डाॅ० कौशल किशोर श्रीवास्तव की सात ग़ज़लें

ग़ज़ल – पापा
बसे हुये हैं प्यारे पापा।
दिल में नेक दुलारे पापा।।

जब-जब हमको लगीं ठोकरें,
आकर बने सहारे पापा।।

सिर पर छाया जैसे हरदम,
सिर पर रहे हमारे पापा।।

जब भी हमने रोड़ा समझा,
गुप चुप हुये किनारे पापा।।

गये आखिरी सांस अकेले,
थे कितने बेचारे पापा।।

 

ग़ज़ल – रख
खुशियों भरा पिटारा रख।
दिल में जज्बा प्यारा रख।।

तुझे अकेले चलना है,
आगे एक सितारा रख।।

मन में हो मझधार अगर,
अपने साथ किनारा रख।।

धुन्धले पन के भी अन्दर,
सुन्दर एक नजारा रख।।

दुनिया से जो भिड़ना हो,
सच का सदा सहारा रख।।

 

ग़ज़ल – लगे
जड़ जगाने में जिनको जमाने लगे।
उन दरख्तों को पल में गिराने लगे ।।

उनकी इतनी हवस कि खुदा क्या करे,
सारे दुनिया के भी कम खजाने लगे।।

दफन खुद में ही अब शख्श होने लगे,
ताले खुद ही जुवां पे लगाने लगे।।

गीत हमने चखे हैं शहद से भरे,
शोर हमको तो अब के तराने लगे।।

डांटते हैं हमें खुद के लख्ते जिगर,
जब से पैसे क्या थोड़े कमाने लगे।।

शख्श ईमान की बात करता है वह,
देखने सब उसे जैल जाने लगे।।

जिनके खुद के मकां है किलों पर बने,
नीचे की झुग्गियों को जलाने लगे।।

 

ग़ज़ल – चाहिये
तेरे मेरे बीच की अब धुन्ध छटनी चाहिये।
आग की दीवार दरिया में बदलनी चाहिये।।

जमाना कठपुतलियों का बहुत पीछे रह गया,
उनको सीधे उंगलियों से ही उलझना चाहिये।।

मेरी मेहनत तुम्हारी दौलत का झगड़ा बात से,
नहीं सुलझा, सड़क पर उसको सुलझना चाहिये।।

तुम्हारी कुर्सी को नारों से उठाये हम रहे,
तर्जुमा नारों का कामों में बदलना चाहिये।।

ऊंट पर बैठे हो तुम, हाथी नहीं सीधा चले,
जानता है ऊंट कब करबट बदलना चाहिये।।

 

ग़ज़ल – हारे नहीं
चाहे हमको मिले हों किनारे नहीं,
हमने मांगे किसी से सहारे नहीं ।।

हम बवण्डर के आगे भी जलते रहे,
हमसे हारा बवण्डर हम हारे नहीं।।

हम सितारें हैं दिन में चमकते हुये,
जो बुझें ऐसे दिन में सितारे नहीं।।

टूटकर धूल सा वह बिखर जायेगा,
जिसने रिश्ते जो हमसे सुधारे नहीं ।।

हमने धरती बनाई है पैरों तले,
जो लगें खोखले ऐसे नारे नहीं।।

रास्ते जब अलग हमसे हो ही गये,
तुम हमारे नहीं, हम तुम्हारे नहीं।।

आस्मां चांद सूरज भी झुक जायेंगे,
हमने दिखलाये तेवर हमारे नहीं।।

 

ग़ज़ल – चलें
शान्ति का राग जोर से गाते हुये चलें।
लड़ने की जगह घुटने टिकाते हुये चलें।।

वादे जो किये कुर्सी को पाने के लिये थे,
हम भीष्म नहीं वादा निभाते हुये चलें।।

देहरी के पार भीख दें घर भूख पाल कर,
दीवार खुद ही घर की गिराते हुये चलें।।

बन्दर की बांट मिलती रहे हरेक दिन हमें,
मस्जिद को मन्दिरों से लड़ाते हुये चलें।।

बढ़ना नहीं आता है पर जनता भी मांग पर,
आगे बढ़े हैं शोर मचाते हुये चले।।

जिन गलतियों पर उंगली उठाई कभी हमने,
हम उन्हीं सब को आज दुहराते हुये चलें।।

आगे का रास्ता तो हमने रोक ही लिया,
पीछे की तरफ मुल्क धकाते हुये चलें।।

 

ग़ज़ल – कहिये
चमन के ये दरख्त क्या कहिये।
हमीं पे धूप सख्त क्या कहिये।।

हमारी जीत में मालुम न था,
छिपी थी एक शिकस्त क्या कहिये।।

हमारे चारों और हर्फों की,
कसती जाती गिरफ्त क्या कहिये।।

दलों के दलदलों में मुल्क फंसा,
सभी मौका परस्त क्या कहिये।।

हर एक सांस की कीमत देकर,
हम तो हो गये पस्त क्या कहिये ।।

 डाॅ० कौशल किशोर श्रीवास्तव

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