हास्य कहानियाँ – लोटपोट कर देने वाली बकरूदीन की कथाएँ

जैसा कि आप जानते होंगे आजकल के तनावपूर्ण दौर में पाठक हास्य कहानियाँ या कॉमेडी बहुत पसंद करते हैं। उनकी इस माँग और रूचि को ध्यान में रखते हुए हमने यह हास्य कहानियों का संग्रह तैयार किया है। हास्य कथाओं के इस संकलन की खास बात यह है कि ये कहानियाँ छोटे बच्चे और बड़े लोगों के लिए, अर्थात सबके लिए मनोरंजक साबित होंगी। इसी आशा और विश्वास के साथ पाठकों की सेवा में यह संकलन पेश है।

हास्य कहानी – बकरूदीन और राहगीर

मोहम्मद बकरूदीन नाम का एक आदमी था। वह अपनी मस्ती में मस्त रहता था। उसके घर वाले उससे बहुत दुखी रहते थे क्योंकि वह बहुत मूर्ख था। एक दिन घर वालों ने नाराज होकर उसे घर से भगा दिया। नाराज होकर बकरूदीन बहुत दूर चला गया। वह एक जंगल में झोंपड़ी बनाकर रहने लगा। उसने अपनी झोंपड़ी जंगल में रास्ते के पास ही बनाई ताकि उसे बीहड़ – बियाबान जंगल में डर न लगे।

बकरूदीन को अपना गुजारा तो करना ही था। वह लकड़ियाँ काटता, उन्हें बेचता और अपना पेट भरता। एक दिन वह पेड़ पर चढ़कर लकड़ी काट रहा था और जिस डाल पर बैठा था उसी डाल को काट रहा था। रास्ते से एक भला आदमी जा रहा था। उस आदमी ने बकरूदीन से कहा कि आप इस डाल पर बैठकर लकड़ी मत काटो, नहीं तो गिर जाओगे।

बकरूदीन ने आदमी को धमकाया। चल बे! ज्यादा अकल लगा रहा है। मुझे बहुत दिन हो गए लकड़ी काटते , अब तक तो मैं गिरा नहीं। वह आदमी समझ गया कि यह कोई कमदिमाग आदमी है। वह आदमी अपने रास्ते चला गया।
थोड़ी देर बाद जैसे ही डाल कटी, बकरूदीन भी डाल के साथ-साथ धड़ाम से नीचे आ गिरा। अब उसको मालूम हुआ कि वह आदमी सही कह रहा था। बकरूदीन ने सोचा वह आदमी कोई ज्योतिषी होगा या कोई भविष्यवाणी करने वाला।

दोस्तो, इस हास्य कहानी (कॉमेडी कहानी) में अब आप पढ़ेंगे कि बकरूदीन किस प्रकार उस आदमी के पीछे पड़ गया। उससे किस तरह हँसाने वाली बातें की।

अब बकरूदीन उसी आदमी के पीछे दौड़ पड़ा। वह कुछ ही देर में उस आदमी के पास पहुंच गया और उससे कहा कि आप तो बहुत बड़े ज्योतिषी हो। आपने जैसा कहा, वैसा ही हुआ। मैं नीचे गिर गया था। अब आप मुझे ये और बताइए कि मेरी मौत कब होगी।

वह आदमी समझ गया कि यह पागल है। उस आदमी ने कहा – मुझे नहीं पता।

लेकिन बकरूदीन तो उसके पीछे ही पड़ गया। जब बकरूदीन ने बहुत देर तक उसका पीछा ही नहीं छोड़ा तो उस आदमी को गुस्सा आ गया। और अंत में उसने झल्लाकर कहा कि आपकी मौत कल तक हो जाएगी। जाओ मेरा पीछा छोड़ो और मुझे जाने दो।

फिर बकरूदीन ने कहा – ठीक है भाई। आपने मुझे यह बात बताई। अल्लाह आपका भला करे। मेरी थोड़ी सी मदद और कर दो।

उस आदमी ने कहा – क्या?

बकरूदीन – जब आपने मुझे ये बात बता ही दी है तो मुझे दफना के जाना।

उस आदमी ने अपना पीछा छुड़ाना चाहा और कहा – मेरे पास कल तक का समय नहीं है।

बकरूदीन – ठीक है तो। आप मुझे आज ही दफना दो। मैं कल अपने आप मर जाऊँगा।

वह आदमी समझ गया कि यह बहुत बड़ा मूर्ख है। फिर वह आदमी तेज दौड़ लगा के बकरूदीन से अपना पीछा छुड़ाकर भाग गया।

इस हास्य कहानी (Funny Story) में आगे बताया गया है कि बकरूदीन अपनी मूर्खता के कारण कैसे परेशान हुआ और क्या-क्या नाटक किए।

अब बकरूदीन को चिंता होने लगी कि यहाँ जंगल में तो मेरे साथ कोई नहीं रहता। मैं मर जाऊँगा तो मुझे दफ़नाएगा कौन? और मेरी कब्र कौन खोदेगा। बकरूदीन में दिमाग ही तो कम था, लेकिन मेहनती खूब था। उसने तुरंत अपनी कब्र खोदनी शुरू कर दी। पूरे दिन उसने कब्र खोदी, लेकिन उसे कब्र पर ढकने के लिए कोई सिल्ली, चौड़ा पत्थर या लकड़ी का तख्ता नहीं मिला। अंत में उसने सोचा कि कोई बात नहीं। मैं खुली कब्र में ही मर जाऊँगा। हवा भी लगती रहेगी। गर्मी का मौसम है।

दूसरे दिन होते ही बकरूदीन को अपनी मौत का इंतजार था। अब उसको मरने का भी बड़ा शौक लग रहा था क्योंकि उसने बड़ी मेहनत से अपनी कब्र खोदी थी। जब वह 12 बजे तक नहीं मरा तो उसे दिमाग में एक बात आई। यदि तू मर गया तो तुझे कब्र में लिटाएगा कौन? यहाँ तो तू अकेला है। तरह – तरह की बातें उसके दिमाग में आने लगी। फिर उसने सोचा कि क्यों न मैं खुद ही कब्र में जाकर लेट जाऊँ। जब मर जाऊँगा, तब ही ठीक।

यह सोचकर बकरूदीन कब्र में जा लेटा और तेज धुप में वहीं पड़ा रहा। कुछ खाया न पिया। जब शाम हो गयी तो उसने सोचा, पूरा दिन निकल गया। अब तो मैं मर ही गया होऊँगा। फिर वह अपने आप को मरा हुआ समझ कर पड़ा रहा।

शाम के समय उसी रास्ते से एक बुढ़िया जा रही थी। उसके पास बहुत सारा सामान था। सामान में बहुत वजन था इसलिए वह बुढ़िया परेशान हो गयी थी। वह बड़बड़ाती हुई जा रही थी – मुझे इस इस जंगल में कोई मदद के लिए मिल जाए तो बहुत अच्छा होगा।

यह बात बकरूदीन सुन रहा था। उसने कब्र में से ही कहा – दादी, आपकी मदद तो मैं कर देता। लेकिन क्या करूँ, मैं तो मरा पड़ा हूँ। बुढ़िया डर गयी। उसने सोचा यह कोई भूत, प्रेत की आवाज है। बुढ़िया चुपचाप चली गयी।

फिर बकरूदीन मरने के लिए रात भर भी उसी कब्र में पड़ा रहा। जब अगले दिन उसे बहुत तेज भूख लगी तो उसने सोचा – मैं मरा पड़ा हूँ, फिर भी मुझे भूख क्यों लग रही है। उसने सोचा कि शायद मैं अभी भी जिन्दा हूँ, वह आदमी झूँठ बोल रहा होगा। और फिर वह खड़ा होकर अपनी झोंपड़ी में चला गया।

हास्य कहानी – बकरूदीन की योजना

मोहम्मद बकरूदीन को बहुत भूख लग रही थी। लेकिन उसके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था। सौभाग्य से उसको एक आदमी आता दिखाई दिया। उस आदमी के पास दूध भरा मटका था। वह आदमी भी वजन के मारे थक चुका था। उस आदमी ने बकरूदीन से कहा – आप मेरे मटके को कुछ दूर पहुंचा दो। मैं पीने के लिए आपको कुछ दूध दे दूँगा। बकरूदीन तैयार हो गया।

बकरूदीन दूध का मटका सिर पर रखकर चल दिया। साथ में घड़ा वाला भी चल दिया। बकरूदीन ने सोचा कि अब मैं किसी के बहकावे में नहीं आऊँगा, जैसे कल एक आदमी की बातों में आकर कब्र खोदी थी। वह आगे की योजना बनाने लगा।

अब आप इस हास्य लघुकथा (Funny Short Story) में पढ़ेंगे कि बकरूदीन ने दूध वाले से मार क्यों खाई।

अब मैं दूध पीकर पहले तो अपनी भूख शान्त करूँगा। फिर लकड़ी काटूँगा। उन्हें बेचूँगा और एक मुर्गी का अण्डा खरीदूँगा। अण्डे में से बच्चा निकलेगा। उसको पाल के बड़ा करूँगा। फिर उसे बेचूँगा। फिर 5 – 6 अण्डे खरीदूँगा। फिर उनमें से बच्चे निकलेंगे। उनको पाल कर बड़ा करूँगा। फिर उन्हें बेचूँगा। फिर एक भैंस खरीदूँगा। वह दूध देगी। दूध बेचूँगा। उसके बहुत सारे बच्चे होंगे। फिर…..

इस तरह बकरूदीन ख्वाबों में खो गया।

फिर मैं शादी करूँगा। बच्चे होंगे। बच्चों की शादी करूँगा। बच्चों के भी बच्चे होंगे। सभी कमाएँगे। फिर एक हवाई जहाज खरीदूँगा। मैं उसे उड़ाऊँगा। बकरूदीन यह बात भूल गया था कि तब तक मैं बूढ़ा भी हो जाऊँगा।

बकरूदीन ख्वाबों में खोया हुआ था।

फिर लोग मेरे हवाई जहाज को उड़ता हुआ देखकर कहेंगे – देखो, बकरूदीन का हवाई जहाज!

हाँ, एक बात और! आज मौसम हवाई जहाज उड़ाने लायक है भी या नहीं। बरसात तो नहीं होगी। बादल तो नहीं हो रहे। उसने ऊपर देखा। और सिर पर रखा घड़ा – धड़ाम!!!

घड़ा जमीन पर गिरकर फूट गया। सारा दूध फैल गया। घड़े के मालिक ने बकरूदीन को खूब मारा। मालिक साथ में बड़बड़ा भी रहा था – ठीक-ठाक चल रहा था। एकदम से ऊपर देखने की क्या जरूरत थी।

इस प्रकार उसमें खूब मार लगी। और दूध तो फैल ही चुका था। मार खाकर बकरूदीन भूखा ही फिर अपनी झोंपड़ी में आ गया।

हास्य कहानी – हाथी का अण्डा

बकरूदीन ने सोचा कि अब मैं ऐसी योजना नहीं बनाऊँगा। हवाईजहाज तो बिलकुल नहीं खरीदूंगा। कोई फ्री में देगा तो भी नहीं लूँगा। हाँ, लेकिन कुछ तो करना ही पड़ेगा। पेट भरना भी जरूरी है। बहुत देर तक सोचने के बाद बकरूदीन को कोई दूसरा उपाय नहीं सूझा और वह भूखा ही लकड़ियाँ काटने चला गया।

जैसे – तैसे उसने लकड़ियाँ काटी और उन्हें बेचकर अपना पेट भरा। सौभाग्य से आज उसकी लकड़ियाँ थोड़ी महँगी बिकी। इसलिए कुछ खाने के बाद भी उसके पास दो रुपये बच गए।

दोस्तो, इस हास्य कहानी (funny story) में अब हम आपको यही बताने जा रहे हैं कि बकरूदीन ने अपने दो रुपयों का क्या किया।

अब बकरूदीन उन दो रुपयों को लेकर सोचता जा रहा था कि इन रुपयों से क्या खरीदूँ जिससे कुछ मुनाफा हो। चलते-चलते उसे रास्ते में एक तरबूज बेचने वाला मिल गया। बकरूदीन ने पूछा – ये क्या चीज बेच रहे हो भाई।

वह आदमी समझ गया कि यह कोई पागल आदमी है, जिसे तरबूज भी नहीं मालूम। लेकिन उसे तो अपने तरबूज बेचने थे। उनसे कहा – तरबूज बेच रहा हूँ।

बकरूदीन ने पूछा – ये क्या होता है?

अब उस आदमी को अपना पीछा तो छुड़ाना ही था। उसने सोचा, इस मूर्ख आदमी को सही बात बताऊँगा तो यह मेरा और ज्यादा समय खराब करेगा। इससे पीछा छुड़ाना ही बेहतर है। यह मेरे तरबूज खरीदे या नहीं। वह आदमी सोच ही रहा था कि बकरूदीन फिर से बोला – बताते क्यों नहीं? ये कौन से जानवर का अण्डा है।

उस आदमी ने तुरन्त जवाब दिया – ये हाथी का अण्डा है भाई।

अब तो हाथी के अण्डे का नाम सुनकर बकरूदीन बहुत उत्सुक हुआ और पूछा एक अण्डे में से कितने बच्चे निकलेंगे।

तरबूज वाले ने सोचा झूँठ – साँच बोलकर अब इससे किसी तरह पीछा छुड़ा लेना चाहिए। तरबूज वाला – एक अण्डे में से पाँच बच्चे निकलेंगे।

यह सुनकर बकरूदीन बहुत खुश हुआ। और उसने कहा मुझे दो रुपये का एक अण्डा दे दो।

उस ज़माने में एक रुपये के ही दो – तीन तरबूज आ जाते थे। लेकिन तरबूज वाले ने सोचा कि अच्छा मूर्ख हाथ पड़ा है तो इसके लिए दो रुपये का एक तरबूज देकर ही अपनी धाड़ी बना लूँ।

अब बकरूदीन दो रुपये में एक तरबूज खरीदकर चल पड़ा। लेकिन वह तो इसे हाथी का अण्डा समझ रहा था। कुछ देर बाद उसे प्यास लगी। वह पानी पीने के लिए कुँए के पास गया। जैसे ही उसने तरबूज रखा और कुँए में से पानी निकालने लगा तो तरबूज के पास से एक गिलहरी निकली। बकरूदीन ने सोचा ये ही है हाथी का बच्चा। इसी अण्डे में से निकला है।

वह बिना देरी किए हुए प्यासा ही उस गिलहरी के पीछे दौड़ पड़ा। खूब दौड़ा लेकिन गिलहरी उसके हाथ नहीं आई। आखिर में गिलहरी एक कंटीले पेड़ पर चढ़ गयी और बकरूदीन उसके पीछे-पीछे। गिलहरी को तो कोई दिक्कत नहीं हुई लेकिन बकरूदीन के शरीर में कई कांटे लग गए। उसे बहुत दर्द हुआ। फिर वह पेड़ से उतर आया और गिलहरी के उतरने का इंतजार करने लगा। क्योंकि वह तो उसे हाथी का बच्चा समझ रहा था।

अचानक बकरूदीन के दिमाग में एक बात आयी। उस अण्डे में से पाँच बच्चे निकलेंगे। ऐसा न हो, मैं इसी बच्चे के पीछे पड़ा रहूँ और बाकी चार बच्चे भी भाग जाएं। इसलिए मुझे फौरन अपने अण्डे के पास जाना चाहिए। हाथी के अण्डे और बच्चों की फिक्र में वह अपनी प्यास को भी भूल चुका था। अब उसने इस गिलहरी का पीछा छोड़ दिया और वापिस कुँए की ओर चल दिया।

कुँए पर पहुँचकर उसने सबसे पहले तो उस हाथी के अण्डे को देखा। अण्डा पूरी तरह साबुत था। कहीं से कटा-फटा नहीं। अब उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह बच्चा इसमें से निकल कैसे गया। यह सोचते हुए पहले तो उसने पानी पिया। फिर सोचने लगा कि यह अण्डा तो चमत्कारी है। इसमें से ऐसे ही बच्चे निकल जाते हैं। कहीं ऐसा न हो, इसमें से एक-एक करके सारे ऐसे ही निकलकर भाग जाएँ और मैं हाथ मलता रह जाऊँ। काफी उधेड़बुन के बाद वह उस अण्डे को फोड़ने बैठ गया।

उसने जैसे ही हाथी के अण्डे को फोड़ा तो उसमें से कोई बच्चा नहीं निकला। अन्दर से लाल था। क्योंकि वह तो तरबूज था। लेकिन बकरूदीन उसे हाथी का अण्डा समझ रहा था। उसने सोचा यह जो लाल-लाल है। उन बच्चों का खून है। वे मर गए हैं। मैंने इस अण्डे को फोड़कर बहुत बड़ी गलती की है। उसे बहुत पछतावा हुआ और उस तरबूज को वहीं छोड़कर अपनी झोंपड़ी की और चला गया।

थोड़ी देर बाद कुछ और लोग वहाँ आए और उन्होंने उस स्वादिष्ट तरबूज को जी भरकर खाया।

हास्य कहानी – नौकरी क्या है?

परेशान होकर मोहम्मद बकरूदीन ने सोचा कि लकड़ी काटने से तो उसका गुजारा भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है। हर बार नुकसान ही होता है। दूध वाले का घड़ा फूट गया, उसने खूब मार लगाई। फिर हाथी का अंडा खरीदा तो उसमें से एक बच्चा तो निकलकर भाग गया और बाकी मर गए। और हाँ, यहाँ झूँठ बोलने वाले भी बहुत आते हैं। उस आदमी ने मुझे बहका दिया। मैंने पूरे दिन कब्र खोदी। फिर भी नहीं मरा।

इस तरह उसने जंगल में बीती अपनी सभी घटनाएँ याद की और सोचने लगा कि अब मुझे जंगल में नहीं रहना चाहिए। किसी शहर में जाकर रहूँगा तो वो ही बढ़िया। कोई मुझसे झूंठ बोलेगा तो किसी और की राय ले लूँगा। कोई मारेगा तो कोई बचा भी लेगा।

इस हास्य कहानी में आप पढ़ेंगे कि बकरूदीन ने नौकरी के चक्कर में किस तरह मार खाई।

बकरूदीन यह सोच ही रहा था कि एक भला आदमी वहाँ से जा रहा था। बकरूदीन ने उससे कहा कि भाई मैं बहुत दुखी हूँ। मेरा गुजारा नहीं हो पाता है। पेट भरने के लिए मुझे कोई अच्छा-सा रास्ता बताओ।

उस आदमी ने कहा – आप किसी शहर में चले जाइये। वहाँ आपको कोई नौकरी दे देगा।

अब बकरूदीन ने सोचा कि नौकरी कोई सोने-चाँदी जैसी कीमती चीज होती है। तो उस आदमी से उसकी पहचान पूछने लगा – कैसा रंग होता है भाई उसका?

आदमी – मेरा मतलब है कि कोई आपको नौकरी पर रख लेगा।

अब बकरूदीन सोचने लगा कि नौकरी कोई आरामदायक चीज है। मुझे उस पर रखा जाएगा तो बड़ा आनन्द मिलेगा। लेकिन यदि किसी की चीज टूट-फूट गयी तो बहुत मार लगेगी। घड़े वाली बात याद आते ही उसके रोंगटे खड़े हो जाते। फिर बकरूदीन ने पूछा – कितनी बड़ी होती है वो। मुझे उस पर रखा जाएगा तो टूट तो नहीं जाएगी।

वह आदमी समझ गया कि यह पागल है। और वह चुपचाप पीछा छुड़ाकर चल दिया। अब बकरूदीन ने सोचा कि यह आदमी तुझे उस अच्छी चीज के बारे में बताना नहीं चाहता है। हो सकता है कि वह चीज इसी के पास हो। तभी तो इसे मालूम है। फिर उसने निश्चय किया कि वह इस चीज के बारे में जानकर रहेगा।

फिर क्या था? बकरूदीन उस आदमी के पीछे – पीछे चल दिया। चलते – चलते रात हो गयी। घना अँधेरा था। वह आदमी अपने घर पहुँच गया और बकरूदीन भी चुपचाप उसके घर में घुस गया।

रात में उस आदमी के बच्चों ने बकरूदीन को देख लिया और चोर समझकर उसमें खूब मार लगाई।

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