डॉ० नीलम कौर की नौ कविताएँ

कविता – 1
मुस्कराती जिंदगी में
वो मिला इस तरह
जिंदगी ही कहीं थम गयी
अंजान ही सही
पर मिला कुछ एेसे के…
सदियों से मुलाकाती था वक्त का दरिया….
बहता रहा।

दो दिलों के दरमियां….
कुछ वो वाणी की कश्ती
नियमों के पतवार से बहाते रहे।

कुछ हम भी पलकों
के साये तले लफ्जों को
थामें रहे….
फासले इस तरह सिमटते
रहे दोनों के दरमियां
जैसे दरिया पे कहीं
भावनाओं के पुल बंधे हो कहीं।

कविता – 2
दर्द का इतिहास आज पलटा तो….
आज मंद-मंद मुस्करा उठा
धीमे-से दिल की पुस्तक ने सरगोशी की….
क्या मिला अतीत के वर्को में….
देखो कुछ भी तो
नहीं बिसरा।

सब कुछ तो
वैसा ही है, हर वरका आज भी सीला – सीला सा है
आज भी दामन-ए-दिल में
धुआँ -धुआँ सा है
दर्द की कसक अब भी ताज़ा है।

मानों अभी – अभी गम
का तूफ़ान दिल से टकरा के गुज़रा है।

कविता – 3
सांवली सलोनी निशा
मिलनयामिनी की मीठी यादों को
तारों की चुनर में समेटे
फिर मिलेंगे सांध्य – प्रहर में
वादे के साथ
लौट चली
अपनी नूतन राह पर,
नन्हा सूरज
किरण -पांख पसारे
निकल गया
जग को जगाने।

कविता – 4
रात की स्याही में लिपटी
खामोशी बन कर
किसी की याद लिपट जाती है
भोर के धुंधलके में
धीरे -धीरे अवगुंठन खोल
स्मृति के लिहाफ में फिर सिमट जाती है।

कविता – 5
गिले-शिकवे जताने को चेहरे मेरे तुम्हारे सामने है
छुरा घोंपने को तुम्हारी पीठ है तो
मेरे हाथ में खंजर भी है
गले लगाने का मन करता भी है।

पर आरोप तेरे भी हैं
तो मेरे भी हैं…
शब्द की सीमा जानता हूँ मैं
पर शब्द के घाव देने की ललक
तुममें भी है मुझमें भी है।

चार कदम चल कर
आ तो मैं भी सकता था
रास्तों की दूरी भी मैं तय
कर सकता था
पर दो कदम तेरे भी हैं
दो कदम मेरे भी है।

कविता – 6
अतीत के तालाब में
यादों की बतखें
सरगोशियाँ करती हैं
कुछ मीठी कुछ तीखी
कभी गुदगुदाती हैं
कभी रूलाती हैं
कभी डूब कर मोती
तलाश लाती हैं
तो कभी रीते हाथ
किसी याद को छुपा
दिल को बोझिल कर
जाती है।

कविता – 7 
कुछ रिश्ते इश्के फानी से होते हैं
शब्दों के स्पर्श से भी मैले हो जाते हैं
पलकों की छाँव,
मन के गहनतम मीठी -सी यादों के
उजालों में सिमटे-सकुचाए से रहते हैं
जहाँ नाजों से कभी पलक झपका दीदार तो कर लें
पर बयां नहीं करते।

कविता – 8 
अपनी ही मजार पर
दिया जलाए बैठे हैं।
बरसों मिलने का
वादा करते रहे
बरस बीते इंतज़ार
करते रहे।
अब भी कब्र पर
इस आस में बैठे हैं,
कि शायद उनकी
यादों के किसी
वर्क के किसी
कोने पर हमारे
किसी तोहफे की
छाप उन्हें नज़र आए
और बेइंतहा बेचैन हो
जब मुझ तक आएं
तो फिर से राह भटक न जाएंगे।

कविता – 9
जिंदगी बड़ी बेवफा होती है
बेवक्त हिसाब मांग
लेती है
दिल जब सुकूं से
इश्क़ की गलियों में
सफ़र करता है
कमबख़्त बही खाता
खोल लेती है
चुन-चुन के धारायें लगाती है
बेवजह बेबुनियाद
सजायें दे जाती है।

कभी गम की कारा
कभी आसुँओ की
श्रखला में बांध देती है।

सच, जिंदगी बड़ी
खुदगर्ज होती है
खुशियो के शीतल जल में
दुःख की तपन देती है।

 डॉ० नीलम कौर

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