एक और शहादत

वह भटकता रहता। उसके लिए क्या मंदिर, क्या मस्जिद, क्या गुरुद्वारा, क्या गिरिजा? वो उन सबका था जो उससे मिलते थे। मिलने पर चाहे दुत्कार मिले या सम्मान वो कुछ न बोलता, बोलता भी कैसे? दुश्मनों ने उसके मुँह में जुबान ही नहीं छोड़ी थी। ऐसे ही एक दिन वह बुखार से तपता हुआ अपनी अनिश्चित मंजिल की ओर चला जा रहा था कि सर्द हवा के झोंके ने उसे कम्बल और कस के लपेटने को मजबूर कर दिया। लेकिन फायदा ही क्या था? उस कम्बल और छलनी में बस यह ही फर्क रह गया था कि एक ऊन का बनता है और दूसरा स्टील का। नतीजतन वह गश खाकर खुदा के दर (मस्जिद की सीढ़ियों) पर गिर पड़ा। जब होश आया तो खुद को किसी के घर में पाया। सिरहाने की बायें ओर लम्बी दाढ़ी वाले महाशय बैठे थे, दायीं ओर बैठे जनाब नब्ज टटोल रहे थे और पैरों की तरफ खड़े महानुभाव हाल जानने को बेचैन हो रहे थे।  उनका ही कोई अपना बीमार पड़ गया हो । अक्सर खून के रिश्तों से कहीं बढकर होते हैं ये भावनाओं, संवेदनाओं और इंसानियत के रिश्ते।

“मौलवी साहब! लगता है लड़के को ठण्ड पकड़ गयी है।”

“मियाँ उस्मान, अपनी बहिन उस्माना को कहना कि आज खाने में इसे सिर्फ पाये का शोरबा दे, ठण्ड जल्दी उतरेगी।”

मौलवी साहब और हकीम साहब दोनों ही अपने-अपने रास्ते चल पड़ते हैं । घर में रह जाते है बस उस्मान, उस्माना और वह जो अपना परिचय देने में असमर्थ है।

“मियाँ! तुम्हारा नाम क्या है?”

मुँह तो हिलता है लेकिन उस जुबान का क्या जो साथ ही नहीं। इशारों से समझाने का विफल प्रयास अवश्य था। अन्ततः मुँह खोल दिया। “या अल्लाह! जुबान कहाँ है आपकी?”

“किस नामुराद ने ऐसा जालिमों जैसा सुलूक किया?”

“ऐसा कीजिये लिख के बता दीजिये।“

कागज-कलम आता है, स्याह अक्षर उभरते हैं और उस्मान के हाथों में पहुँचते हैं।

“ये तो हिंदी है! माफ करना मियाँ मैं सिर्फ उर्दू पढ़ना ही जनता हूँ । लेकिन आप फिक्रमंद न हों,मेरे कुछ दोस्त हैं जो हिंदी जानते हैं।”

“तो ऐसा करते हैं जब तक आपकी पहचान नहीं मिलती तब तक हम आपको मुसाफिर नाम से नावाज देते हैं । मंजूर तो होगा न आपको?”

मंजूर क्यों न हो उसको जो खुद को ही तलाश रहा हो । एक नये जीवन के साथ एक नयी पहचान भी तो मिल रही है।

“लीजिये, ये पाये का शोरबा नोश फरमाइए। आपको ठण्ड में सुकून पहुँचायेगा।”

अब एक शाकाहारी को क्या माँसाहारी भी बनना पड़ेगा? बड़ी मुश्किल से समझा पाया कि माँस नहीं खाएगा । जैसे-जैसे रमजान का पाक महीना पास आता जा रहा है वैसे-वैसे मुसाफिर की हालत में सुधार आता जा रहा है । यहाँ के नये-नये लोग अब पुराने हो चले थे। लेकिन जो इज्जत उसे यहाँ बक्शी जा रही है, वो इस हाल में पहले कभी न मिली थी। सब उसके लिए अपने हो गये थे- भाई जैसा उस्मान, बहन जैसी उस्माना, वालिद जैसे मौलवी साहब, चचा जैसे हकीम साहब। और अब तो अपनी बात समझाने के लिए ज्यादा जद्दोजहद भी नहीं करनी पड़ती थी ।

आखिरकार ईद का पाक दिन भी आ गया। उस्मान अपने सभी दोस्तों के साथ ईदगाह गया है। घर और मुसाफिर की जिम्मेदारी उस्माना की है। मगर उसका भी तो मन है अपनी सहेली के साथ बड़े बाजार जाने का। पर भाईजान ने दावत की सारी बागडोर भी तो उसके ही हाथ में दे दी। अब क्या करे बस मन मसोसकर रह गयी। शायद नहीं, सहेली तशरीफ ले आयी हैं ।

“उस्माना! जल्दी करो बड़े बाजार नहीं चलना क्या?”

“नहीं-नहीं, बहुत काम बाकी है।”

“ऐसा बाजार फिर न लगेगा, चलो दोपहर से पहले लौट आयेंगे ।”

सहेली के भरोसे पर भरोसा कर उस्माना चल तो पड़ी लेकिन घर में मुसाफिर भी तो है और कदम थम गये। मुसाफिर के आश्वासन ने हौसला बँधाया तो इस बार निश्चिन्त होकर बड़े बाजार की ओर चल पड़ी। लगभग एक बजने को हैं, उस्माना हांफते-हांफते घर में कदम रखती है।

“आज तो बहुत देर हो गयी । भाईजान मेहमानों को लेकर पहुँचते ही होंगे और अभी तक खाना भी न बना है।”

अपने पाँच दोस्तों को साथ लिए उस्मान का आगमन भी होता है । उस्माना घबराकर बावर्चीखाने की तरफ दौड़ती है। पतीली में सब्जी बनी रखी है, डेग में पायसम, तंदूरी नान टोकरी में सजे हैं, सलाद कटा है बस नहीं पका है तो माँस। उस्माना की जान में जान आती है, जो-जो रह गया था फटाफट पका देती है। खाना परोसा गया, लजीज पकवानों का भरपूर लुत्फ उठाया गया, तारीफों के पुल भी बंधे और सबको यह जानकर खुशी से ज्यादा हैरानी हुई कि अधिकतर खाना मुसाफिर ने बनाया था। एक महाशय तो उसे अपने यहाँ आने वाले महीने की दावत के लिए बावर्ची तक नियुक्त कर गये ।

एक लम्बा अरसा बीत गया। पुरानी यादों पर नयी रोशनी, नयी पहचान की चादर चढ़ चुकी थी। दिलेर सिंह कहीं खो चुका था, जो अब था वह सिर्फ मुसाफिर था। लेकिन वक्त का खेल शायद अभी बाकी था, उसे उस दिलेर का ही इन्तजार था जो मुसाफिर की रूह में कहीं छुपा बैठा था। आतंक ने जिंदगियाँ जला दीं, साथ ही मुसाफिर का घर भी। छीन लिए उसके अजीज मौलवी और हकीम साहब। उसके उस्मान भाई और उस्माना बहन जैसे कई और भाई-बहनों को अपने खूनी पंजों में जकड़ लिया था। खबर आयी कि बंधको को बड़े बाजार के बाहर एक सुनसान घर में कैद कर रखा है। सेना के जवान मोर्चा सँभालने को पहुँचने वाले हैं। न जाने आज वो दिलेर कैसे जाग उठा जो बरसों से सोया था, कानो में रह-रह कर गूँज रहा था “कमांडर दिलेर सिंह! इट्स टाइम फॉर एक्शन!”

कुछ आतंकी नीचे की मंजिल में घूम रहे थे और कुछ ऊपर बंधको के पास थे। उन्ही में उनका सरगना भी था, कुछ आतंकियों को जेल से रिहा करने की शर्त थी। कुल मिलाकर 6 आतंकी थे। दिलेर सिंह उर्फ मुसाफिर ने एक आंतकी को मार गिराया और उस ही का मुखौटा ओढ़ जा पहुँचा अन्दर, अपनों के पास। लोग चीख रहे थे, पुकार रहे थे, खुद को छोड़ देने की अर्जियाँ लगा रहे थे ।

“बहार कितने कबूतर (सैनिक) हैं?”

“2 सामने हैं, 2 पीछें, 2 दायीं तरफ की बिल्डिंग में और 2 छत पर उतर रहे थे, उन्हें मार दिया।

“बहुत देर से हमारी शर्तों को तवज्जो नहीं दी इन लोगों ने, एक तोहफा भिजवा देते हैं।”

उस्मान के सिर पर बन्दूक रख उसे छत पर ले जाकर मारने का इशारा होता है। उनमें से एक आगे बढ़ उस्मान को ले छत की तरफ बढ़ता है। गोली चलने की आवाज होती है। जब बहुत देर तक छत से कोई नहीं लौटता, तब एक-एक कर आतंकी ऊपर आते और सीधे ऊपर पहुँच जाते।

“लगता है वह सारे छत पर ही ठहर गये हैं।”

“हाँ! इन्हें बाहर से बंद कर हम भी चलकर देखते हैं कि माजरा क्या है? याद रहे कुछ भी गड़बड़ हो तो फौरन इन सबको उड़ा देना ।”

वह भी जाते हैं और छत का नजारा देख चैंक जाते हैं । लाशें बिछी पड़ी हैं, उनके साथियों की ।

“कौन हो तुम?”

चेहरे से नकाब हटते ही दोनों के होश फाख्ता हो जाते हैं।

“दिलेर सिंह! अब तलक जिन्दा है?”

गोलियों की गूँज से काँच बिखर जाता है। सेना सभी बंधको को सुरक्शित बचा लेती है।

छत पर कोई अपने भाई उस्मान की गोद में आखिरी साँसे ले रहा है।

अगली सुबह अखबारों में छपा था “आज देश का एक और बेटा देश पर मर मिटा”

 ऋचा इन्दु

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