बहू बेटी की तरह होती है : कथन सत्य या असत्य

उक्त कथन बड़ा जटिल है बिल्कुल रेशम की तरह, आपस में उलझा हुआ। जिसे आसानी से सत्य या असत्य करार दे देना, बहू/बेटी/ माँ/सास की कोमल भावनाओं पर कुठाराघात होगा, क्योंकि यह कथनना तो पूर्णतः सत्य है ना ही असत्य। इसे समझने हेतु आइये जरा अपने दृष्टिकोण को विस्तृत रूप प्रदान करते हैं। कारण कि इनके मध्य जो विभाजन रेखा है वह कर्त्तव्य व अधिकार की प्राथमिकता से पृथकता प्राप्त करती है।कानूनी रूप से बालकजब 18 वर्ष की उम्र प्राप्त कर लेता है, तब स्वाभाविक रूप से उसके अधिकार,कर्तव्यों से पिछड़ जाते हैं। सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार की उससे अपेक्षाएँ की जाने लगती हैं, 18 वर्ष की उम्र के पश्चात् सामाजिक अपेक्षाओं के प्रतिकूल व्यवहार को अक्षम्य की श्रेणी में रख दिया जाता है। यह सहज स्वाभाविक, सामाजिक व्यवहार है जो कि सामाजिक व कानूनी रूप में मान्यता प्राप्त है।

आइये अब इसे बहू/बेटी के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। वर्तमान में जब कोई बिटिया बहू के रूप में रूपांतरित होती है। (कानूनी रूप में विवाह की उम्र लड़की हेतु 18 वर्ष अनिवार्य है।) अर्थात् जब कोई बेटी विवाह के पश्चात् बहू रूप में स्वीकारी जाती है, वह 18 वर्ष की आयु प्राप्त कर चुकी होती है। इस आयु के पश्चात धिकार कर्त्तव्य आपूर्ति की अपेक्षा की जाती है। कर्तव्यों की इतिश्री ही उसे बेटी-सा अधिकार/स्वीकारण दिला पाती है। अन्यथा विवाह वेदी से बहू रूप में तो उसे स्वीकार कर ही लिया होता है। फिर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में परिवारों में बेटे-बेटियों की परवरिश समान आकार प्राप्त कर चुकी है। बालकों की संख्या भी एक दो तक सीमित हो चुकी है। ऐसे में व्यवहारिक अपेक्षाओं का परिवर्तित होना ही है। पुरुष प्रधान समाज है तो पुरुषों की स्थिति महिलाओं से सुदृढ़ होना स्वाभाविक है। बेटियाँ उसे समझे बगैर अपने अधिकारों की अपेक्षा ससुराल पक्ष से अनजाने ही कर बैठती हैं। ऐसे में जो अधिकार उन्हें प्राप्त है, वे उन्हें कमतर समझे बगैर किसी विशेष समस्या से भी उद्वेलित हो बैठती है। जैसा कि अपने मायके में भी हो ही जाया करता है, पर माँ चुपचाप सहन करने को बाध्य हो जाती है, कारण मात्र यह कि बेटी का गलत व्यवहार उसकी माँ के संस्कारों पर भी प्रश्नवाचक चिह्न अनजाने में ही लगा देता है। ऐसे में माँ स्वयं को कटघरे में खड़ा पाती है। यही कारण है कि वह कुछ कह नहीं पाती। माँ की चुप्पी मजबूरीवश होती है। इन परिस्थितियों में माँ रूपी सास अस्वीकरण सहज ही प्रकट कर देती है और वह रिश्ता माँ-बेटी की जगह सास-बहू करार पा जाता है। दूसरी तरफ अपनी एकलौती बहू को अपना राजदार अपनी बेटी बनाने के चक्कर में ढे़र सारा प्यार उडे़लती है सास, और साथ ही अनेकानेक अपेक्षाएँ भी।

जरा-सी चूक या अपेक्षाओं में कोताही उसका रौद्र रूप प्रकट कर बहू/बेटी के मध्य दीवार खड़ी कर देता है। माँ-बेटी अपेक्षाओं की अधिकता के कारण सास-बहू का रूप अनजाने में ही अख़्तियार कर लेती है। इस तरह हम पाते हैं कि बहू बेटी की तरह ही होती है, स्वीकारी भी जाती है। मगर अपेक्षाओं के चलते माँ-बेटी रह नहीं पाती है। बेटियों की अपेक्षाएँ जो अपनी माँ से होती है, पुरुष रूपी पति के साथ दस गुणा बढ़ जाती है। इसमें आज टी.वी. के कार्यक्रम बहुत अहम्भू मिका का निर्वाह कर रहे हैं, अक्सर ही देखा जाता है। नई नवेली बहू पति के साथ पूर्ण साज-श्रृंगार कर सिर्फ़ रोमांस करती दिखाई देती है। सारा घर परिवार उन्हें हथेलियों पर उठाये रखता है बगैर किसी कर्त्तव्य की आपूर्ति किये।यहाँ समस्या पैदा हो जाती है –

  •  पहली तो मर्यादाओं का उल्लंघन परिवारों में स्वीकार्य नहीं।
  • बहू से परंपराओं के निर्वाह की अपेक्षा। अक्सर ही स्त्रियाँ अपनी पारिवारिक परंपराओं को बनाये रखने की अपेक्षा बहू रूपी बेटी करती है। यदि उन परंपराओं के निर्वहन में बहू शामिल हो जाती है तो बेटी रूप में सहज स्वीकार्य हो जाती है। आज के शिक्षित परिवारों में यथासंभव सहयोग भी बहुओं को प्राप्त होता है। (जो कि कुछ वर्षों पूर्व तक नहीं था।) कई बार परंपराओं में आवश्यक शिथिलता भी प्राप्त हो जाती है। उसके बावज़ूद भी बहू उन्हें नहीं बनाये रख पाये तो वह बहू मात्र ही रह जाती है।
  • बेटी को पराया माना जाता है और बहू को अपना। यह भी एक सशक्त कारण है कि बेटी की तुलना में बहू से कुछ अधिक अपेक्षाएँ होती हैं जो कि बहू-बेटी के मध्य अनजाने ही दीवार खड़ी कर देती है। अपेक्षाओं की कमी के चलते उसे अपने माता-पिता अधिक अच्छे महसूस होते हैं। तुलनात्मक रूप में अतः स्वयमेव ही पति की माँ क्रूर सास ही दिखाई देती है।
  • सास एवं बहू के पूर्वाग्रह भी यहाँ सशक्त कारक हैं। इस रिश्ते में माँ-बेटी सी तरलता के निर्वहन नहीं हो पाने का।
  • रजत पटल पर कृत्रिम व्यवहार की प्रस्तुति इतनी आकर्षक होती है कि सास व बहू दोनों ही बड़ी सहजता से उनकी गिरफ़्त में आ अपने रिश्ते में माँ-बेटी सा सौहार्द महसूस नहीं कर पाती। (कारण कि आज हमारे घरेलू कार्य, इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों की सहायता से कम समय में ही पूर्ण हो जाते हैं व परिवार का आकार छोटा होने से भी हमें पर्याप्त समय रजत पटल के कार्यक्रमों का लुत्फ उठाने हेतु प्राप्त हो जाता है।वर्तमान में रजत पटल हमारे दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग-सा स्थान प्राप्त कर चुका है। अंत में यही कहना चाहूँगी कि बहू बेटी ही होती है। मगर सास/बहू के परिप्रेक्ष्य में टिक नहीं पाती है।

 डाॅ० चेतना उपाध्याय

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