नवीनतम रचनाएँ

लहू का रंग

नगरपालिका की घड़ी ने टन-टन कर चार घंटे बजाए थे। चार बज बए, रमेश हड़बड़ा कर उठकर बैठ गया। वह शौच आदि से निपटने चला गया। रमेश लौट कर आया तो उसने देखा कि अनवर अभी तक सोया पड़ा है। रमेश अनवर को झिंझोड़ते हुए बोला- जल्दी उठो अनवर, चार बज गये हैं। अगर बारामूला जाने वाली पाँच बजे की बस निकल गई तो दिन छिपने से पहले गाँव पहुँचना मुश्किल हो जायेगा। अनवर कुुछ देर तक अलसाया सा पड़ा रहा, फिर जमुहाई लेते हुए उठ खड़ा...

ब्रह्मांड

ब्रह्मांड जानने के लिए आप तथाकथित धार्मिक पुस्तकों की अपेक्षा विज्ञान का आश्रय लीजिए। इस सृष्टि में आप जो कुछ कंकड़,पत्थर,सोना, चाँदी आदि वस्तुएँ देख रहे हैं। सब परमाणुओं का संगठन है। परमाणुओं को संगठित होने में लाखों करोड़ों वर्ष लगते हैं। प्राय: हम समाचार पत्रों के माध्यम से पढ़ते है कि अमुक चीज़ या जीवाश्म एक दो या चार अरब पुराने हैं। लेकिन जब सृष्टि पर लेखनी चलानी पड़ती है तो बाईबिल या अंग्रेज़ी...

रौशनीवाला

लखनऊ के हजरतगंज इलाके के एक गेस्ट हाउस में बारात सज रही थी। बच्चे, बूढ़े और जवान- सभी अपनी-अपनी हैसियत के मुताबिक सज-धज रहे थे। कोई नया सूट निकाल रहा था, तो कोई ड्राईक्लीन किया हुआ। किसी की टाई की नाॅट खुल गयी थी, या कहिए, किसी ने शरारतन खोल दी थी और वह उसे बांधने में लगा हुआ था। नवविवाहित स्त्रियां तय नहीं कर पा रही थीं कि वे साड़ी पहनें या सूट! प्रौढ़ाएं अवश्य इस समस्या से उबर चुकी थीं, लेकिन...

मौहब्बत का पैगाम

रेहान नाम का एक लड़का मीलों दूर झीलों के शहर में पढ़ाई करने आता है। वो यहॉं युनिवर्सिटी की कॉलेज में पढता है मगर वो हॉस्टल में नहीं रह कर किराये के रूम पर अपने सहपाठी के साथ रहता है। हर रोज कक्षा में आता -जाता है मगर कुछ दिनों से वह बहुत खोया -खोया सा रहता हैं। रेहान किराए के मकान की दूसरी मंजिल पर रहता है लेकिन आज जब वह सीढियों से होते हुए बाहर निकल रहा था… उसकी नज़र एक खुबसूरत सी लड़की पर...

पद्मावती (पद्मिनी) की वास्तविक कहानी

विशेष : यह लेख हिन्दी की सुप्रसिद्ध पुस्तक “हिन्दी साहित्य का इतिहास” में से लिया गया है। मलिक मुहम्मद जायसी ये प्रसिद्ध सूफी फकीर शेख मोहिदी (मुहीउद्दीन) के शिष्य थे और जायस में रहते थे। जायसी का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है ‘पद्मावत’। जायसी अपने समय के सिद्ध फकीरों में गिने जाते थे। अमेठी के राजघराने में इनका बहुत मान था। जीवन के अंतिम दिनों में जायसी अमेठी से दो मील दूर एक...

व्यंगम शरणम मधुरम

आज अलख सवेरे मेरे मित्र सुखसागर (गुरु से गुरु मंत्र लेने से पहले सूखेराम थे) आ धमके। दनादन बेल बजाकर ,‘अरे प्यारे जल्दी दर्बज्जो खोलो मैं जहाँ हॉफ़ रहो हूँ और तुम आराम फरमा रहे हो।’मेरे मित्र की भाषा में कुछ ब्रज भाषा का पुट है या यों कहें जब से गुरु दीक्षा ली है तब से बोलन लगे हैंमैंने सोचा आज सूखा मुसीबत में है इसीलिए मित्र धर्म निभाते मैं भी तेजी से लपकता हुआ पहुँचा और द्वार खोलते...

गाँधी और आज़ादी

आजादी के बाद देश में कुछ “धर्म-एकता-दल” धर्मों,वर्णों व जातियों के संगठन बनने लगे, हर एक संगठन किसी एक राजनैतिक मंच को समर्थन दें इसलिए इन संगठनों को राजनीति के लोग भी बढाने लगे और इन संघों का रूझान राजनीति की तरफ होने लगा। इन संगठनों के वरिष्ठ सदस्य राजनीति करने लगे और व्यक्तिगत फायदे भी देखने लगे, ये बात अलग है कि इन संगठनों का निर्माण या तो राजनीति से जुड़े लोगों के द्वारा हुआ या...

ऋषभ तोमर द्वारा लिखित मौहब्बत पर पांच ग़ज़लें

ग़ज़ल – 1 शान्ति  अमन औऱ विश्वास  कहाँ है। चारों ओर अंधेरा है आकाश कहाँ है।। हिंदू मुस्लिम इसाई सिख बहुत है, मगर इंसानों की बस्ती में इंसान कहाँ है।। एक हाथ मक्खन और एक हाथ चूना, किसको मैं चाहूँ यहाँ अच्छा कहाँ है।। लबो पर तबस्सुम औऱ दिल में नफरत, इस बेबफा जमाने मे वफ़ा कहाँ है।। नदियों को भी जहाँ पर माँ कहते थे, नारी का सम्मान हिन्दुस्तां कहाँ है।। जो हमेशा विश्वबंधुत्व की बात करता था, वो...

पूत

शनीचरा! हाँ, यही नाम था उसका। सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उसका यह नाम इसलिए पड़ा होगा कि वह शनिवार को जन्मा होगा, लेकिन कोई माँ-बाप अपने बेटे का ऐसा नाम क्यों रखेगा? वास्तव में, यह नाम उसके माँ-बाप ने नहीं, गाँव के बुद्धिजीवियों ने रखा था। एक हिसाब से वह अनाथ ही पैदा हुआ था— जन्म के महीना भर पहले पिता तपेदिक से मरे थे और उसे जन्म देने के तुरन्त बाद माँ चल बसी थी। शनिश्चर प्रसाद, उर्फ़ शनिश्चर...

बहू बेटी की तरह होती है : कथन सत्य या असत्य

उक्त कथन बड़ा जटिल है बिल्कुल रेशम की तरह, आपस में उलझा हुआ। जिसे आसानी से सत्य या असत्य करार दे देना, बहू/बेटी/ माँ/सास की कोमल भावनाओं पर कुठाराघात होगा, क्योंकि यह कथनना तो पूर्णतः सत्य है ना ही असत्य। इसे समझने हेतु आइये जरा अपने दृष्टिकोण को विस्तृत रूप प्रदान करते हैं। कारण कि इनके मध्य जो विभाजन रेखा है वह कर्त्तव्य व अधिकार की प्राथमिकता से पृथकता प्राप्त करती है।कानूनी रूप से बालकजब 18...

डाॅ० कौशल किशोर श्रीवास्तव की सात ग़ज़लें

ग़ज़ल – पापा बसे हुये हैं प्यारे पापा। दिल में नेक दुलारे पापा।। जब-जब हमको लगीं ठोकरें, आकर बने सहारे पापा।। सिर पर छाया जैसे हरदम, सिर पर रहे हमारे पापा।। जब भी हमने रोड़ा समझा, गुप चुप हुये किनारे पापा।। गये आखिरी सांस अकेले, थे कितने बेचारे पापा।।   ग़ज़ल – रख खुशियों भरा पिटारा रख। दिल में जज्बा प्यारा रख।। तुझे अकेले चलना है, आगे एक सितारा रख।। मन में हो मझधार अगर, अपने साथ...

एक और शहादत

वह भटकता रहता। उसके लिए क्या मंदिर, क्या मस्जिद, क्या गुरुद्वारा, क्या गिरिजा? वो उन सबका था जो उससे मिलते थे। मिलने पर चाहे दुत्कार मिले या सम्मान वो कुछ न बोलता, बोलता भी कैसे? दुश्मनों ने उसके मुँह में जुबान ही नहीं छोड़ी थी। ऐसे ही एक दिन वह बुखार से तपता हुआ अपनी अनिश्चित मंजिल की ओर चला जा रहा था कि सर्द हवा के झोंके ने उसे कम्बल और कस के लपेटने को मजबूर कर दिया। लेकिन फायदा ही क्या था? उस...

डॉ० नीलम कौर की नौ कविताएँ

कविता – 1 मुस्कराती जिंदगी में वो मिला इस तरह जिंदगी ही कहीं थम गयी अंजान ही सही पर मिला कुछ एेसे के… सदियों से मुलाकाती था वक्त का दरिया…. बहता रहा। दो दिलों के दरमियां…. कुछ वो वाणी की कश्ती नियमों के पतवार से बहाते रहे। कुछ हम भी पलकों के साये तले लफ्जों को थामें रहे…. फासले इस तरह सिमटते रहे दोनों के दरमियां जैसे दरिया पे कहीं भावनाओं के पुल बंधे हो कहीं। कविता...

छेड़-छाड़

आदमी चाहे कितना भी बड़ा हो जाये, चाहे वह कुछ भी बन जाए कितना भी बड़ा लक्ष्मीपति, कितना भी बड़ा समाज सेवी और कितना भी बड़ा राजनेता हो जाये, वह चाहे कितने ही ऊँचे से ऊँचे पद पर पहुँच जाये पर सब में एक बहुत बड़ी बीमारी होती है किसी न किसी वस्तु या व्यक्ति को छेड़ने की। वह अपनी आदत के अनुसार कुछ न कुछ छेड़ता ही रहता है। उस की अंगुलियाँ और दिमाग कभी चुप बैठते ही नहीं हैं, और यहाँ तक कि जब उसे कोई वस्तु या...

पुराना खत | संघर्ष

कविता – पुराना खत लम्हा लम्हा जब – जब पुराना खत खोलती हूँ आज भी एक भीनी सी खुशबू उठती है खत के बीच पड़ा गुलाब सूख चुका है गर्मी की खुश्क हवा में ताजगी का अहसास दिलाता है आज सब कुछ तो बदल गया जिन्दगी में चुटकी भर बस यादें रह गई है जब भी सामने आती है जम के बरसती है और भिगो जाती है तन – मन को महसूस कराती है बीते दिनों की बीती बातों को वक्त बढ़ गया , पर यादें तो वहीं टिकी है मन के...

इंसान हूँ, इंसान ही रहना चाहता हूँ

इंसान हूँ मैं इंसान ही रहना चाहता हूँ। कई आदर्श है इस जीवन के, फिर भी नहीं चाहता भगवान बनना।। इंसान हूँ मैं इंसान ही रहना चाहता हूँ। सब जन को है चाह देव बन पूजे जावें। पर इंसानों की खामियां कैसे कोई छिपावें।। लोगों की इन खामियों पर कुछ कहना चाहता हूँ। इंसान हूँ मैं इंसान ही रहना चाहता हूँ।\ कई ऐब है मुझमें भी होगी कई खामियां भी। छोडू मिटाऊँ कितनी ही रहेगी कुछ तो फिर भी।। इन ऐब खामियों को ही पहचान...

राष्ट्रीय रायता

राष्ट्रीय चीज़ों का अपना ही महत्त्व होता है। राष्ट्रीय होने पर उसके कुछ ख़ास होने का अंदाजा अपने आप लग जाता है। जब हमें राष्ट्रीय चीजों का चस्का लग जाता है तो स्थानीय या प्रांतीय चीज़ें फीकी लगने लगती हैं। मजा तो राष्ट्रीय आइटम का ही है, भले ही वो संगठन हो, एनजीओ हो, या कोई ट्रस्ट। अगर वह राष्ट्रीय न हुआ, तो क्या हुआ? शादी में कोई राष्ट्रीय मामा, राष्ट्रीय ताऊ या राष्ट्रीय साली न हो, तो सारी रौनक...

उत्कर्ष छंदावली

1. समय कीमती,रहा सदा ही,चेत करो। समय नही है,पास तुम्हारे,ध्यान धरो। मोह पाश में,बंधे मूर्खो,झूम रहे। भूल ईश को,नित्य मौत पग,चूम रहे। 2. आओ राधा,रास रचाये,मधुवन में। कान्हा बोले,प्रेम जगायें,कण-कण में। सभी गोपियाँ,थिरक रही हैं,तन-मन से। बजत बांसुरी,हर्षित है मन,मोहन से। 3. चले सुदामा,मित्र मिलन को,आस लिये। खड़े द्वार पे,प्रहरी सारे,हास किये। खड़ा सुदामा,कोस रहा है,किस्मत को। हुई भूल जो,प्राप्त हुआ...

धर्म का मर्म जाना नहीं

धर्म का मर्म जाना नहीं। तो कहीं भी ठिकाना नहीं।। मंदिरों और मठों में सुनो, जाने का अब जमाना नहीं।। मंथरा लाख कोशिश करे, राम को वन भिजाना नहीं।। तुमको जन्मा था जिनने कभी, उनके दिल को दुखाना नहीं।। वो तुम्हें छोड़कर जायेगा, साथ तुम भी निभाना नहीं।। पी रहे हैं बीयर छानकर, जिनने पानी को छाना नहीं।। दोस्तों से गिला है उन्हें, दुश्मनों पर निशाना नहीं।। ये सिसासत के रंग हैं “लता”, अम्न बस्ती...

तीन तलाक

कहने मात्र को सिर्फ एक शब्द, जो उजाड़ देता है भरा-पूरा परिवार, छीन लेता है खुशियाँ, जिंदगी में रह जाते हैं सिर्फ आँसू – वो है तलाक। इस शब्द पर राजनैतिक गलियारे भी खूब गर्म हुए, चर्चाओं का दौर चला। किसी ने उचित और किसी ने अनुचित कहा। तलाक शब्द को जोड़ा गया एक सम्प्रदाय विशेष से। कहीं कानून ओर कहीं धर्म में शरीयत का हवाला देकर अपनी-अपनी बात को सिद्ध करने के लिए सभी ने तर्क – वितर्क किये।...

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