आधुनिक हिंदी कविता के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी – इतिहास और विकास

दसवीं शताब्दी से ही हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार आदि प्रदेशों के क्षेत्र में हिंदी भाषा बोली और लेखन के कामकाज में प्रयुक्त की जाती रही है। ब्रज, बुन्देली, बाँगरू, कन्नौजी, खड़ीबोली, अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, पहाड़ी आदि हिंदी भाषा की प्रमुख बोलियाँ हैं। इन सभी बोलियों में लिखा गया साहित्य हिंदी साहित्य कहलाता है। हिंदी में पिछले एक हजार वर्ष से जो साहित्य लिखा गया हैं उसको मुख्यत: तीन कालों में बाँटा गया है। आदिकाल (11वीं से 14वीं शताब्दी), मध्यकाल (15वीं से 19वीं शताब्दी के मध्य तक) और आधुनिक काल (19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से अब तक)। आदिकाल और मध्यकाल (जिसे प्रमुख रूप से दो भागों – भक्तिकाल और रीतिकाल में बाँटा गया है) में राजस्थानी, ब्रज, अवधी, आदि भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य रचा गया है, विशेष रूप से कविता में। किन्तु आधुनिक काल में हिंदी की खड़ीबोली प्रमुखता प्राप्त कर गई और हिंदी प्रदेश के अधिकांश साहित्यकार ब्रज, अवधी आदि के स्थान पर खड़ीबोली में साहित्य रचने लगे। पिछले ड़ेढ सौ वर्षों में खड़ीबोली में जितनी कविता रची गई उससे कई गुणा साहित्य गद्य की विविध विधाओं जैसे – उपन्यास, कहानी, नाटक, निबन्ध, आलोचना, संस्मरण, रिपोर्ताज, आत्मकथा, जीवनी आदि में रचा गया। प्रस्तुत लेख आधुनिक युग में रची गई केवल कविता विधा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए यहाँ पृष्ठभूमि के रूप में आधुनिक कविता का संक्षिप्त विकास क्रम प्रस्तुत किया जा रहा है।

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हिंदी की आधुनिक कविता ने अपनी यात्रा भारत के पुनर्जागरण काल अर्थात् 19वीं शताब्दी के मध्य से प्रारंभ की है जो अब तक जारी है। लगभग ड़ेढ सौ वर्षों की इस काव्य-यात्रा को काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियों के आधार पर निम्नांकित युगों में बाँटा गया है –

  1. भारतेन्दु युग
  2. द्विवेदी युग
  3. छायावाद
  4. छायावादोत्तर स्वच्छंद काव्य
  5. प्रगतिवाद
  6. प्रयोगवाद / नई कविता
  7. साठोत्तरी एवं समकालीन कविता।

हम इस लेख में इन युगों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

भारतेन्दु युग (सन् 1857 से 1900 तक)

भारत के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं साहित्य तथा कलात्मक जीवन में आधुनिकता का अविर्भाव 19वीं शताब्दी के मध्य से एक साथ प्रारम्भ होता है। मध्यकाल की सामंती एवं धर्मरूढ मान्यताओं के विरुद्ध समता, स्वतंत्रता एवं वैज्ञानिक भाव बोध का उन्मेष हुआ। ज्ञान – विज्ञान एवं  औद्योगीकरण के फलस्वरुप चिंतन एवं साहित्य में भी बौद्धिकता, विवेकशीलता का आग्रह बढा। इस प्रकार आधुनिक युग भारत के पुनर्जागरण काल के रूप में अँगड़ाई लेता है तथा फिर यह पश्चिम के प्रभाव को ग्रहण करता हुआ अपने नवीन भाबबोध को जन्म देता है जिसका प्रभाव भारतीय समाज के आधुनिक युग में सभी क्षेत्रों में दिखाई देता है।

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आधुनिक युग में हिंदी के प्रथम समर्थ साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र के समय तक मुग़ल बादशाही का पतन और ईस्ट इंड़िया कंपनी का उदय हो चुका होता है। भारत की जनता एक गुलामी के बाद दूसरी गुलामी में फंसती जाती है। इस प्रकार की राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक गुलामी के विरुद्ध प्रार्थना समाज, ब्रह्म समाज, आर्य समाज, विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस आदि के माध्यम से पुनर्जागरण की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। इसी दौड़ में भारतेन्दु एवं उनके समकालीन कवि हिंदी कविता में भी नई चेतना फूंकते हैं। वे हिंदी कविता को रीतिकालीन प्रवृत्तियों – दरबारीपन, नायक – नायिका भेद, चमत्कार प्रियता, रीति निरूपण आदि के बंद धेरे से निकालकर मातृभूमि प्रेम, स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, बाल-विवाह निषेध, विधवा विवाह, शिक्षा-प्रसार, छुआछूत विरोध, स्वधर्म की चिन्ता, निजभाषा उन्नति आदि नए विषयों की ओर मोड़ देते हैं। हिंदी कविता पहली बार आम जनता की समस्याओं से रूबरू होती है। भारतेन्दु के साथ-साथ बदरीनारायण प्रेमधन, प्रतापनारायण मिश्र, ठाकुर जगन्मोहन सिंह, श्री धर पाठक, बालमुकुन्दु गुप्त आदि कवियों ने सामाज सुधार और राष्ट्रीयता की भावना जगाने वाली कविताओं की रचना की। भारतेन्दु ने बिगुल बजाया…

अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी
पै धन विदेस चल जात यहै अति ख्वारी!

और सामाजिक – आर्थिक विसंगतियों पर हास्य व्यंग्यात्मक कविताओं की बौछार होने लगी। हिंदी कविता में एक साथ इतनी क्रांतिकारी तब्दीली आई कि ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ीबोली आ गई, कविता का माध्यम ही बदल गया। कजरी, बिरहा, मल्हार, ठुमरी, लावनी, होली आदि छंद अपनाए गए। पैरोड़ी, गाली, ग़जल, व्यंग्योक्तियाँ  काम में ली जाने लगी। कविता उपदेशात्मक भी हुई पर कविता को ठोस विषयवस्तु मिली, इतिवृत्तात्मकता आई किन्तु वर्ण्य विषय की विविधता भी रही।

दरअसल भारतेन्दु युग हिंदी कविता की नई जमीन तोड़कर पैदा हुआ, उसने मध्यकालीनता से एक नया मोड़ लिया तथा कविता को यथार्थ से जोड़कर उसके सामने नई – नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी। इस नवीनता के विस्फोट से कविता का शिल्प अनघड़-सा तो रहा किन्तु इसने आगे की कविता के समृद्ध भविष्य की मजबूत नींव रखी। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि कविता से अधिक नाटक, निबन्ध, पत्रकारिता आदि के क्षेत्र में खड़ीबोली ने अपना विकास किया और इस गद्य में मंजी – निखरी भाषा ने आगे द्विवेदी युग की कविता के लिए भाषाई पृष्ठभूमि तैयार की।

द्विवेदी युग (सन् 1900 से 1918 तक)

भारतेन्दु युग की कविता के पुनरुत्थानकारी सभी सूत्रों को आगे द्विवेदी युग ने संभाला। भाषा एवं साहित्य की गहरी समझ रखने वाले महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम से यह युग संबोधित किया गया। इस युग में एक ओर तो द्विवेदी जी के नेतृत्व में हिंदी भाषा का योजनाबद्ध रूप से परिष्कार किया गया और उसका मानक रूप विकसित करने की कोशिश की गयी, दूसरी ओर कविता में सांस्कृतिक विषय वस्तु को अधिक महत्ता दी जाने लगी। पौराणिक विषयों पर आधुनिक भाव – बोध के साथ प्रबन्ध काव्य अधिक लिखे गए। राष्ट्रीयता का स्वर अधिक व्यापक एवं तीखा हुआ। ‘सरस्वती’ पत्रिका जिसका सम्पादन महावीर प्रसाद द्विवेदी ने किया, साहित्य के नए आन्दोलन की धुरी बन गई। स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, विदेशी का बहिष्कार, राष्ट्रीय एकता, साम्प्रदायिकता का विरोध, सामाजिक कुरीतियों एवं गरीब किसानों के दुखों का चित्रण किया जाने लगा। ईश्वर, अवतार एवं राजा के स्थान पर सामान्य मनुष्य पर कविता लिखी जाने लगी। भारतीय नारियों के चरित्रो को नवीन उद्भावनाओं के साथ प्रस्तुत किया गया।

इस युग में कविता में साकेत और प्रियप्रवास महाकाव्य, रंग में भंग, जयद्रथ वध, वैदेही वनवास, प्रेम-पथिक जैसे खंडकाव्य तथा प्रभूत मात्रा में गीति काव्य रचे गए। इस युग के अधिकांश कवियों ने संस्कृत की तत्सम शब्दावली से युक्त भाषा का प्रयोग किया तथा संस्कृत के छंदों एवं अलंकारों को भी प्रयुक्त किया। इस प्रकार भाषा में एक ओर संस्कृत काव्यधारा, दूसरी ओर उर्दू शब्दावली और काव्य रूढियों का तथा तीसरी ओर देशी बोलियों की अपनी चाल – ढाल का संगम हो रहा था और हिंदी को एक समृद्ध भाषा के रूप में चुना जा रहा था।

द्विवेदी युग भाषाई समृद्धि के बावजूद काव्यात्मक दृष्टि से वर्णनात्मकता एवं इतिवृत्तात्मकता में ही अधिक रमा रहा इसलिए इस युग की कविता में यथातथ्य या इतिवृत्त का चित्रण अधिक है। काव्यतत्व की न्यूनता की ऐसी कसक इस युग की कविता में महसूस होती है।

इस युग के प्रमुख कवियो में अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, राय देवीप्रसाद पूर्ण, नाथूराम शंकर, रामनरेश त्रिपाठी निराला, जगन्नाथदास रत्नाकर, गयाप्रसाद सनेही, लाला भगवान दीन, रामचरित उपाध्याय, गिरिधर शर्मा नवरत्न, सियारामशरण गुप्त, लोचनप्रसाद पाण्डेय आदि हैं।

छायावाद (सन् 1918 से 1936 तक)

द्विवेदीयुगीन कविता सामाजिक उपयोगिता, स्थूलता, इतिवृत्तात्मकता की कविता थी। इसके समानांतर श्रीधर पाठक, मुकुटधर पांडेय, रामनरेश त्रिपाठी निराला आदि की कविता में आत्मनिष्ठा, प्रगीतात्मकता आदि के माध्यम से स्वच्छंदतावादी प्रवृत्तियां उभर रही थीं। जिनका विकास आगे छायावाद में हुआ। इस युग का नाम किसी रचनाकार विशेष के नाम से न निर्धारित कर काव्य प्रवृत्ति के नाम से चल पड़ा। प्रारंभ में छायावाद का अर्थ ऐसे काव्य से लिया गया जिसके अर्थ में एक धुंधलापन हो, छाया की तरह अस्पष्टता-सी हो या जिसमें अज्ञात सत्ता की छाया आभासित हो। इस तरह विषयवस्तु एवं अभिव्यक्ति में रहस्यमय अभिव्यक्ति वाले काव्य के नाम से शब्द तो चल पड़ा किन्तु कालांतर में छायावाद के नाम पर ऐसा साहित्य लिखा गया जिसमें प्रकृति, प्रेम, सौंदर्य और मानवीय अस्मिता को लाक्षणिकता सूक्ष्म बिम्ब प्रधान, मूर्त के लिए अमूर्त एवं अमूर्त के लिए मूर्त प्रतीक, विशेषण विपर्यय, मानवीकरण, कोमल – कान्त  पदावली के द्वारा व्यक्त किया गया। प्रसाद और महादेवी आदि ने फिर छाया शब्द की वैसी ही व्याख्याएँ भी की। जयशंकर प्रसाद ने झरना, आँसू, लहर और कामायनी रचकर सुमित्रानंदन पंत ने वीणा, पल्लव, गुंजन लिखकर, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने परिमल, गीतिका, तुलसीदास, मणि, बेला का प्रणयन करके तथा महादेवी वर्मा ने नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा आदि कृतियों की सृष्टि करके हिंदी कविता को भाव एवं अभिव्यक्ति दोनों दृष्टियों से इतना समृद्ध कर दिया कि यह युग आधुनिक हिंदी कविता का स्वर्णकाल कहा जाने लगा।

छायावाद की सामाजिक-राजनैतिक पृष्ठभूमि में एक और ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दमन-नीति, शोषण का माध्यम बनकर आया ज्ञान-विज्ञान, बौद्धिकता, तकनीकी और औद्योगिक विकास, पाश्चात्य शिक्षा एवं संस्कृति का बढ़ता दबदबा तथा भारतीय मध्यवर्ग के अंधविश्वासी, दमघोटू, कुंठित मनोभाव थे। इन स्थितियों से इस युग के कवि निराशा, उदासीनता, विवशता तथा घुटन भरे वातावरण में अपनी अंतर्वृत्तियों के प्रति अधिक संवदेनशील होते गए। अत: यह साहित्य, व्यक्तिनिष्ठता तथा कल्पना प्रधानता का साहित्य था। किन्तु इस साहित्य ने वैयक्तिक अनुभूतियों को जिस सूक्ष्मता, कल्पनाशीलता और दार्शनिक सोच के साथ प्रस्तुत किया उससे यह साहित्य अपनी अभिव्ययित में मानव के उदास्त मूल्यों का साहित्य बन गया। इस साहित्य में भारतीय संस्कृति की जीवन्त परम्परा और राष्ट्रीयता की उदात्त आकांक्षा व्यक्त हुई है। छायावाद में जहाँ एक और निराशा और पलायन का स्वर है तो दूसरी और मानवता के प्रति शाश्वत प्रेम तथा नई मानव संस्कृति के सृजन का सपना भी।

छायावाद को उक्त चार रचनाकारों के अलावा रामकुमार वर्मा, बालकृष्ण शर्मा, नवीन, माखनलाल चतुर्वेदी, भगवतीचरण वर्मा, जगन्नाथप्रसाद मिलिंद आदि कवियों ने भी समृद्ध किया है। दरअसल छायावाद अपनी कल्पनाशीलता, सूक्ष्मता एवं लाक्षणिक प्रतीक विधान के कारण अभिव्यक्ति की ऐसी प्रवृत्ति बन गया कि यह प्रवृत्ति छायावाद के बाद के कवियों में भी किसी न किसी रूप में दबती-उभरती रही।

इस युग में नए छंदों का तो विधान हूआ ही, नए प्रतीकों, बिम्बों एवं विशेष रूप से अप्रस्तुत विधान को लेकर भी व्यापक प्रयोग हुए। भाषा संस्कृतनिष्ठ बनी, उसकी द्विवेदीयुगीन पुरुषता कोमलता में बदल गई, अभिव्यक्ति में गेयता आ गई, कविता में रस बस गया। इस युग का तो गद्य भी कवित्वमय हो गया।

छायावादोत्तर स्वच्छन्द काव्य (सन् 1936 से 1950 तक)

छायावाद के अवसान के समय ही, बल्कि समानान्तर भी हिंदी के कुछ अच्छे कवि छायावादी कल्पनाशीलता से भिन्न, जमीन से जुड़ी वैयक्तिक अनुभूतियों को एवं राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति दे रहे थे। हरिवंशराय बच्चन आदि ने हालावाद के नाम से निजी मौज-मस्ती का काव्य लिखा तो रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्राकुमारी चौहान, नरेंद्र शर्मा, रामेश्वर शुक्ल अंचल, केदारनाथ मिश्र आदि ने राष्ट्रीयतावादी उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। इस धारा की प्रमुख रचनाएँ हैं – मधुशाला, मधुकलश, निशा-निमन्त्रण, प्रणय-पत्रिका, सतरंगी, (बच्चन) रसवंती, सामधेनी (दिनकर) प्रवासी के गीत, प्यासा निर्झर, पलाश वन (नरेंद्र शर्मा) आदि। इन कवियों ने संवदेन एवं भाषा को आमजन के निकट लाने का प्रयास किया एवं हिंदी कविता का उत्कृष्ट कवि-सम्मेलनीय रूप भी दिया।

प्रगतिवाद

बीसवीं शताब्दी के तीसरे चौथे दशक में भारतीय राजनीति एवं जन-जीवन में मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। इस विचारधारा के अन्तर्गत काल्पनिकता एवं आध्यात्मिकता के विरोध में ठोस आर्थिक आधार को वरीयता दी जाती है तथा समाज के सर्वहारा वर्ग के पक्ष में एवं शोषक वर्ग के विरोध में काव्याभिव्यक्ति की जाती है। इस विचार का काव्यात्मक उन्मेष तो पंत ने ग्राम्या के गीतों में तथा निराला के भिक्षुक एवं तोड़ती – पत्थर आदि रचनाओं में देखा जा सकता है। किन्तु नरेन्द्र शर्मा, रामेश्वर शुक्ल अंचल, शिवमंगल सिंह सुमन, प्रकाशचन्द्र गुप्त, रांगेय राघव, नागार्जुन आदि कवियों ने व्यवस्थित रूप से भी कविताएँ लिखी। इस युग की प्रमुख रचनाओं में ग्राम्या (पंत), नए पत्ते, कुकुरमुत्ता (निराला), रक्त चंदन, अग्निशस्य (नरेन्द्र शर्मा), करीब (अंचल), युगधारा, सतरंगे पंखों वाली (नागार्जुन), पिघलते पत्थर, अजेय खण्डहर (रांगेय राघव), प्रलय सृजन, विश्वास बढ़ता ही गया (शिवमंगल सिंह सुमन), लोक और आलोक (केदारनाथ अग्रवाल) आदि हैं। इस युग की कविता ने मजदूरों, किसानों, शोषितों को काव्य का विषय बनाया। भाग्यवादिता, धर्म, ईश्वर, स्वर्ग आदि में अविश्वास व्यक्त किया, शोषित वर्ग की एकता स्थापित करने की इच्छा व्यक्त की गई, सम-सामयिक समस्याओं पर बेबाक, सीधी प्रतिक्रियाएं देने की प्रवृत्ति बढ़ी। भाषा आम बोल-चाल के नज़दीक लाने की कोशिश की गई। अलंकारों से परहेज़ किया गया। इस दौर की कविता में वामपंथी विचार का आग्रह इतना अधिक था कि काव्य के मानदंडों की उपेक्षा की गई। कविता में स्थूलता, सतहीपन, प्रचारत्मकता आने लगी। इसलिए सन 1940  के आसपास पनपा यह आन्दोलन 1950 तक आते – आते शिथिल पड़ गया किन्तु प्रगतिवादी कविता की इस दृष्टि ने आगे साठोत्तरी कविता को काव्यात्मक स्तर भी प्रदान किया तथा प्रगतिवादी दृष्टि से सपन्न रचनाओं से हिंदी कविता समृद्ध हुई जिसका विवेचन आगे किया जाएगा।

प्रयोगवाद / नई कविता (सन 1940 से 1960 तक)

प्रगतिवाद और प्रयोगवाद दोनों ही काव्य प्रवृत्तियां लगभग समकालीन ही थीं। 1943 में प्रकाशित तार सप्तक में प्रयोगवादी एवं प्रगतिवादी दोनों ही कवि स्थान पाए हुए थे। प्रयोगवादी काव्य धारा की पृष्ठभूमि में आधुनिक जीवन-दृष्टि, पश्चिमी सोच का प्रभाव, द्वितीय विश्वयुद्ध से उपजी अनास्था आदि हैं। प्रयोगवाद ही आगे चलकर नई कविता के रूप में स्थापित हूआ जिसमें अज्ञेय, धर्मवीर भारती, गिरिजाकुमार माथुर, गजानन माधव मुक्तिबोध, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, भवानीप्रसाद मिश्र, शमशेर बहादुरसिंह, नरेश मेहता, जगदीश गुप्त, त्रिलोचन शास्त्री, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, केदारनाथ सिंह आदि का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इन प्रयोगवादी कवियो में मुक्तिबोध, रामविलास शर्मा, शमशेर एवं सर्वेश्वर में मार्क्सवादी स्वर स्पष्ट हैं।

प्रयोगवाद और नई कविता में व्यक्तिवाद की प्रतिष्ठा, लघुमानव की स्वीकृति, अतियथार्थवाद, बौद्धिकता, क्षण का महत्त्व एवं रिक्तता-बोध, अनास्था, संशयाकुलता, प्रकृति चित्रण की प्रयोगशील एकात्मक दृष्टि आदि प्रवृत्तियाँ  दृष्टिगोचर होती हैं। प्रयोगवाद एवं नई कविता में अभिव्यक्ति के स्तर पर काफी प्रयोग हुए हैं। दरअसल ऐसे ही प्रयोगों के कारण इस काव्य-धारा का नाम प्रयोगवाद पड़ा। कविता को छंदों से मुक्त किया गया, भाषा में शब्दों के चयन एवं प्रयोग में नवीन अर्थ देने की कोशिश की गई। छायावाद के बाद अप्रस्तुत विधान में पुन: क्रान्तिकारी परिवर्तन आया, बिम्ब जन-जीवन से नए टटके तलाशे गए, भाषा में वैयक्तिकता इतनी आई कि वह दुरूह भी होती गई। किन्तु इन सबने हिंदी की काव्यात्मक सामर्थ्य को यथार्थ और सूक्ष्म बनाया। इस युग में संशय की एक रात (नरेश मेहता), अंधा युग एवं कनुप्रिया (धर्मवीर भारती), आत्मजयी (कुंवर नारायण) आदि प्रबन्ध काव्य भी रचे गए जिन्होंने आधुनिक भाव-बोध से सपन्न जीवन-मूल्यों को प्रतिष्ठा दी।

साठोत्तरी एवं समकालीन कविता (सन् 1960 से अब तक)

आजादी से 1960 तक का समय स्वतन्त्रता, समता और विकास के सपनों का दौर रहा है। सपना था कि उक्त सब कुछ आम – आदमी को मिलेगा। नई राजनीति जनता के प्रति संवेदनशील होगी, गरीब के हक में नई अर्थव्यवस्था होगी, इस तरह एक नए समाज का विकास होगा। किन्तु 1960 तक आते – आते और उसके बाद के वर्षों में राजनैतिक अस्थिरता, दुर्व्यवस्था तथा आर्थिक विषमता ने आम – आदमी के सामने जीवन संकट और मूल्य-संकट को बढ़ा दिया।

ऐसे में साहित्यकारों का वह सपना टूटा जो देश की स्वतंत्रता को ध्यान में रखकर लिया गया था। रचनाकारों का वर्तमान व्यवस्था से व्यापक मोह भंग हुआ और सामाजिक – राजनैतिक – आर्थिक क्षेत्र की हर स्तर की व्यवस्था के प्रति विद्रोह का स्वर उग्र हआ। छन्द की मुक्ति और नए-नए विषयों को नए-नए ढंग से अभिव्यक्त करने का जो प्रयोगधर्मी सिलसिला प्रयोगवाद एवं नई कविता में शुरू हुआ था वह अब प्रयोगपरकता से निकलकर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्र सामर्थ्य के रूप में शक्ति बन गया। बोलचाल और पत्रकारिता की भाषा पर शान चढ़ाकर उसे काव्य भाषा में प्रयुक्त किया जाने लगा। इस तरह सामाजिक एवं निजी यथार्थ को प्रगतिशील ढंग से प्रस्तुत करने का अन्दाज मजबूत हुआ। सन 1960 में बाद की कविता का मूल स्वर आम आदमी के लिए प्रतिबद्धता है। धूमिल, लीलाधर जगूड़ी, रघुवीर सहाय, वेणुगोपाल, कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, चंद्रकांत देवताले, गोरख पाण्डेय आदि कवियों ने इस कविता धारा को समृद्ध किया। राजस्थान में हरीश भादानी, नंद चतुर्वेदी, विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, जयसिंह नीरज, नन्दकिशोर आचार्य, तारा प्रकाश जोशी, जुगमंदिर तायल, विजेन्द्र, ऋतुराज आदि कवियों ने साठोत्तरी हिंदी कविता को समृद्ध किया। राजस्थान के समकालीन कवियो में भागीरथ भार्गव, हेमंत शेष, सावित्री डागा, सावित्री परमार, प्रभा वाजपेयी, मदन डागा, गोविन्द माथुर, नन्द भारद्वाज, कृष्ण कल्पित, हरीश करमचंदानी आदि कवि काव्य रचना में संलग्न रहे हैं।

सन् 1960 की कविता में मुख्य रूप से तीन धाराएँ बहती रही हैं। पहली धारा, अज्ञेय के सोच एवं अभिव्यक्ति के अन्दाज़ से जुड़े कवियों की रही जो कविता को उन्मुक्त अभिव्यक्ति मानते हैं तथा वैयक्तिक अनुभूतियों में उत्पन्न होने वाले आत्मसंघर्ष और कौंध को अभिव्यक्ति देने में कविता का लक्ष्य समझते हैं। इस धारा में अज्ञेय के अलावा अशोक वाजपेयी, रमेश चन्द्र शाह, नंदकिशोर आचार्य आदि प्रमुख हैं। दूसरी धारा उन कवियों की है जो मुक्तिबोध आदि वामपंथी सोच रखने वाले कवियों से प्रेरणा लेते रहे हैं और वे सर्वहारा एवं सामाजिक प्रतिबद्धता को केन्द्र में रखते हैं तथा राजनैतिक – सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध व्यवस्थित रूप में विद्रोह रख रहे हैं। इस धारा में धूमिल, पद्मधर त्रिपाठी, ऋतुराज, चन्द्रकांत देवताले, लीलाधर जगूड़ी आदि प्रमुख हैं। हिंदी कविता की तीसरी धारा नए गीतों और हास्य व्यंग्य रचनाओं की है जिसमें गीतकारों में शंभुनाथ सिंह, रमानाथ अवस्थी, गोपाल दास नीरज, वीरेन्द्र मिश्र, हरीश भादानी, ताराप्रकाश जोशी आदि का विशष योगदान है तथा हास्य व्यंग्य कविताओं के सृजन से बेढब बनारसी, हरिशंकर शर्मा, गोपालप्रसाद व्यास, बेधड़क बनारसी, वंशीधर शूल, अशोक चक्रधर आदि प्रमुख हैं।

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