बाल कविताओं का संग्रह

इस संकलन में हमने बच्चों की रूचि और मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए सरल, मनोरंजक, शिक्षाप्रद और रोचक बाल कविताएँ प्रस्तुत की हैं। इनमें अधिकतम लोकप्रिय कविताएँ हैं जो कि प्रसिद्ध कवियों द्वारा लिखी गयी हैं। हमने वर्गीकरण के लिए बाल साहित्य / काव्य के स्तर को कक्षाओं के आधार पर विभाजित किया है। क्योंकि कई बार पाठकों की माँग किसी विशेष स्तर वाली रचनाओं की होती है। इस संग्रह में क्रमशः कक्षा 1 से 5वीं तक की बाल-कविताएँ सम्मिलित की गयी हैं। हमारा मानना है कक्षा 5वीं के बाद बच्चे किशोरावस्था की और अग्रसर होने लग जाते हैं।

पहली कक्षा के स्तर की बाल कविताएँ

बाल कविता – नन्हा  राही

नन्हा मुन्ना राही हूँ। देश का सिपाही हूँ।
बोलो मेरे संग साथी, जयहिन्द।।

बाल कविता – अनार, आम

अ से अनार लाल-लाल। खाओ-पीओ करो कमाल।।
आ से आम रसीला है। कुछ हरा कुछ पीला है।।

इ से इमली ई से ईख। मानो सदा बड़ों की सीख।।
उ से उल्लू ऊ से ऊन। बंदर ने पहनी पतलून।।

ऋ से ऋषि, वन में तप करते। ज्ञान-ध्यान की बातें करते।।
ए से एक, ऐ से ऐनक। ताल में टर-टर गाए मेंढक।।

ओ से ओस, औ से औजार। समय कभी न करो बेकार।।
अं से अंगूर अ: है खाली। खाओ अंगूर, बजाओ ताली।।

बाल कहानियाँ पढ़ें।

बाल कविता – सब्जी खाओ

आलू बोला मुझको खा लो, मैं तुमको मोटा कर दूँगा।
पालक बोला मुझको खा लो, मैं तुमको ताकत दे दूँगा।
गोभी, मटर, टमाटर बोले, अगर हमें भी खाओगे।
खूब बड़े हो जाओगे।।

बाल कविता – चंदा मामा

चंदा मामा आओ ना।
दूध-बताशा खाओ ना।।
मीठी लोरी गाओ ना।
बिस्तर पर सो जाओ ना।।

बाल कविता – रसीला आम

पीला रंग-रंगीला आम।
होता बड़ा रसीला आम।।
चूसो-खाओ ताजा आम।
सभी फलों का राजा आम।।

बाल कविता – अक्षर ज्ञान

अनार सेहत खूब बनाए।
बीमारी में भी काम आए।।

आम है फलों का राजा।
खाना है तो जल्दी आ जा।।

इमली से चटनी बनती है।
खट्टी है अच्छी लगती है।।

ईख को कहते हैं गन्ना।
मीठा-मीठा होता गन्ना।।

उल्लू दिन में सोता है।
लेकिन रात में जागता है।।

ऊन के कपड़े पहना करो।
और सर्दी से बचा करो।।

ऋषि जपता राम का नाम।
पूजा करता सुबह-शाम।।

एड़ी में जो चुभ जाए काँटा।
दौड़ने से करो बाय और टाटा।।

ऐनक साफ दिखाती है।
धूल से आँख बचाती है।।

ओखली में कूटते हैं धान।
जो आते खाने के काम।।

माँ दादी होती हैं औरत
जो ममता की होती मूरत।।

अं

खट्टे-मीठे होते अंगूर
खाओ खूब उन्हें भरपूर।।

अः

— — — —

कबूतर गुटर गूँ करता है।
बहुत दूर तक उड़ता है।।

खरगोश के होते लम्बे कान।
जो आते सुनने के काम।।

गमले में खिलते हैं फूल।
पानी देना मत जाना भूल।।

एक वचन ये सुनो हमारा।
अपना घर है सबसे प्यारा।।

— — — —

साफ चम्मच लेते आना।
दादी जी को खीर खिलाना।।

बरसात से बचाए छाता
धूप में भी काम आता।।

जहाज हमें विदेश पहुंचाए।
सागर को पार करता जाए।।

झंडा है तिरंगा प्यारा।
सबसे अच्छा सबसे न्यारा।।

— — — —

लाल टमाटर लेते आओ।
सब्जी और सलाद में खाओ।।

बर्तन बनाना ठठेरे का काम।
काम करता है सुबह-शाम।।

मदारी डमरू बजाता है।
और बन्दर नचाता है।।

ढकते हैं बर्तन ढक्कन से।
स्लाइस खाते मक्खन से।।

— — — —

गर्मी में तरबूज मिलता है।
और वह अच्छा लगता है।।

थरमस में पानी रहता कूल।
मैं ले जाता हूँ रोज स्कूल।।

सुन्दर दवात दादी जी लायी।
भरो पेन में करो लिखाई।।

धनुष राम ने तोड़ा था।
सीता से नाता जोड़ा था।।

नल में पानी आता है।
सबकी प्यास बुझाता है।।

— — — —

पतंग हवा में लहरती जाए।
मेरे मन को खूब लुभाए।।

जो बच्चा फल खाता है।
ताकतवर हो जाता है।।

बस हमें लेने को आती।
समय पर स्कूल पहुंचाती।।

भालू को मदारी नचाता है।
हमको खेल दिखाता है।।

मछली जल की रानी है।
जीवन उसका पानी है।।

— — — —

यज्ञ करके मिट जाते पाप।
वातावरण भी होता साफ।।

रथ पर होकर आज सवार।
चले सैर पर राजकुमार।।

बच्चे लटटू घुमा रहे हैं।
खुश हो ताली बजा रहे हैं।।

वर्षा जब भी आती है।
मौसम ठंडा कर जाती है।।

— — — —

शलगम खाकर सेहत बनाओ।
और साथ में स्वाद बनाओ।।

षट्कोण में होते छह कोण।
बात करो मत बैठो मौन।।

सपेरे की पिटारी में साँप।
इसे देख मत डरना आप।।

झूम-झूम कर हाथी आता।
बच्चों का वह मन बहलाता।।

— — — —

क्ष

क्षत्रिय योद्धा होता है।
कभी न साहस खोता है।।

त्र

शंकर जी त्रिशूल रखते हैं।
पापियों का वध करते हैं।।

ज्ञ

ज्ञानी को होता है ज्ञान।
जान सके जो लेना जान।।

बाल कविता – अच्छी शिक्षा

सुबह सवेरे उठना अच्छा।
नित्य कर्म के बाद नाश्ता करना अच्छा।।
ठीक समय पर पढ़ना अच्छा।
नहीं किसी से लड़ना अच्छा।।

बाल कविता – चिड़िया

चिड़िया बोली कुट-कुट-कुट।
मुझको दे दो, दो बिस्कुट।।
भूख लगी है खाऊँगी।
खा पीकर सो जाऊँगी।।

बाल कविता – मछली

मछली जल की रानी है।
जीवन उसका पानी है।।
हाथ लगाओ डर जाएगी।
बाहर निकालो मर जाएगी।।

बाल कविता – बिल्ली मौसी

बिल्ली मौसी, बिल्ली मौसी, कहो कहाँ से आई हो?
कितने चूहे मारे तुमने, कितने खाकर आई हो?

बाल कविता – सूरज भैया

सूरज भैया, सूरज भैया, क्या मम्मी ने डाँटा है।
गाल तुम्हारे लाल हैं, लगता खाया चाँटा है।।

बाल कविता – तितली

सुबह सवेरे आती तितली।
फूल-फूल पर जाती तितली।
रंग-बिरंगे पंख सजाए।
सबके मन को भाती तितली।।

बाल कविता – मोर

नाच मोर का सबको भाता।
जब वह पंखों को फैलाता।।
घटा देखकर खुश हो जाता।
घूम-घूमकर नाच दिखाता।।

बाल कविता – सड़क

सड़क बनी है लंबी चौड़ी।
उस पर चलती मोटर दौड़ी।।
सब बच्चे पटरी पर आओ।
बच्चे सड़क पर कभी न जाओ।।

बाल कविता – सूरज, चाँद, तारे

सुबह हुई तो सूरज चमका, रात हुई तो तारे।
चाँद चमकता प्यारा – प्यारा, झिलमिल -झिलमिल तारे।।

बाल कविता – तोता

हरा-हरा मैं तोता हूँ।
डाली पर चढ़ सोता हूँ।।
देख गुलेला माली का।
टें-टें कर उड़ जाता हूँ।।

बाल कविता – भालू आया

भालू आया, भालू आया।
ठुमक-ठुमक कर नाच दिखाया।।
खेल मदारी दिखा रहा है।
डम-डम डमरू बजा रहा है।।
खुश होकर सब देख रहे हैं।
ठन-ठन पैसे फेंक रहे हैं।।
भर दी है पैसों से थाली।
बच्चे बजा रहे हैं ताली।।

बच्चों के लिए कहानियाँ।

बाल कविता – बरखा रानी

बरखा रानी जल्दी आओ ना।
पानी की बूँदें बरसाओ ना।।
धरती की प्यास बुझाओ ना।
जंगल को हरा-भरा बनाओ ना।।
बरखा रानी जल्दी आओ ना।।

बाल कविता – हिंदी स्वर

अ आ इ ई
प्यारी पिंकी
दौड़ी – दौड़ी
पहुँची पौड़ी
खाई बाल मिठाई
सब कुछ दिया दिखाई।

उ ऊ ए ऐ
बूढ़े जिस पै
झुककर चलते
आँखें मलते
पहुँचे दूर त्रिचूर
गपक गए अंगूर।

ओ औ अंगा
बालक नंगा
मन को मारे
हिम्मत हारे
कैसे लूँ गुब्बारे
एक नहीं लूँ सारे।

अं अ: आहा
सब कुछ चाहा
सागर गहरा
पक्का पहरा
लहरों की क्या गिनती
भीलपुरी दो विनती।

बादल गाएँ
गरबा नाचें
पूरब-पश्चिम
उत्तर-दक्षिण
देश हमारा घर है,
यह कितना सुंदर है!

कवि – डॉ० राष्ट्रबंधु

दूसरी कक्षा के स्तर की बाल कविताएँ

बाल कविता – आम

गरमी आई, लाई आम। मीठे – मीठे लगते आम।।
कई तरह के होते आम। छोटे-बड़े रसीले आम।।

माँ कहती है खा लो आम। मुझको अच्छे लगते आम।।
सभी फलों का राजा आम। सबके मन को भाता आम।।

बाल कविता – चंदा मामा

चंदा मामा, चंदा मामा। तू है सब बच्चों का मामा।।
रोज रात को आता मामा। प्यारा है तू चंदा मामा।।

अँधेरा रात का तू हर लेता। और धरा शीतल कर देता।
रात दूध-सी तू कर देता। रोशन दुनिया को कर देता।।

तेरी चाँदनी प्यारी-प्यारी। सारी दुनिया से वह न्यारी।।
तेरी रोशनी सबको भाती। अँधेरे में राह दिखाती।।

चंदा मामा, चंदा मामा। तू है सब बच्चों का मामा।।

बाल कविता – पढ़ने जाऊँगी

पापा, मुझे किताब दिला दो, मैं भी पढ़ने जाऊँगी।
भैया के संग जाऊँगी मैं, भैया के संग आऊँगी।।

नई नई बातें पढ़कर जब, भैया घर पर आता है।
मैं उसको तकती रहती हूँ, वो ज्यादा इतराता है।।

भैया जैसा पढ लिखकर, भैया जैसी बन जाऊँगी।
जब भेजोगे पढ़ने मुझको, रानी बेटी कहलाऊँगी।

बाल कविता – तितली रानी

तितली रानी, बड़ी सयानी। पंख फैला करती मनमानी।।
तू है पंखों की महारानी। तेरी हलचल बड़ी सुहानी।।

रंग-बिरंगी सुंदर है तू। सबके मन को हरती है तू।।
फूल फूल पर उड़ती है तू। परी लोक से आती है तू।।

तेरा आना सबको भाता। तेरा प्यारा रूप लुभाता।।

कवि – विष्णु कविरत्न

बाल कविता – हाथी

हाथी आता धमक-धमक कर। पेड़ों को खाता लपक-लपक कर।।
चलता जब धरती हिलती है। भूकंप आया हो जैसे यहाँ पर।।

लंबी सूंड, आँख छोटी-सी। छोटी पूँछ, तोंद मोटी-सी।।
दिन भर कितना खाता हाथी। किसी को नहीं बताता हाथी।।

शरीर बड़ा, मन भोला। सबका प्यारा साथी हाथी।।
नदी तालाब मिल जाए इसको। भर-भर सूंड नहाता हाथी।।

कवि – अशोक कुलहरि

बाल कविता – सड़क

भीड़ सड़क पर चलती है। दाएँ चलना गलती है।।
चाहे बात करते चलो। अपने बाएँ हाथ चलो।।

अगर बड़ों के साथ चलो। पकड़ उनका हाथ चलो।।
चोट नहीं तुम खाओगे। समय से घर आ जाओगे।।

बाल कविता – बंदर और माली

बगीचे में बंदर आए ।
उछले कूदे शोर मचाए।।
पेड़ पर चढ़कर अंगूर खाए।

माली आया।
डंडा लाया।।

दुम दबाकर बंदर भागे।
माली पीछे बंदर आगे।।

बाल कविता – चूहेराम

रख कंधे पर एक बंदूक, चूहेराम झटपट चले।
बिल्ली से बदला लेने, चाहे कहीं भी मिले।

छप्पर पर धूप सेंकती, बिल्ली उसे मिली।
देख उसे चूहेराम की, बांहें खूब खिली।

लिया निशाना नेत्र मूँदकर, तभी हुआ ऐसा खटका।
बिल्ली ने देखा चूहेराम, अपने नेत्र लिए मटका।

फेंक बंदूक, जान बचाकर, चूहेराम तेज भागे।
बिल्ली से बदला लेने, फिर न चूहेराम आए आगे।

बाल कविता – श्यामलू बंदर

कूदा जो डाल से तो गिरा ताल के अंदर।
जब ताल में उछला तो फँसा जाल के अंदर।।

जब जाल से छूटा , पड़ा जंजाल के अंदर ।
जंजाल से भागा, न रहा खाल के अंदर ।।

है कितना जाँनिसार, मेरा श्यामलू बंदर ।
आगे का किस्सा, तुम्हें सुनाएगा कलंदर।।

कवि – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

बाल कविता – आओ खेलें होली

गोपाल आओ हम सब मिलकर खेलें होली।
एक-दूसरे पर छोड़ेंगे बना रंगों की गोली।

जितना चाहो गुलाल लगा दो, खड़ा सामने तुम्हारे गोपाल।
वाह, यह भी खूब रही भई,सोहन रंग डालेगा आज।

गोपाल सोहन खेलकर होली, दोनों फूले नहीं समाए।
और मित्रों को भी संग ले, दोनों होली में खूब हर्षाए।

बाल कविता – तोता जी की सीख

तोता जी ने खूब सिखाया, अच्छा – अच्छा गाना।
सब चिड़ियों ने सच्चे मन से, कहना उनका माना।।

लेकिन कौआ कभी न बैठा, कक्षा में चुप करके।
कुट-कुट खाता रहा निबौली, पेड़ों पर छिप करके।।

कोयल ने समझाया उसको, पर वह समझ न पाया।
कुहू-कुहू से उसको अपना, काँव-काँव ही भाया।।

सहपाठी की जिद से हारी, कोयल छिपकर गाती।
अपनी मीठी तान सुनाकर, सबका मन हर्षाती।।

कवि – डॉ० रामजी मिश्र

बाल कविता – सूरज

सूरज आग का गोला है। मुन्नू आकर बोला है।।
गरमी तो इतनी फैलाता। बस, घर में ही रहना भाता।

कैसे अब मैं पढ़ने जाऊँ। कैसे होम वर्क निबटाऊँ।।
भगवान छुटकारा दिलवा दो। इससे हमको मुक्त करा दो।।

चुन्नू आगे बढ़कर आया। मुन्नू को यूं ज्ञान पढ़ाया।।
इससे ही बादल बनते हैं। इससे ही मौसम बनते हैं।।

इससे ही फल-फूल लगेंगे। तरह-तरह के अनाज पकेंगे।।
इससे ही रोगी अच्छा हो। सुंदर तगड़ा हर बच्चा हो।।

कवयित्री – सरला

बाल कविता – घर पर आओ

आओ रोहन घर पर आओ। घर पर तुम समोसा खाओ।।
गोलू भोलू भी आ जाओ। सभी बैठकर डोसा खाओ।।

देखो देखो मोर भी आया। इसको अपने पास बुलाओ।।
देखो भालूवाला आया। सब मिलकर के ढोल बजाओ।।

रोली-मोली सब आ जाओ। सब मिलकर के बगिया जाओ।।
देखो देखो कोयल बोली। इसको अपना गीत सुनाओ।।

तीसरी कक्षा के स्तर की बाल कविताएँ

बाल कविता – मेहनत की बेला

सूरज की किरणें जब आतीं,
खिल जाती सब कलियाँ।
अंधकार मुँह छिपा भागता,
जगमग होती गलियाँ।।

चिड़िया छोड़ घोंसले चलती,
गाती मीठा गाना।
उठ जाओ अब तुम भी प्यारे,
निद्रा दूर भगाना।।

उठकर चलने की घड़ियाँ,
यह मेहनत की बेला है।
जिसने इनको गँवा दिया,
उसने बस दुख झेला है।।

बाल कविता – हवा और सूरज

हवा और सूरज में एक दिन, होने लगी बहस बढ़ – चढ़कर।
ताल ठोककर दोनों गरजे, मैं तुमसे बलवान हूँ बढ़कर।।

कौन किसे तब समझा सकता, जब दोनों में अहंकार भरा हो।
वहाँ लड़ाई पल – पल होती, जहाँ स्वार्थ – घमण्ड पसरा हो।।

ऊँची – ऊँची आवाजें सुन, शीतल चाँद वहाँ पर आया।
दोनों ही बलवान बहुत हो, फिर यह झगड़ा क्यों फैलाया?

तुम दोनों ही समझदार हो, दोनों जग की सेवा करते हो।।
इसी को सच्चा बल कहते हैं, फिर क्यों आपस में लड़ते हो?

बाल कविता – हम अनेक, किन्तु एक

हैं कई प्रदेश के,
किन्तु एक देश के,
विविध रूप – रंग हैं,
भारत के अंग हैं,
भारतीय वेश एक,
हम अनेक किन्तु एक।

बोलियाँ हजार हैं,
टोलियाँ हजार हैं,
कंठ भी अनेक हैं,
राग भी अनेक हैं,
गीत – भाव बोल एक,
हम अनेक किन्तु एक।

एक मातृभूमि है,
एक पितृभूमि है,
एक जन्मभूमि है,
एक कर्मभूमि है,
लक्ष्य है समक्ष एक,
हम अनेक, किन्तु एक।

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