ऋषभ तोमर द्वारा लिखित मौहब्बत पर पांच ग़ज़लें

ग़ज़ल – 1
शान्ति  अमन औऱ विश्वास  कहाँ है।
चारों ओर अंधेरा है आकाश कहाँ है।।

हिंदू मुस्लिम इसाई सिख बहुत है,
मगर इंसानों की बस्ती में इंसान कहाँ है।।

एक हाथ मक्खन और एक हाथ चूना,
किसको मैं चाहूँ यहाँ अच्छा कहाँ है।।

लबो पर तबस्सुम औऱ दिल में नफरत,
इस बेबफा जमाने मे वफ़ा कहाँ है।।

नदियों को भी जहाँ पर माँ कहते थे,
नारी का सम्मान हिन्दुस्तां कहाँ है।।

जो हमेशा विश्वबंधुत्व की बात करता था,
वो मेरा अखण्ड हिन्दुस्तां कहाँ है।।

राधा और कृष्ण ने मौहब्बत का पैगाम दिया,
वो यमुना तीरे का गोकुल कहाँ है।।

गंगा यमुना कावेरी नदियों को माँ सा पूजा,
माँ बहनों का वह सम्मान कहाँ है।।

तुम तो बेवजह परेशान हो ऋषभ,
गीता कुरान बाइबिल का ज्ञान कहाँ है।।

 

ग़ज़ल – 2
चाहत प्रेम मौहब्बत  ओस।

ऐसा ही जज्बात है ओस।।

फूलो की कोमल पंखुडी में,
कुंदकली जेसी है ओस।।

प्रातः तृणों पर मोती जैसी,
बूंदों का दिखना है ओस।।

नयनों को ठंडा कर देना,
स्वेत दरी है प्यारी ओस।।

सर्द ऋतु में तुहिन तृणों पर,
चाँदी जैसी बिखरी ओस।।

जड़ो के दिन पुष्प देह पर,
ठिठुर गिरी जो बूँद है ओस।।

उषा की कोमल किरणों से,
घबड़ाती गिरती है ओस।।

रवि रश्मि से झिलमिल करती,
जीने की आशा है ओस।।

जड़ों के बर्फीले दिनों में,
उर की एक वर्जना ओस।।

कवि की कोमल कल्प कला,
कोहरा कोमल काम है ओस।।

ऋषभ की यादों में बिखरी है,
उनकी यादों की है ओस।।

 

ग़ज़ल – 3
उसकी जुल्फों में कही मैं खो जाता हूँ।

तो मैं एक कामयाब इंसान हो जाता हूँ।।

कल तलक उदासियों तन्हाई में रहा,
उसे देखकर एक रोशन दिया हो जाता हूँ।।

मुझे क्या हुआ खुद भी अनजान हूँ,
बस मैं तो उन्ही में खो जाता हूँ।।

जिस तरह मेरे इश्क की डायरी है,
उसी तरह उनसे खुल जाता हूँ।।

मोहबत में कभी बाँसुरी हो जाता हूँ,
तो कभी प्यार की बंशी सा बज जाता हूँ।।

किसी काली घटा की तरह उन पर,
मैं हर रोज हँसकर बरस जाता हूँ।।

उनके बिना अक्सर तड़प जाता हूँ,
रेत की मछली की तरह फड़फड़ाता हूँ।।

बनाकर मौहब्बत भरी कोई नदिया उन्हें,
उनकी जवानी में छपछापता हूँ।।

मैंउनमें हर रोज खोता जाता हूँ,
किसी सुराही का मीठा जल हो जाता हूँ।।

जब वो छूती है मुझको अपने अधरों से,
तो गंगाजल सा पवित्र हो जाता हूँ।।

मैं किसी दरिया सा बहता जाता हूँ,
ज़िन्दगी के थपेड़े सहता जाता हूँ।।

गर्म लहजा है उनका मैं बर्फ हो जाता हूँ,
खुली आँखों का सपना हो जाता हूँ।।

जब कभी वो कही पर छुप जाती है तो,
उसे ढूढ़ने की खातिर दिया हो जाता हूँ।।

अब तलक मर मर कर जिया ऋषभ,
उन्हें देखकर ज़िन्दगी हो जाता हूँ।।

 

ग़ज़ल – 4
मेरे सपनों का कोई भाग हो।
तुम लड़की नहीं गुलाब हो।।

राधा सीता मीराबाई की तरह,
कोई तुम भी एक किरदार हो।।

ज़िन्दगी क्या अपनी रूह दे दूं,
दिलरुबा तुम ही मेरा प्यार हो।।

राधा जी कृष्ण की है वैसे ही,
तुम भी जान मेरी सरकार हो।।

मेरे जिस्म  के हर एक कोने में,
तुम रक्त की फैलती धार हो।।

सारे वातावरण पर जो है छाई,
वो तुम महकती हुई बाहर हो।।

वर्षो के मुझ प्यासे पर साथी,
सावन की पड़ती फुहार हो।।

जो देखे है जागती आखों से,
सपनों की प्रमुख क़िरदार हो।।

इस भाव सागर से पार पाने में,
मैं नाव हूँ तो तुम पतवार हो।।

ज़िन्दगी में मेरी होगी बहार,
जो साथ चलने को वो तैयार हो।।

ऋषभ जान भी लुटा देगा साथी,
क्योंकि तुम उसकी खुशगवार हो।।

 

ग़ज़ल – 5
तुझे मौहब्बत नहीं है मुझसे ये शिकायत न कर।
आखिरी मिलन है मेरा मुझसे अदावत न कर।।

सदियों से तुझे सहेजा है दिल में सांसों की तरह,
आखिरी वक्त में मुझसे दोस्त बगावत न कर।।

बदल गये है मंजर मेरी – तेरी मौहब्बत के साथी,
आखिरी मिलन में दूर जाने की सिफारिश न कर।।

तुझे पसन्द नहीं है साथी मेरा खुलकर मुस्कुराना,
तो मेरी जाने जाँ आज मुझसे मौहब्बत न कर।।

जर्रे – जर्रे में सिर्फ तेरी महक बसती है महक,
तू इस महक को नफरतों  से जाहिर न कर।।

तेरे बदलने से बदल गया है हर गुलशन,
मेरी जान अब और बदलने की हिमाकत न कर।।

ऋषभ गुलाब जैसी खूबसूरती है उसमें,
उससे कह कि वो गुलाब-सी मौहब्बत न कर।।

 ऋषभ तोमर

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