुरुक्षेत्र (1948), रश्मिरथी (1952), नील कुसुम (1955), उर्वशी (1961), द्वंद्वगीत, इतिहास के आँसू, सीपी और शंख, नीम के पत्ते, मृतिका तिलक, हारे को हरिनाम, कोयला और कवित्व, नए सुभाषित, आत्मा की आँखें, बापू, दिल्ली, प्रणभंग, धूप और धुआँ, चक्रवात तथा परशुराम की प्रतीक्षा आदि प्रमुख हैं। इनमें प्रणभंग तथा रश्मिरथी खंडकाव्य हैं, और कुरुक्षेत्र तथा उर्वशी महाकाव्य हैं। द्वंद्वगीत रूबाइयों का संग्रह है एवं परशुराम की प्रतीक्षा चीन आक्रमण (1962) के समय लिखी गई ओजस्वी रचना है। नील कुसुम में वे नई कविता की बानगी प्रस्तुत करते हैं तथा ‘हरि को हरिनाम’ में भक्ति की ओर उन्मुख होते हैं।

कवि – जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद (सन् 1889 – 1936) छायावाद के प्रवर्तक कवि एवं बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न नाटककार, कहानी एवं उपन्यासकार तथा निबंधकार के रूप में विख्यात हैं। प्रसाद 20वीं शती के विश्व के उत्कृष्ट रचनाकारों में से हैं। प्रसाद का जन्म वाराणसी में तम्बाकू के व्यापारी के घर हुआ और बनारस में ही शिक्षा प्राप्त कर साहित्य-लेखन के साथ-साथ पैतृक कार्य भी करते रहे। प्रसाद ने प्रारंभ तो ब्रजभाषा में लिखने से किया किन्तु शीघ्र ही वे खड़ीबोली में काव्य लिखने लगे। उन्होंने द्विवेदी युग की इतिवृत्तात्मकता से विद्रोह करके विषय एवं अभिव्यक्ति में स्वच्छंदता अपनाई तथा काव्य को छायावादी सूक्ष्मता एवं सौंदर्य प्रदान किया। फलस्वरूप हिंदी में छायावाद जैसी क्रांतिकारी कविता का पदार्पण हुआ। प्रसाद ने प्रबंध एवं मुक्तक काव्य लिखे, तुकान्त के साथ-साथ अतुकान्त रचनाएँ भी की। कामायनी प्रसाद की श्रेष्ठ रचना है जो हिंदी में रामचरित मानस के बाद उत्कृष्ट कृति के रूप से विख्यात है। आत्म-अभिव्यक्ति, प्रेम एवं प्रकृति का उदात्त सौन्दर्यमय चित्रण, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय चेतना, भारतीय अतीत की समकालीन पुनर्रचना, करुणामय दुखवाद, समरसता तथा काव्य-प्रस्तुति में प्रतीकात्मकता, लाक्षणिकता और सूक्ष्मता इनकी काव्यात्मक विशेषताएँ हैं।

जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ

चित्राधार (1917), कानन कुसुम (1913), प्रेमपथिक (1913), करुणालय (गीतिनाट्य, 1913), महाराणा का महत्त्व (1914), झरना (1918), आँसू (1925), लहर (1933), कामायनी (1935) । इन काव्य-रचनाओं के अलावा प्रसाद जी ने स्कन्दगुप्त, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी आदि 14 नाटक लिखे। कंकाल, तितली, इरावती (अधूरा) उपन्यास लिखे। पाँच कहानी संग्रह एवं एक निबन्ध संग्रह का भी प्रणयन किया।

कवि – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध (सन् 1865 – 1947) दिवेदी युग के महत्त्वपूर्ण कवि और खड़ीबोली के पहले महाकाव्य प्रिय-प्रवास की रचना करने वाले खड़ीबोली के प्रथम महाकाव्यकार हैं। उअन्के जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ जिले के निजामाबाद में हुआ। शिक्षा-दीक्षा तहसीली स्कूल में और बनारस के क्वींस कॉलेज में हुई। अस्वस्थता के कारण कॉलेज बीच में ही छोड़ना पड़ा और घर पर स्वाध्याय किया। मिडिल स्कूल के अध्यापक रहे, फिर कानूनगो के पद पर ऐसे रहे जैसे कीचड़ में कमल। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अवैतनिक हिंदी अध्यापन किया।

उन्होंने प्रारंभ में ब्रज भाषा में काव्य रचना की, फिर खड़ीबोली में। खड़ीबोली के भी तीन रुप अपनाए – तत्सम शब्द प्रधान हिंदी, सरल साहित्यिक हिंदी तथा उर्दू से प्रभावित हिंदी। सभी रचनाओं में इतिवृत्त को प्रस्तुत करने का आग्रह किया । प्रबन्ध एवं मुक्तक दोनों ही तरह की रचनाएँ की। हरिऔध जी के अनुसार सार्थक साहित्य में जातीय भावों का उद्गार हो। जिन साहित्य ग्रंथों को पढ़कर जीवनशक्ति जागृत नहीं होती, निर्जीव धमनियों में गरम रक्त का संचार नहीं होता, हृदय में देश-प्रेम की तरंगें तरंगित नहीं होती वे केवल निस्सार वाक्यसमूह हैं। जिसमें मनुष्य की जीवंत सत्ता नहीं, जो प्रकृति के पुण्य-पाठ की पीठ नहीं, जिसमें चारु-चरित चित्रित नहीं, मानवता का मधुर राग नहीं, सजीवता का सुन्दर स्वांग नहीं, वह कविता सलिलरहित सरिता है। हरिऔध जी का सारा साहित्य उक्त उद्देश्य की पूर्ति का लेखन है। कृष्ण और राधा के पौराणिक चरित्रों के अंकनों में भी ईश्वरी भक्ति के अलावा देश-प्रेम एवं संस्कृति का स्वर अघिक मुखरित किया है। साहित्यिक भाषा को बोलचाल की भाषा बनाने के लिए मुहावरों एवं लोकोक्तियों का प्रयोग करके ठेठ हिंदी का ठाठ प्रस्तुत किया। हरिऔध जी ने खड़ीबोली की रीढ़ को मजबूत करके उसे कविता की दौड़ में शामिल होने का आत्मविश्वास दिलाया।

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की रचनाएँ

(क) प्रबंध काव्य – प्रिय-प्रवास (महाकाव्य, सन्1914), वैदेही वनवास (खंडकाव्य, सन्1940)
(ख) मुक्तक काव्य – रसिक रहस्य, प्रेमाम्बु वारिधि, प्रेम प्रपंच, प्रेमाम्बु प्रस्रवण, प्रैमाम्बु प्रवाह, प्रेम-पुष्पहार, उदबोधन, काव्योपवन, कर्मवीर, ऋतुमुकुर, पद्यप्रसून (1925), पद्य प्रमोद, चौखे चौपदे (1932), चुभते चौपदे (1932)
कविता के आलावा हरिऔध जी ने दो नाटक, तीन उपन्यास तथा ‘हिंदी साहित्य का इतिहास एवं आलोचना। की पुस्तक तथा काव्यशास्त्र रस कलश भी लिखा।

कवि – हरिवंश राय बच्चन

अपनी तीव्र अनुभूतियों को सहज, मधुर और संगीतमय भाषा में व्यक्त कर सकने की दृष्टि से हरिवंश राय बच्चन (जन्म सन् 1907) का आधुनिक हिंदी साहित्य में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। बच्चन का जन्म और शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद में हुई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम० ए० किया और वहीं अध्यापन भी किया। फिर आकाशवाणी में और भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में काम किया।

बच्चन छायावादोत्तर युग के कवि हैं जो अपने काव्य में छायावादी रूमानियत लिए हुए हैं। उनकी कविता में नितान्त वैयक्तिक आत्मकेंद्रिकता की अनुभूतियाँ हैं। जिनमें प्रणय का उद्वेलन, रूमानी अवसाद और तल्लीनता तथा वैयक्तिक सपनों का संसार लहराता है। मधुशाला, मधुकलश और मधुबाला उनकी ऐसी रचनाएँ हैं जिन्होंने हिंदी कविता को मस्ती और यौवन की संवेदना से सराबोर कर हालावाद का प्रवर्तन किया। पश्चवर्ती काल में उनकी काव्य-संवेदना में विस्तार हुआ तथा वह जन-जीवन के दर्द को सहज भाषा में व्यक्त करने लगी। इसीलिए वे कवि सम्मेलनों के लोकप्रिय कवि रहे। दरअसल बच्चन ने छायावादोत्तर हिंदी कविताओं को लोकग्राह्य बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बच्चन ने हिंदी कविता को छायावादी वायवीयता से उतार कर उसे ज़मीन की गंध और आम आदमी की धड़कन से परिचित कराया, इसलिए इनकी भाषा में सहजता, उदारता, संगीतात्मकता और मधुरता है। प्रसाद और माधुर्य उनकी कविता के विशेष गुण हैं। बच्चन अपनी कविता में अपने जीवन के उतार चढ़ावों से झनझनाते रहे इसलिए उनके जीवन से मिले हर्ष-विषाद के दौरों के अनुसार उनकी कविता के भी विभिन्न दौर चलते रहे। पहली पत्नी की मृत्यु के कारण उनकी प्रारंभिक कविताओं में दर्द ही काव्य रूप ग्रहण किए हुए है, बाद में दूसरा विवाह होने पर जीवन के उल्लास की कविताएँ लिखी। बच्चन का काव्य इस शताब्दी के पाँच दशकों तक फैला हुआ है और इस काल में होने वाली सामाजिक उथल-पुथल को उन्होंने अपनी कविताओं में रेखांकित किया। परवर्तीकाल में बच्चन ने कविता की बजाए गद्य अधिक उत्कृष्ट लिखा।

हरिवंश राय बच्चन की रचनाएँ

मधुशाला (1935), मधुबाला (1938), मधुकलश (1938), सतरंगिनी (1945), आकुल अंतर (1945), मिलन-यामिनी (1950), प्रणय पत्रिका (1954), बुद्ध और नाचघर (1954), नागर-गीता आदि। इन काव्य-कृतियों के अलावा बच्चन ने ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ ‘नीड़़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’ तथा ‘दशद्वार से सोपान तक’ चार खण्डों में आत्मकथा भी लिखी। उन्होंने शेक्सपीयर के नाटकों एवं रूसी कविताओं का अनुवाद भी किया।

कवि – दुष्यन्त कुमार

दुष्यन्त कुमार (1933 – 1975) का जन्म उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के राजपुर गाँव के एक किसान परिवार में हुआ। शिक्षा चंदौसी और इलाहाबाद में हुई। आकाशवाणी और मध्यप्रदेश सरकार के भाषा-विभाग में नौकरी की। वे मस्तमौला, बेफिक्र और हँसमुख व्यक्ति थे।

दुष्यन्त कुमार नई कविता के रोमांटिक, निजी गहन अनुभूतियों के कवि रहे हैं। उन्होंने अपनी संवेदना को अनौपचारिक एवं सहज भाषा में प्रस्तुत किया तथा उसमें प्रस्तुति की कलात्मकता के आग्रह को नहीं आने दिया। दुष्यन्त ने पहले हिंदी कविताओं के कई काव्य-संग्रह निकाले, किन्तु अंतत: हिंदी ग़ज़ल के लिए समर्पित हो गए और इस प्रयास में दुष्यन्त और हिंदी ग़ज़ल दोनों ही एक साथ चमक उठे। ‘साये में धूप’ ग़ज़ल संग्रह से दुष्यन्त हिंदी में श्रेष्ठ ग़ज़लकार के रूप में स्थापित हो गए तथा हिंदी ग़ज़लकारों के लिए प्रेरक-दीप हो गए। दुष्यन्त कुमार की सोच रही है कि उर्दू और हिंदी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उनमें फ़र्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। उन्होंने कहा, “मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज्यादा से ज्यादा करीब ला सकूँ। इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में कही गई हैं, जिसे में बोलता हूँ।”

तो दुष्यन्त कुमार हिंदी साहित्य में उस शख्सियत का नाम है जिसने ग़ज़ल के द्वारा न केवल उर्दू और हिंदी को निकट किया बल्कि आम भाषा से कविता कर सकने का चुनौतीपूर्ण प्रयास भी किया। दुष्यन्त के काव्य में और विशेष रूप से ग़ज़लों में सामाजिक यथार्थ की एवं शोषित के हित की प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति हुई है इसलिए दुष्यन्त की ग़ज़ल ने सामाजिक रुख अख्तियार किया, इसीलिए ये समूह में कोरस की तरह खूब गाई जाती हैं।

 दुष्यन्त कुमार की रचनाएँ

दुष्यन्त ने ‘सूर्य का स्वागत’, ‘आवाजों के घेरे’, ‘जलते हुए वन का वसंत’, एक कंठ विषपायी (काव्य नाटक), ‘समय की धूप’ आदि काव्य कृतियाँ लिखी। इनके अलावा उन्होंने ‘आंगन में एक वृक्ष’ तथा ‘दुहरी जिदंगी’ भी लिखे, ‘मत के कोण’ (एकांकी) एवं ‘और मसीहा मर गया’ नाटक की रचना की। कुछ पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद भी किया।

कवि – सुमित्रानन्दन पंत

छायावाद के शिल्पी सुमित्रानन्दन पंत (सन् 1900 – 1977) उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा जिले के प्राकृतिक सौंदर्य से सम्पन्न कौसानी ग्राम में जन्मे। जन्म के साथ ही मातृ वियोग हुआ, संभवत: इसीलिए अन्तर्मुखी व्यक्तित्व था। प्रारंभिक शिक्षा कौसानी में हुई। फिर वाराणसी और इलाहबाद में शिक्षा ग्रहण की। 1921 में गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर कॉलेज छोड़ दिया। स्वाध्याय से ही साहित्य और दर्शन का ज्ञान अर्जन किया। उनकी चिदंबरा नामक काव्यकृति के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ।

प्रारंभ में गुंजन तक की रचनाओं में पंत जी की छायावादी वृत्ति प्रधान नहीं थी। इस अवधि की रचनाओं में सोच और शिल्प का लालित्य एवं उदात्तता दिखाई देती है। गुंजन के बाद 10 वर्षों तक प्रगतिवादी चिंतन से प्रभावित होकर काव्य-रचना की जिसमें ग्राम्या प्रमुख है। इन रचनाओं में जन-जीवन के अभावों का चित्रण है। 1943 ई. के बाद पंत जी अरविंद एवं गांधी दर्शन से प्रभावित होकर रचनाएँ करने लगे जो कविता कम और दर्शन अधिक हैं। पंत के काव्य में प्रकृति का बहुत आत्मीय, गहरा और व्यापक चित्रण मिलता है जो हिंदी साहित्य की अनूठी निधि है। पंत कविता में शब्दों के चयन के प्रति बहुत जागरूक रहे हैं। उनकी कविता के शब्द संगीत, चित्रात्मकता एवं व्यंजना प्रधान अर्थ देने में अदभुत क्षमता लिए हुए हैं। उनकी स्वच्छन्दतावादी रुचि एवं कोमल कान्त पदावली के कारण उन्हें सुकुमार कवि कहा गया है। उन्होंने खड़ीबोली को मिठास दिलाई, पुरानी काव्य रूढियों से मुक्ति दिलाई तथा एक सूक्ष्म, समर्थ काव्य-भाषा का उदाहरण प्रस्तुत किया।

सुमित्रानन्दन पंत की रचनाएँ

उच्छवास (1920), ग्रंथि (1920), वीणा (1927), पल्लव (1928), गुंजन (1932), युगांत (1936), युगवाणी (1938), ग्राम्या (1940), स्वर्ण किरण (1947), स्वर्ण धूलि, युगपथ, उत्तरा, वाणी, सौवर्ण (रूपक), कला और बूढा चाँद (1959), चिदंबरा (1959), लोकायत (महाकाव्य, 1964) और सत्यकाम (महाकाव्य), चित्रांगदा, पतझर, शंखध्वनि आदि उनकी महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं।

कवि – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (1897 – 1961) प्रारम्भ में छायावादी काव्य के प्रवर्तकों में से रहे किन्तु अपनी बहुमुखी प्रतिभा एवं गतिशील रचनाशीलता के कारण वे प्रगतिशील कविता के दौर से गुज़रते हुए नई कविता के द्वार तक भी पहुंचे। उनका जन्म बंगाल के महिषादल क्षेत्र में हुआ तथा वहीं बचपन बीता। वे मूलतः उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढाकोला गाँव के निवासी थे। उनका मूल नाम सूर्यकुमार था जिसे बदलकर उन्होंने सूर्यकांत और बाद में उपनाम निराला रखा। हाई स्कूल में अनुत्तीर्ण होने पर स्कूली पढाई छोड़ दी।

निराला ने काव्य, उपन्यास, कहानी, रेखाचित्र, निबंध, जीवनी तथा समीक्षाएँ लिखी। बंगला एवं संस्कृत में काव्यानुवाद भी किया। शूरू से ही प्रयोगधर्मी रहने के कारण इन्हें हिंदी में मुक्त छंद के प्रथम प्रयोगकर्ता के रूप में जाना जाता है। इनके काव्य में दार्शनिकता, विद्रोह और क्रांतिकारिता के साथ-साथ शृंगार की तरलता भी विद्यमान है। इन्होंने छंद, भाषा, शैली तथा भाव आदि सभी स्तरों पर नए प्रयोग करके हिंदी कविता के अनेक मोड़ों का नेतृत्व किया। निराला की ‘जूही की कली’ भावों की कोमलता, छंद मुक्ति के अभियान के लिए ‘राम की शक्ति पूजा’, काव्य गठन की पुरुषता के लिए तथा ‘कुकुरमुस्ता’ आम आदमी की सहजता के लिए हिंदी साहित्य के अलग-अलग मील के पत्थर हैं। निराला की भाव एवं शिल्पगत उदात्तता उनके कवि व्यक्तित्व की अपनी पहचान रही है। उन्होंने प्रकृति के सौंदर्य, शृंगार, संघर्ष, वेदना, विद्रोह तथा राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना एवं तत्त्व चिंतन को कविता में प्राय: नवीन कल्पना और सधे हुए ओज के साथ चित्रण किया है।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचनाएँ

अनामिका (1923), परिमल (1930), गीतिका (1943), तुलसीदास (प्रबन्ध रचना, 1938), कुकुरमुत्ता (1942), अणिमा (1943), बेला (1946), नए पत्ते (1946), आराधना (1952), अर्चना (1950), गीतकुंज, सांध्य काकली आदि काव्य-रचनाओं के अलावा दो कहानी संग्रह, तीन उपन्यास तथा तीन ही निबन्ध संग्रह भी हैं।

कवि – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय

अज्ञेय (सन 1911 – 1987) प्रयोगवाद एवं नई कविता के मुख्य प्रवर्तक रहे हैं। उनका जन्म उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के कसिया गाँव में हुआ। और  शिक्षा मद्रास तथा लाहौर में हुई। स्वभाव से प्रयोगधर्मी होने के कारण जीवन और साहित्य दोनों में एक पर एक नवाचार किए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लिया, आकाशवाणी और सेना में नौकरी की। अनेक पत्र-पत्रिकाओं के संपादन, देशाटन और लेखन में जीवन संलग्न रहा। ‘कितनी नावों में कितनी बार’ काव्य-संग्रह पर ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

अज्ञेय की कविता में आत्मान्वेषण, और बौद्धिक संवेदन है। ये शब्द के प्रयोग में अत्यन्त सतर्क रहे हैं तथा शिल्पगत प्रयोगों में लीन रहे हैं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता, स्वतंत्र जीने की छटपटाहट और समाज के साथ-साथ व्यक्ति के भी अस्तित्व की पहचान इनकी काव्य-संवेदना की मूल दिशाएँ हैं। बाह्य प्रकृति और मानव प्रकृति की अंत: क्रिया की अभिव्यक्ति भी इनके काव्य की प्रमुख प्रवृत्ति है।

अज्ञेय ने चार ‘तार सप्तकों’ के द्वारा हिंदी कविता के चौथे दशक से आठवें दशक तक की यात्रा को संग्रहीत करने का प्रयास किया। उन्होंने अकेले भी और अपने समूह के कवियों के साथ भी समाजकेंद्रिकता के स्थान पर व्यक्ति-केन्द्रिकता को अभिव्यक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। इस प्रकार अज्ञेय उत्तर छायावादी कवियों में, कविता में वामपंथी काव्यधारा से अलग व्यक्तिवादी काव्य धारा के प्रवर्तक एवं उन्नायक के रूप में देखे गए।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की रचनाएँ

सप्तकों का संपादन – पहला सप्तक (1943), दूसरा सप्तक (1951), तीसरा सप्तक (1959) और चौथा सप्तक(1979)।

मौलिक कृतियाँ – अग्रदूत (1935), चिंता (1942), इत्यलम (1946), शरणार्थी (1948), हरी घास पर क्षण भर (1949), बावरे अहेरी (1954), इन्द्रधनुष रौंदे हुए ये (1957), अरी ओ करुणा प्रभामय (1959), आँगन के पार द्वार (1961), कितनी नावों में कितनी वार (1967), क्योंकि में उसे जानता हूँ (1969), पहले मै सन्नाटा बुनता हूँ (1973) महावृक्ष के नीचे (1977), नदी की बाँक पर छाया (1989) आदि।

काव्य रचनाओं के अलावा ‘शेखर एक जीवनी’, ‘नदी के द्वीप’ तथा ‘अपने अपने अजनबी’ उपृन्यास हैं। अनेक कहानी संग्रह और निबन्ध संग्रह प्रकाशित हुए हैं, और ‘यायावर रहेगा याद’ तथा ‘एक बूंद सहसा उछली’ आदि यात्रावृत्त भी लिखे हैं।

कवि – धर्मवीर भारती

धर्मवीर भारती (सन् 1926 – 1997) का जन्म और शिक्षा-दीक्षा इलाहबाद में हुई। प्रारंभ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्राध्यापक रहे, बाद में मुंबई से धर्मयुग का संपादन किया। इन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना तथा पत्रकारिता में अपनी रचनाशीलता का परिचय दिया।

धर्मवीर भारती मूलत: सासांरिक वृत्ति के कवि हैं। प्रेम और सौंदर्य उनके प्रिय विषय रहे हैं। नारी सौंदर्य और नारी का समर्पण भाव उनके काव्य का मुख्य-विषय है। उनकी अनेक रचनाओं में सामाजिक यथार्थ को भी अभिव्यक्ति मिली है। भारती में जमीन की गंध और लोक-जीवन का रूमानीपन भी व्याप्त है। इसलिए उनका काव्य मूलत: गीतात्मक है। भारती की परवर्ती कविता में मूर्तता और पारदर्शिता भी झलकती है। इनकी कुछ कविताओं में सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनैतिक विसंगति पर व्यंग्य नजर आता है। इन्होंने कविता में जीवन-मूल्यों के प्रश्नों को भी उभारा है किन्तु वे संवेदना में रच-पचकर ही आए हैं।

धर्मवीर भारती की रचनाएँ

धर्मवीर भारती ने विश्वप्रसिद्ध नाटक अंधायुग की रचना की जो कि उनका कीर्ति-स्तम्भ है। काव्य-रचनाओं में ‘ठंडा लोहा’, अंधायुग, कानुप्रिया, सात गीत वर्ष प्रमुख हैं। इन काव्य-कृतियों के अलावा भारती के दो उपन्यास, तीन निबंध-संग्रह, एक एकांकी संग्रह, एक आलोचना की पुस्तक और एक विदेशी कविताओं का अनुवाद ‘देशान्तर’ प्रकाशित हुआ।

कवयित्री – महादेवी वर्मा

छायावाद को पीड़ा की उदात्त गंध देने वाली महादेवी वर्मा (सन् 1907 – 1987) उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में जन्मी। उन्होंने इलाहाबाद में शिक्षा प्राप्त की। इलाहाबाद में ही महादेवी ने महिला विद्यापीठ की स्थापना की और जीवनपर्यन्त उसका संचालन किया। महादेवी को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। महादेवी को भारत सरकार ने पद्म विभूषण से भी अलंकृत किया।

महादेवी की कविता अज्ञात विराट के प्रति विरह की अनुभूति को व्यक्त करती है जिसमें विस्मय, जिज्ञासा, आतुरता, प्रतीक्षा, समर्पण और आनन्द ओतप्रोत है। महादेवी भारतीय नारी के दर्द को भी उदात्तता के साथ प्रस्तुत करती हैं। अन्य छायावादी कवियों की तरह महादेवी ने प्रकृति को रहस्यात्मक अनुभूति के साथ तो प्रस्तुत किया ही है किंन्तु उसे विरह-पीड़ा से सिक्तकर, मीराँ की तरह भावपूर्ण गीति शैली को अपना कर अपने काव्य की अलग पहचान बनाई। यद्यपि महादेवी के काव्य में अन्य छायावादियों की तरह विविधता नहीं है किन्तु उन्होंने प्रेम के घनीभूत रूप को गहनता से प्रस्तुत कर सकने की विशिष्ट सामर्थ्य अर्जित की। अपने रचना कार्य के प्रारंभिक दिनों में यद्यपि राष्ट्रीयता एवं सामाजिक जागृति से संबंधित कविताएँ भी लिखी, किन्तु अपने प्रौढ़ रचनाकर्म के दिनों में उन्होंने छायावादी स्वर से भिन्न काव्य-रचना नहीं की। यहाँ तक कि अपने रचना-कर्म के उत्तरार्द्ध में काव्य-रचना के स्थान पर गद्य में निबन्ध, रेखाचित्र, संस्मरण एवं लिखित तथा वाचिक भाषणों के द्वारा हिंदी साहित्य को मानवीय एवं सामाजिक संस्कारों से सम्पन्न उत्कृष्ट रचनाएँ दी।

महादेवी वर्मा की रचनाएँ

महादेवी ने नीहार (1930), रश्मि (1932), नीरजा (1935), सांध्यगीत (1936), यामा (उक्त चार काव्य संग्रहों में से संचयन, 1940), दीपशिखा काव्य संग्रह रचे। इसके आलावा उनकी गद्य रचनाएँ हैं – स्मृति की रेखाएँ (संस्मरण), श्रृंखला की कड़ियाँ (निबन्ध), क्षणदा, पथ के साथ, अतीत के चलचित्र (रेखाचित्र) साहित्यकार को आस्था और अन्य निबन्ध रचनात्मक गद्य, संकल्पिता (निबंध) संभाषण (भाषाओं का संग्रह)। सप्तपर्णा नाम से ऋग्वेद से लेकर सँस्कृत प्राकृत और अप्रभ्रंश तक के महान कवियो की चुनी हुई कविताओं का पद्यानुवाद भी किया।

कवि – गजानन माधव मुक्तिबोध

गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म मध्यप्रदेश के ग्वालियर जिले में श्योपुर ग्राम में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई तथा नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम० ए० किया। 20 वर्ष की अवस्था से विभिन्न विद्यालयों में शिक्षण कार्य किया तथा अतत:1958 में दिग्विजय महाविद्यालय, गजानंद गाँव में अध्यापन किया।

मुक्तिबोध की पहली पहचान ‘तार सप्तक’ में एक प्रयोगवादी कवि के रूप में होती है किन्तु कविता की विषय-वस्तु एवं शिल्प में उन्होंने अपनी अलग पहचान स्थापित की। वे सामाजिक जीवन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता रखते हुए उसमें व्यक्ति के जुड़ाव के पैनेपन को भी अभिव्यक्त करते हैं। मुक्तिबोध की कविता अपने समय का जीवित इतिहास है। उनकी कल्पना वर्तमान से सीधे टकराती है, जिसे हम फंतासी (रचनात्मक सपना) की शक्ल में देखते हैं। मुक्तिबोध की कविता आज की तमाम अमानवीयता के विरुद्ध मनुष्य को अंतिम विजय दिलाती है। मुक्तिबोध का जीवन संघर्षो में गुजरा है इसलिए जीवन की त्रासदियों से कविता सहज निकलती गई, अत: उनकी कविता शास्त्र का अनुसरण नहीं करती। मुक्तिबोध में एक और मार्क्सवादी दर्शन की समझ है, दूसरी और शिल्प के रचाव का नयापन। इस कारण उनमें न विचार का खोखलापन है और न ही अभिव्यक्ति में नारेबाजी। यद्यपि उनकी सारी कविताएँ सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था के अंतर्विरोध को व्यक्त करती हैं किन्तु उनके वैयक्तिक एहसास की तीव्रता उनके बिम्ब विधान और भाषा को अपनी तरह से जटिल बना देती है, इसलिए उनकी कविता में दुरूहता भी है।

गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनाएँ

‘तार सप्तक’ में संग्रहीत कविताएँ (1943), चाँद का मुँह टेढा है (1954), भूरी-भूरी खाक धूल (मरणोपरांत प्रकाशित 1980)। उक्त काव्य कृतियों के अलावा ‘काठ का सपना’, विपात्र, सतह से उठता आदमी  (तीनों कहानी संग्रह), एक साहित्यिक की डायरी (डायरी) तथा नई कविता का आत्मसंघर्ष, कामायनी – एक पुनर्विचार, भारत का इतिहास और संस्कृति, नए साहित्य का सौंदर्य-शास्त्र  (निबंध और समीक्षा) आदि रचनाएँ भी प्रकाशित हुई।

कवि – नागार्जुन

नागार्जुन  (जन्म 1911) का मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। उनका जन्म बिहार के दरभंगा जिले के तरौनी गाँव में हुआ। पहले संस्कृत पाठशाला में फिर वाराणसी से संस्कृत में मध्यमा तथा साहित्याचार्य किया। पालि एवं प्राकृत का विशेष अध्ययन किया। गृहस्थ होकर भी जन्मजात घुमक्कड़, जीविकार्जन के लिए कोई व्यवसाय नहीं किया, विभिन्न राजनैतिक आन्दोलनों में भाग लिया।

नागार्जुन ने एक ओर तो ऐसी कविताएँ लिखी हैं जिनमें मनुष्य की रागात्मक अनुभूतियों को अभिव्यक्ति मिली है तथा प्रकृति एवं मन के सौंदर्य को मार्मिक छवियाँ प्रस्तुत की हैं दूसरी ओर सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक स्थितियों पर करारा व्यंग्य करने वाली पैनी रचनाएँ कीं हैं। नागार्जुन की कविताओं में सादगी, परिहास एवं फक्कड़पन झलकता है। वे सच्चे अर्थों में स्वाधीन भारत के जन-कवि हैं। नागार्जुन का यथार्थ चित्रण बहुत विविध, प्राढ और पैना है। उनकी कविता लोक-संस्कृति के इतनी नज़दीक है कि वह उसी का विस्तार लगती है। दरअसल किसान और मजदूरों की भाषा से नागार्जुन ने काव्य रचना करने का प्रयास किया। नागार्जुन ने ऐसे विषयों पर, और ऐसी भाषा में साहस के साथ रचना की कि अन्य कवियों ने उनको अछूता ही छोड़ा। नागार्जुन की कविता का एक बड़ा अंश प्रकृति के अनूठे प्रकृति चित्रों का है जिनमें सूक्ष्म सौंदर्य दृष्टि का तीव्र एहसास है। किन्तु नागार्जुन ने राजनीति पर तात्कालिकता के साथ जो नंग-धड़ंग कविताएँ रची हैं, वे हिंदी कविता के अपने साहस और औघड़पन को प्रस्तुत करती हैं। नागार्जुन ने विषय, छंद, भाषा आदि के क्षेत्र में इतने अधिक प्रयोग किए कि निराला के बाद ऐसा अन्य कोई कवि नज़र नहीं आता। निराला की ही तरह उनकी भाषा में भी संस्कृतनिष्ठता से लेकर अत्यन्त सादगी तक के स्वर लहराते हैं।

नागार्जुन की रचनाएँ

नागार्जुन की प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं-युगघारा, सतरंगे पंखों वाली, प्यासी-पथराई आँखें, तालाब की मछलियाँ, चंदना, खिचड़ी विप्लव देखा हमने, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, हजार-हजार बाँहों वाली। इसके अलावा भस्मांकुर खण्डकाव्य है तथा ‘चित्रा’ एवं ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ मैथिली से खंडबोली में अनूदित काव्य संग्रह हैं। नागार्जुन ने उपन्यास और कहानी संग्रह भी प्रकाशित कराए।

कवि – श्रीधर पाठक

हिंदी साहित्य के द्विवेदी युग को उत्कर्ष प्रदान करने वाले स्वच्छन्दतावादी कवियों में श्रीधर पाठक (1859 – 1928) का स्थान सर्वोपरि है। छायावादी काव्य में अभिव्यक्ति की जो प्रोढ़ता, लुनाई और स्वच्छन्दता आई उसकी पृष्ठभूमि तैयार करने में श्रीधर पाठक की बहुत बड़ी भूमिका रही है। इनकी छोटी-बड़ी 16 काव्य-कृतियां हैं। जिनमें तीन रचनाएँ अनुवाद हैं। काव्य रचना के विषय चुनने में ये उन्मुक्तता के साथ उदार रहे हैं। अपने युग की जो भी घटना, दृश्य, भाव-संवेदन इन्हें रुचा इन्होंने उसी पर लिखा, फिर भी प्रकृति-प्रेम, राष्ट्रीयता, अध्यात्म, राजनीति, धर्म, लोकानुभव आदि विषयों पर विशेष क़लम चलाई है। जगत सचाई सार, काश्मीर सुषमा, मनोविनोद, भारतमगीत, श्री गोपिकागीत आदि काव्य रचनाओं के अतिरिक्त अंग्रेज़ कवि गोल्ड़स्मिथ 3 की तीन काव्य कृतियों हरमिट (एकांतवासी योगी), ड़ेजेर्टेड विलेज (ऊजड़़ ग्राम), ट्रेवलर (श्रान्त पथिक) का अनुवाद भी किया।

नव-जागरण की उस घड़ी में हिंदी कवियों का मत और मानस जिस सामाजिक न्याय और लोक-प्रेम की दिशा में रमा उसका ठोस प्रमाण श्रीधर पाठक हैं। पाठक जी ने कविता को रीतिकालीन रूढिबद्धता और अलंकारप्रियता से उन्मुक्त किया, ब्रजभाषा से खड़ीबोली के संक्रमण को मजबूत किया और संस्कृत, ब्रज, अरबी, फारसी तथा खड़ीबोली की अपने ठाठ वाली विभिन्न शैलियों में कविता रचकर हिंदी की विविघतामयी सामर्थ्य को स्थापित किया। राष्ट्रप्रेम का जो स्वर भारतेन्दु युग से मुखर हुआ था उसे पाठक जी ने अपनी भारत गीत रचनाओं में बड़ी तेजस्विता से ध्वनित किया। इस प्रकार श्रीधर पाठक के काव्य में जहाँ एक और राष्ट्रप्रेम, जातिप्रेम और संस्कृति प्रेम है, दूसरी और प्रणय, सौन्दर्य और प्रकृति प्रेम है। तथा तीसरी और खड़ीबोली को विविधता एवं स्वच्छन्दता के साथ साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित करने का भाषागत संकल्प है। और इन्हीं तीनों वृत्तियों का प्रौढ़ स्वरूप छायावाद है। इसलिए खड़ीबोली की कविता के पल्लवन में श्रीधर पाठक का ऐतिहासिक स्थान है।

श्रीधर पाठक की रचनाएँ

आराध्यशोकांजलि (सन् 1915), श्री गोखले प्रशस्ति : ऊजड़़ ग्राम (गोल्ड स्मिथ के ड़ेजेर्टेड़ विलेज का काव्यानुवाद (सन् 1885), श्रान्त पथिक (गोल्ड स्मिथ के ट्रेवलर का काव्यानुवाद – सन् 1902), जगत सचाईसार (सन् 1916), काश्मीर सुषमा (सन् 1904), श्री जॉर्ज वन्दना (सन् 1912), मनोविनोद (1917), भारतगीत (1928), श्री गोपिकागीत (1916), देहरादून (1915), स्वजीवनी (1927) आदि। श्रीधर पाठक की रचनाएँ अब श्रीधर पाठक ग्रंथावली (राजस्थानी, ग्रंथागार, सोजती गेट, जोधपुर) में संगृहीत हैं।

कवि – धूमिल

धूमिल (1936 – 1975) उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के खेवली गाँव में जन्मे और हाई स्कूल परीक्षा पास कर प्राइवेट नौकरी की, फिर आई० टी० आई० में विद्युत  डिप्लोमा करके वाराणसी एवं अन्य स्थानों पर अस्थायी नौकरियाँ की। ब्रेन ट्रयूमर के कारण 10 फ़रवरी, 1975 को 40 वर्ष की अवस्था में असामायिक निधन हो गया।

धूमिल का जीवन प्रारंभ से ही आर्थिक संघर्षों से घिरा रहा इसलिए उनकी कविता में संघर्ष का तनाव और चमक बराबर नज़र आती है, वे मार्क्सवाद से प्रभावित हुए और उनकी निजी एवं समाजिक राष्ट्रीय परिस्थितियों ने उस प्रभाव को और गहरा कर दिया। उन्होंने देखा कि उनके आसपास की सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था अत्यन्त विषम, शोषण और अन्याय से ग्रस्त तथा क्रूर है। और इसे हर हालत में बदलना चाहिए। उन्होंने कविता को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना। वे भाषा को तेज धुरी की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे। वे ऐसा कर भी सके तथा समकालीन हिंदी कविता को धार दी, पैना किया और उसे परिवर्तन की धुरी की तरह इस्तेमाल किया। उन्होंने जन-जीवन के दृश्यों और शब्दों में इतना तनाव पैदा किया कि वे काव्योक्तियाँ बन गए। उन्होंने कहा कि कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।

धूमिल की रचनाएँ

धूमिल के जिंदा रहते उनका एक प्रसिद्ध कविता संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ (1972) प्रकाशित हुआ। इसके बाद ‘कल सुनना मुझे’, ‘सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र’ (1984) तथा धूमिल की कविताएँ (1983) काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए।

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